चुनावी मौसम आते ही एक परिचित दृश्य सामने आता है नेता मंच पर चढ़ते हैं, ‘का हाल बा, गोड़ लागत बानी, रउआ सब ठीक बानी, हमार माटी, हमार भाषा जैसे भोजपुरी वाक्य बोलते हैं और भीड़ तालियों से गूंज उठती है। लेकिन चुनाव खत्म होते ही यही भाषा, यही भावनाएं और यही वादे अचानक गायब हो जाते हैं।
सवाल यह है कि जो नेता भोजपुरी बोलकर वोट मांगते हैं, वे सत्ता में आने के बाद भोजपुरी की असली लड़ाई क्यों नहीं लड़ते? यह सवाल केवल भाषाई नहीं, बल्कि राजनीतिक ईमानदारी, सांस्कृतिक सम्मान और लोकतांत्रिक जवाबदेही से जुड़ा हुआ है।
भोजपुरी केवल एक भाषा नहीं, बल्कि एक विस्तृत सांस्कृतिक भूगोल है, जो पूर्वी उत्तर प्रदेश, पश्चिमी बिहार और झारखंड के कुछ हिस्सों में फैला हुआ है। लगभग 30 करोड़ से अधिक लोगों द्वारा बोली जाने वाली यह भाषा भारत की सबसे बड़ी लोकभाषाओं में से एक है। इसके बावजूद भोजपुरी और उससे जुड़ा समाज लंबे समय से राजनीतिक उपेक्षा, सांस्कृतिक दोहन और पहचान के संकट का शिकार रहा है। यह स्थिति केवल संयोग नहीं, बल्कि एक सुनियोजित राजनीतिक संरचना का परिणाम है, जिसमें भाषा, पहचान और वोट बैंक की राजनीति गहराई से उलझी हुई है।
चुनावी टूल बन गई भोजपुरी
भोजपुरी का चुनावी मंचों पर इस्तेमाल एक रणनीति है। नेताओं को पता है कि भाषा सीधे दिल से जुड़ती है। जब कोई नेता भोजपुरी में बोलता है, तो वह खुद को अपना आदमी साबित करता है। लेकिन यह अपनापन अक्सर सतही होता है। असल में, यह भावनात्मक जुड़ाव का राजनीतिक दोहन है। चुनाव जीतने के लिए भाषा का उपयोग किया जाता है, लेकिन नीति-निर्माण के समय वही भाषा प्राथमिकता में नहीं रहती। क्योंकि वहां भावनाएं नहीं, सत्ता समीकरण काम करते हैं।
राजनीति की प्राथमिकता में नहीं भोजपुरी
सबसे बड़ा प्रश्न है कि भोजपुरी को अब तक संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान क्यों नहीं मिला? जबकि मैथिली, संथाली और डोगरी जैसी भाषाओं को यह मान्यता मिल चुकी है। वर्षों से भोजपुरी को मान्यता देने की मांग उठती रही है, संसद में कई बार प्रस्ताव भी आए, लेकिन हर बार यह मुद्दा ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।
राजनीतिक दल चुनाव के समय भोजपुरी में भाषण देकर, गीतों और नारों का इस्तेमाल कर वोट मांगते हैं, लेकिन सत्ता में आने के बाद इस भाषा के संरक्षण या संवर्धन के लिए कोई ठोस नीति नहीं बनाते। इसका कारण स्पष्ट है भोजपुरी भाषी क्षेत्र को एक ‘स्थिर वोट बैंक’ के रूप में देखा जाता है, जहां सांस्कृतिक मुद्दों को केवल भावनात्मक स्तर पर भुनाया जाता है।
श्रम का शोषण और पहचान का उपयोग ‘गांव की भाषा’ मानकर हीन भावना से जुड़ेंगे तो खत्म हो जाएगी भोजपुरी
भोजपुरी समाज का एक बड़ा हिस्सा प्रवासी है चाहे वह मुंबई, दिल्ली, पंजाब हो या खाड़ी देश। इन प्रवासियों की मेहनत भारतीय अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन राजनीतिक दृष्टि से इन्हें केवल ‘सस्ता श्रम’ मान लिया गया है। मुंबई और अन्य महानगरों में समय-समय पर ‘बिहारी भैय्या’ कहकर अपमानित करना, उत्तर भारतीयों के खिलाफ राजनीतिक अभियान चलाना ये सब भोजपुरी समाज के साथ होने वाले भेदभाव के उदाहरण हैं। दिलचस्प बात यह है कि इन मुद्दों पर क्षेत्रीय और राष्ट्रीय राजनीतिक दल अक्सर चुप रहते हैं, क्योंकि वे टकराव से बचना चाहते हैं।
