हंसी, तंज और लोकजीवन की अनोखी अभिव्यक्ति है जोगीरा

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जोगीरा सा रा रा रा… जोगीरा सा रा रा रा… यह आवाज सुनते ही होली का रंग और जोश दोगुना हो जाता है। उत्तर भारत की लोक परंपरा में जोगीरा सिर्फ एक रिफ्रेन नहीं, बल्कि हास्य, व्यंग्य और दर्शन का अनोखा मिश्रण है। आइए, इसकी पूरी कहानी को आठ हिस्सों में समझते चलें, जैसे होली की टोली गाँव-गाँव घूमती हुई मस्ती बिखेरती है।

जोगीरा क्या है?
जोगीरा भोजपुरी और कहीं कहीं अवधी बोली का मिश्रित रूप है। यह हास्य-व्यंग्य की एक खास काव्य-विधा है जिसमें दो-दो पंक्तियों के तुकांत युग्म होते हैं। हर छंद के बाद जोगीरा सा रा रा रा… का टेक लगता है, जो गीत को बार-बार यादगार और मस्ती भरा बना देता है। ढोलक, झांझ, मजीरा की थाप पर गाया-नाचा जाने वाला यह गीत सवाल-जवाब की शैली में समाज की सच्चाइयों को हल्के-फुल्के अंदाज में उजागर करता है।
जोगीरा का मतलब जोगी (योगी) से जुड़ा है वह फकीर जो माया-मोह से मुक्त होकर जीवन का सच्चा आनंद लेता है।

जोगीरा के प्रकार क्या हैं?
जोगीरा केवल एक लोकगीत नहीं, बल्कि कई रूपों में विकसित एक जीवंत अभिव्यक्ति है, जो समय, समाज और परिस्थितियों के साथ बदलती रहती है। इसके प्रकार मुख्य रूप से उसके विषय, भाव और प्रस्तुति शैली पर निर्भर करते हैं।

हास्य जोगीरा, हंसी के जरिए सामाजिक जुड़ाव
हास्य जोगीरा सबसे लोकप्रिय रूप है, जिसका उद्देश्य लोगों को हंसाना और माहौल को हल्का बनाना होता है। इसमें रोजमर्रा की जिंदगी, घरेलू घटनाओं और रिश्तों की नोकझोंक को सरल और मजेदार अंदाज में पेश किया जाता है। देवर-भाभी, सास-बहू या दोस्तों के बीच की हल्की चुटकी इस जोगीरा की पहचान होती है। इसकी भाषा सहज होती है और प्रस्तुति में लय के साथ पंचलाइन पर सामूहिक जोगीरा सा रा रा रा माहौल को और जीवंत बना देता है। यह रूप सामाजिक तनाव कम करने और आपसी संबंधों को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाता है।

व्यंग्यात्मक जोगीरा, हंसी में छिपा सच
व्यंग्यात्मक जोगीरा लोकजीवन की सबसे प्रभावशाली अभिव्यक्तियों में से एक है। इसमें समाज और राजनीति की विसंगतियों पर तंज किया जाता है, लेकिन भाषा और शैली इतनी रोचक होती है कि यह बोझिल नहीं लगता। नेताओं के वादे, महंगाई, भ्रष्टाचार या सामाजिक असमानता जैसे मुद्दों को इस रूप में उठाया जाता है। सुनने में यह हल्का-फुल्का लगता है, लेकिन इसके भीतर गहरे संदेश छिपे होते हैं। यही कारण है कि इसे आम लोगों की आवाज और विरोध का सहज माध्यम भी माना जाता है।

श्रृंगारिक जोगीरा, प्रेम और नोकझोंक की अभिव्यक्ति
श्रृंगारिक जोगीरा प्रेम, आकर्षण और मानवीय भावनाओं का प्रतिनिधित्व करता है। इसमें दांपत्य जीवन, प्रेमी-प्रेमिका के संवाद और होली के अवसर पर होने वाली छेड़छाड़ को प्रमुखता से दिखाया जाता है। होली के खुले और उत्सवपूर्ण वातावरण में यह रूप ज्यादा प्रचलित होता है। इसकी प्रस्तुति में भावनात्मक लय और संवादात्मक शैली होती है, जिससे यह और आकर्षक बनता है। हालांकि, कभी-कभी यह मर्यादा की सीमा पार कर सकता है, इसलिए संतुलन बनाए रखना जरूरी है।

