पांडव की मौत, पहचान की पीड़ा और सियासी चुप्पी का सवाल, एक बिहारी ही बिहार की आवाज क्यों नहीं बन रहा है?
BJP President Nitin Nabin and Pandav Kumar Case- पश्चिमी दिल्ली के बिंदापुर इलाके में 26 अप्रैल की रात हुई घटना ने एक बार फिर देश के सामने असहज सवाल खड़ा कर दिया है क्या बिहारी होना गुनाह है? 21 वर्षीय पांडव कुमार की कथित पुलिस फायरिंग में मौत अब सिर्फ एक आपराधिक मामला नहीं, बल्कि पहचान, भेदभाव और व्यवस्था की संवेदनशीलता की परीक्षा बन चुकी है। परिजनों और दोस्तों का आरोप है कि पांडव ने खुद को बिहार का निवासी बताया, जिसके बाद पुलिसकर्मी ने उस पर गोली चला दी। यदि यह आरोप जांच में सही साबित होता है, तो यह घटना सिर्फ एक व्यक्ति की हत्या नहीं, बल्कि उस मानसिकता का प्रतिबिंब है जो आज भी क्षेत्रीय पहचान के आधार पर इंसानों का मूल्य तय करती है।
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पहचान पर सवाल, व्यवस्था कटघरे में
दिल्ली जैसे महानगर में, जहां देश के हर हिस्से से लोग आकर बसते हैं, अगर किसी की जान उसकी पहचान की वजह से चली जाए, तो यह कानून-व्यवस्था के साथ-साथ सामाजिक सोच पर भी बड़ा प्रश्नचिह्न है। ‘बिहारी’ शब्द को अक्सर मजाक या हीन भावना से जोड़कर देखा जाना, इसी गहरी समस्या की निशानी है।
बिहारियों की आवाज क्यों नहीं बन रहे हैं नितिन नबीन?
इस पूरे घटनाक्रम में एक राजनीतिक सवाल भी उभरता है। दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन भी बिहार से आते हैं। ऐसे में यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि वे इस तरह की घटना पर अपनी स्पष्ट और संवेदनशील प्रतिक्रिया दें। लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है. एक बिहारी ही बिहार की आवाज क्यों नहीं बन रहा है. जब एक ओर बिहार के लोग देशभर में अपनी मेहनत और प्रतिभा से पहचान बना रहे हैं, वहीं दूसरी ओर अगर किसी युवक की जान उसकी ‘बिहारी’ पहचान के कारण चली जाती है, तो यह सिर्फ कानून का नहीं, बल्कि राजनीति की जवाबदेही का भी मुद्दा बन जाता है। यह सवाल उठना लाजिमी हैक्या सत्ता के शीर्ष पर बैठे नेताओं की जिम्मेदारी नहीं बनती कि वे अपने ही राज्य के लोगों के साथ हो रहे अन्याय पर मुखर हों? या फिर राजनीति में क्षेत्रीय पहचान सिर्फ चुनावी मुद्दा बनकर रह जाती है?
बिहारी होना गर्व की बात, संघर्ष और सम्मान की पहचान
बिहार की मिट्टी ने देश को प्रशासनिक अधिकारी, वैज्ञानिक, शिक्षक, कलाकार और करोड़ों मेहनतकश लोग दिए हैं। देश की अर्थव्यवस्था में बिहार के प्रवासी श्रमिकों का योगदान किसी से छिपा नहीं है। फिर भी, ‘बिहारी’ शब्द को कई बार अपमानजनक संदर्भ में इस्तेमाल किया जाता है यह सामाजिक विडंबना है।
चुप्पी सबसे बड़ा सवाल
इस घटना के बाद सिर्फ पुलिस कार्रवाई या जांच की बात नहीं है। बड़ा सवाल यह है कि क्या समाज और राजनीतिक नेतृत्व इस मुद्दे पर गंभीरता से खड़ा होगा? क्योंकि जब अन्याय पर चुप्पी साध ली जाती है, तो वह चुप्पी ही सबसे बड़ा समर्थन बन जाती है। पांडव कुमार की मौत एक चेतावनी भी है कि अगर हम अभी भी क्षेत्रीय भेदभाव को नजरअंदाज करते रहे, तो यह हमारे लोकतंत्र और सामाजिक ताने-बाने को कमजोर करेगा। क्या बिहारी होना गुनाह है? यह सवाल सिर्फ एक परिवार का नहीं, बल्कि हर उस भारतीय का है जो अपनी पहचान के साथ सम्मान से जीना चाहता है। अब जरूरत सिर्फ जांच और सजा की नहीं, बल्कि सोच बदलने की है और इस बदलाव में राजनीति, समाज और हर नागरिक की बराबर जिम्मेदारी है।