भोजपुरी सिनेमा और राजनीति का गठजोड़
भोजपुरी सिनेमा, जो कभी लोकसंस्कृति और सामाजिक यथार्थ का दर्पण था, आज अश्लीलता और सतही मनोरंजन का पर्याय बन गया है। इसमें राजनीति की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। कई भोजपुरी कलाकार सीधे राजनीति में आते हैं और अपने प्रभाव का उपयोग कर चुनाव जीतते हैं। इसके बदले में वे सिनेमा में उस तरह की सामग्री को बढ़ावा देते हैं, जो तात्कालिक लोकप्रियता तो देती है, लेकिन समाज की छवि को नुकसान पहुंचाती है। इससे भोजपुरी की सांस्कृतिक गरिमा प्रभावित होती है और इसे ‘लो-कल्चर’ के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। http://गांव की आवाज नहीं, बल्कि ग्लोबल बीट हो रहा है भोजपुरी म्यूजिक
शिक्षा और प्रशासन में उपेक्षा
भोजपुरी भाषी क्षेत्रों में शिक्षा और प्रशासन की भाषा मुख्यतः हिंदी या अंग्रेजी है। स्कूलों में भोजपुरी को न तो पढ़ाया जाता है और न ही इसे एक विषय के रूप में महत्व दिया जाता है। इससे नई पीढ़ी अपनी मातृभाषा से दूर होती जा रही है। राजनीतिक स्तर पर यह एक रणनीतिक चूक नहीं, बल्कि एक सोची-समझी नीति प्रतीत होती है क्योंकि भाषा के माध्यम से ही पहचान और जागरूकता का निर्माण होता है। यदि भोजपुरी को शिक्षा में स्थान मिलता, तो यह समाज अधिक संगठित और जागरूक हो सकता था, जो राजनीतिक रूप से चुनौतीपूर्ण होता।
जाति और क्षेत्र के आधार पर बंटवारा
भोजपुरी समाज को एकजुट होने से रोकने के लिए जाति और क्षेत्र के आधार पर विभाजन की राजनीति भी की जाती है। पूर्वांचल और बिहार के अलग-अलग राजनीतिक समीकरणों में भोजपुरी भाषी जनता को अलग-अलग खेमों में बांटा जाता है। इससे एक साझा ‘भोजपुरी पहचान’ विकसित नहीं हो पाती, और राजनीतिक दल इस बिखराव का फायदा उठाते हैं। जब तक यह समाज अपनी सांस्कृतिक और भाषाई पहचान को एकजुट रूप में प्रस्तुत नहीं करेगा, तब तक यह राजनीतिक शिकार बना रहेगा।
मीडिया और प्रतिनिधित्व की कमी
राष्ट्रीय मीडिया में भोजपुरी समाज का प्रतिनिधित्व लगभग नगण्य है। जब भी इसका जिक्र होता है, तो या तो प्रवासी मजदूरों के रूप में या फिर सस्ते मनोरंजन के संदर्भ में। इससे एक नकारात्मक छवि बनती है, जिसे राजनीतिक रूप से भी भुनाया जाता है। भोजपुरी पत्रकारिता और बौद्धिक वर्ग भी अभी उतना सशक्त नहीं है कि वह इस नैरेटिव को चुनौती दे सके। यह भी एक कारण है कि भोजपुरी समाज की वास्तविक समस्याएं राष्ट्रीय विमर्श में जगह नहीं बना पातीं।
समाधान की दिशा में क्या किया जाए?
भोजपुरी और भोजपुरी समाज को राजनीतिक शिकार बनने से बचाने के लिए कुछ ठोस कदम जरूरी हैं-
संवैधानिक मान्यता के लिए संगठित आंदोलन
शिक्षा में भोजपुरी को शामिल करना
सांस्कृतिक पुनर्जागरण और गुणवत्तापूर्ण सिनेमा को बढ़ावा
प्रवासी अधिकारों के लिए ठोस नीति
मीडिया में सकारात्मक और सशक्त प्रतिनिधित्व
सबसे महत्वपूर्ण है भोजपुरी समाज को अपनी पहचान पर गर्व करना और उसे एक राजनीतिक शक्ति में बदलना। जब तक यह समाज खुद को केवल वोटर के रूप में देखता रहेगा, तब तक राजनीति इसे केवल एक साधन की तरह इस्तेमाल करती रहेगी।
भोजपुरी की ताकत उसकी लोकसंस्कृति, उसकी भाषा और उसके लोग हैं। यदि ये तीनों मिलकर अपनी पहचान को assert करें, तो राजनीति को भी अपनी रणनीति बदलनी पड़ेगी।