समसामयिक जोगीरा, समय के साथ बदलता स्वर
समसामयिक जोगीरा आधुनिक दौर का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें वर्तमान घटनाओं और ट्रेंड्स को शामिल किया जाता है। चुनाव, फिल्में, सोशल मीडिया या किसी वायरल घटना को लेकर तुरंत जोगीरा रच दिया जाता है। यह रूप खासकर युवाओं में लोकप्रिय है और इसकी खासियत इसकी तात्कालिकता और अपडेटेड कंटेंट है। यह दिखाता है कि जोगीरा केवल परंपरा नहीं, बल्कि समय के साथ खुद को ढालने वाली जीवंत कला है।

परंपरागत जोगीरा, लोकस्मृति की विरासत
परंपरागत जोगीरा वह रूप है, जो पीढ़ियों से चला आ रहा है और लोकस्मृति का हिस्सा बन चुका है। इसमें पुराने गीत, स्थिर लय और पारंपरिक शब्दावली होती है। इसे अक्सर अनुभवी लोकगायक या बुजुर्ग गाते हैं, जो इस परंपरा को आगे बढ़ाते हैं। इसमें फागुन, प्रकृति, ग्रामीण जीवन और पारंपरिक रिश्तों का सुंदर चित्रण होता है। यह जोगीरा हमारी सांस्कृतिक पहचान को संजोए रखने का महत्वपूर्ण माध्यम है।
अब सुनिए कुछ पारंपरिक जोगीरा के उदाहरण — जोगीरा सा रा रा रा… जोगीरा सा रा रा रा…

शुरूआत (मस्ती भरा परिचय)
फागुन मास आइल बा, रंगवा छिटकावे
ढोल मजीरा बाजे, गली-गली नाचावे
होली खेलबे के दिनवा, दिल खोल के गावे
जोगीरा सा रा रा रा… जोगीरा सा रा रा रा…

ज्ञान-प्रधान जोगीरा (पहेली शैली)
कवन हाथ के धोती पहिने, कवन हाथ लपेटा?
कवन घाट का पानी पिये, कवन बाप का बेटा?
पाँच हाथ के धोती पहिने, दो हाथ लपेटा
एक घाट का पानी पिये, एक बाप का बेटा
जोगीरा सा रा रा रा… जोगीरा सा रा रा रा…
दानापुर दरियाव किनारा, गोलघर निशानी
लाट साहेब ने किला बनाया, क्या गंगा जल पानी?
दिल्ली देखो ढाका देखो, शहर देखो कलकत्ता
एक पेड़ तो ऐसा देखो, फर के ऊपर पत्ता
जोगीरा सा रा रा रा… जोगीरा सा रा रा रा…

हास्य-व्यंग्य जोगीरा (समाज पर चोट)
आधी टांग के धोती पहिरे, आधी पीठ उघार
पलटू कारन बजट के घाटा, बोल रहल सरकार
महँगाई में बढ़ता देखो, आज नमक और तेल
नेता लोग रुपयों से खेलत, जनता रोवे रेल
जोगीरा सा रा रा रा… जोगीरा सा रा रा रा…
चिन्नी चाउर महंगा भईल, महंगा भइल पिसान
मनरेगा के फारम ले के, चाटत साँझ बिहान
पप्पू ठर्रा पिला रहे, रंगीन होके नाच
परधानी में हार गइल, फिर भी मस्ती में माच
जोगीरा सा रा रा रा… जोगीरा सा रा रा रा...

रोमांटिक जोगीरा (प्रेम और होली मस्ती)
ए गोरिया कतना निहोरा करइबू, फागुनवा मासे
नयनवा कटारे रे, जान मारे जनिया
गोरे गोरे गाल गुलाबी, आँख नशीली चाल
होली में रंग डाल दे, कमर पतीली मतवाली
जोगीरा सा रा रा रा… जोगीरा सा रा रा रा…
कौन रंग की राधा प्यारी, कौन रंग श्रीकृष्ण
कौन रंग की लहंगा सारी, कौन रंग बसंत
राधा रंग गुलाबी, कृष्ण रंग नीला
बसंत रंग हरा, होली रंग सब मिला
जोगीरा सा रा रा रा… जोगीरा सा रा रा रा…

सामाजिक-दार्शनिक जोगीरा
काहे खातिर राजा रूसे, काहे खातिर रानी
काहे खातिर बकुला रूसे, कइले ढबरी पानी
राज खातिर राजा रूसे, सेज खातिर रानी
मछरी खातिर बकुला रूसे, कइले ढबरी पानी
जोगीरा सा रा रा रा… जोगीरा सा रा रा रा…
जोगी जी वाह वाह, जोगी जी सार रा रा
माया-मोह छोड़ के, खेल होली का मारा
बुरा मान लो होली है, खुलने दो भेद सारा
रंग डालो सबके ऊपर, दिल से दिल मिलावे
जोगीरा सा रा रा रा… जोगीरा सा रा रा रा…

अंतिम छंद (समापन)
होली है, खुलकर खेलो, बुरा न मानो भाई
रंग गुलाल उड़ावे, मस्ती में डूब जाई
जोगी भाव अपनावे, माया से ऊपर उठे
फिर भी होली के रंग में, पूरा गाँव नाचे
जोगीरा सा रा रा रा… जोगीरा सा रा रा रा…
जोगीरा सा रा रा रा… जोगीरा सा रा रा रा…

जोगीरा कैसे गाया और बजाया जाता है?
टोलियाँ फागुन से चैत्र तक द्वार-द्वार घूमती हैं। एक दल सवाल पूछता है, दूसरा जवाब देता है जवाब अक्सर चौंकाने वाला और हँसाने वाला होता है। ढोलक की थाप, झांझ और मजीरे की धुन के साथ पूरा गाँव या मोहल्ला जुड़ जाता है। महिलाएँ भी घर से सुनकर आनंद लेती हैं। यह न सिर्फ गाना है, बल्कि सामूहिक नृत्य और उत्सवधर्मिता का हिस्सा है।

जोगीरा गाने का मुख्य समय

वसंत पंचमी (श्रीपंचमी) से शुरू: फागुन के आगमन के साथ ही जोगीरा की टोलियाँ निकलना शुरू हो जाती हैं। वसंत पंचमी से होली की तैयारी का माहौल बनता है और गाँव-मोहल्लों में शाम को ढोलक-झांझ की थाप पर जोगीरा गूँजने लगता है।
पूरे फागुन महीने भर: फागुन मास में हर शाम, रात और खासकर होली से पहले के दिनों में टोलियाँ घर-घर, गली-गली, चौपाल और मंदिरों पर जोगीरा गाती हैं। रात भर महफ़िलें चलती हैं – कभी मध्यरात्रि तक, कभी देर रात तक।
होली वाले दिन (फाल्गुन पूर्णिमा): होली के मुख्य दिन (धुलंडी) पर जोगीरा की धुन सबसे ज़ोरदार होती है। होलिका दहन के बाद रंग खेलते समय, सुबह से शाम तक और रात में भी लोग जोगीरा गाते-नाचते हैं। यह दिन जोगीरा की परवान चढ़ने का समय है।
चैत्र मास के शुरुआती दिन: होली के बाद भी कुछ दिनों तक (चैतावर) जोगीरा गाया जाता है, खासकर ग्रामीण इलाकों में। कुछ जगहों पर चैत्र पूर्णिमा तक यह धुन चलती रहती है।

कैसे और कहाँ गाया जाता है?
टोलियाँ द्वार-द्वार घूमती हैं: युवाओं की मंडलियाँ ढोलक, झांझ, मजीरा और करताल लेकर गाँव की गलियों, घरों के आँगन और चौकों में जोगीरा गाती हैं। सामूहिक महफ़िल: गाँव के मंदिर या चौपाल पर शाम ढलते ही शुरू हो जाता है। एक दल सवाल पूछता है, दूसरा जवाब देता है – और हर छंद के बाद पूरा दल मिलकर जोगीरा सा रा रा रा… जोगीरा सा रा रा रा…’ दोहराता है। पुरानी परंपरा में यह रात भर चलता था। लोग आते-जाते रहते, गाने वाले बदलते रहते और मस्ती का माहौल बना रहता।

क्यों इस समय गाया जाता है?
फागुन और चैत्र वसंत ऋतु का समय है – जब प्रकृति रंग-बिरंगी हो जाती है। होली की उत्सवधर्मिता में जोगीरा हँसी, व्यंग्य, प्रेम और जोगी भाव (माया से मुक्ति) को मिलाकर त्योहार को पूरा करता है। “जब से होली, तब से जोगीरा” – यह कहावत इसी परंपरा को दर्शाती है। आजकल शहरों में डीजे और आधुनिक गानों ने कुछ हद तक इसकी जगह ले ली है, लेकिन गाँवों में अभी भी फागुन आते ही जोगीरा की आवाज़ गूँजने लगती है।

जोगीरा कब से शुरू हुआ? इतिहास और प्राचीन संदर्भ
जोगीरा की परंपरा प्राचीन है यानी जब से होली, तब से जोगीरा। इसका ठीक-ठीक जन्म-काल दर्ज नहीं, लेकिन 8वीं सदी से हिंदी बेल्ट (उत्तर प्रदेश, बिहार, ब्रज क्षेत्र) में मजबूत हुआ। बौद्ध परंपरा के सिद्ध-योगियों से निकली जहाँ जोगी माया से मुक्त होने की बात करते थे।
भक्ति आंदोलन (मध्यकाल) में कबीर, तुलसीदास, जायसी जैसे संतों की उलटबाँसियों और निर्गुण भावना से गहरा संबंध। जोगियों की हठ-साधना, वैराग्य और उलटबाँसियों का मजाक उड़ाने से यह रूप पाया।
होली से जुड़ाव, होलिका दहन के बाद उत्सवधर्मिता में फाग गीतों के बीच जोगीरा गाने की प्रथा चली। वसंत पंचमी से शुरू होकर चैत्र तक गाँव के मंदिरों पर टोलियाँ जुटती थीं।
प्रत्यक्ष वेद-पुराण में जोगीरा शब्द नहीं मिलता, लेकिन सिद्ध साहित्य, नाथ परंपरा और संत काव्य में जोगी-योगी की उलटबाँसियाँ और लोकगीतों की जड़ें दिखती हैं। होली का पौराणिक आधार (प्रह्लाद-होलिका) उत्सव को प्राचीन बनाता है, जिसमें जोगीरा बाद में जुड़ा। ब्रज क्षेत्र को इसकी उत्पत्ति का केंद्र माना जाता है।
आज भी पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान के कुछ हिस्सों में यह परंपरा ज़िंदा है। यह सिर्फ़ गाना नहीं है बल्कि लोक-जन की आवाज़ है जो त्योहार को सच्ची मस्ती देती है।

यह युवाओं को अपनी जड़ों से जोड़ता
यह परंपरा कई लाभ देती है। सांस्कृतिक रूप से यह लोक धुनों और मौखिक साहित्य को ज़िंदा रखती है। सामाजिक रूप से कुंठा निकालने का सुरक्षित रास्ता प्रदान करती है व्यंग्य के जरिए बुराइयों पर चोट बिना कटुता के। मानसिक स्वास्थ्य के लिए हँसी-मज़ाक तनाव कम करता है और होली के आनंद को बढ़ाता है। शारीरिक रूप से नाचना-गाना व्यायाम है। सबसे बड़ा फायदा यह युवाओं को अपनी जड़ों से जोड़ता है और जोगी भाव सिखाता है, माया से ऊपर उठकर जीवन का आनंद लो।

बाबा भोजपुरिया
बाबा भोजपुरियाhttp://bhojpuri24.com
पत्रकारिता में करीब 20 वर्षों का अनुभव है। भोजपुरी भाषा और संस्कृति को लेकर बेहद संवेदनशील हैं। भोजपुरी संस्कृति, भाषा, खानपान, पहनावे और लोकगीतों के संरक्षण व संवर्धन के लिए लगातार प्रयासरत रहते हैं।

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