इस आलेख से समझिए कि किस तरह अश्लीलता अकेले ही भोजपुरी संस्कृति को खत्म कर रही है।
भोजपुरी कभी सिर्फ एक भाषा नहीं थी, यह लोकजीवन की संवेदना, रिश्तों की गरिमा और सामाजिक संस्कारों की वाहक रही है। लेकिन पिछले दो दशक में एक खतरनाक प्रवृत्ति तेज़ी से उभरी है अश्लीलता का वर्चस्व। यह केवल गीतों या फिल्मों तक सीमित नहीं, बल्कि अब गांव-गांव के समारोहों, बारातों और सार्वजनिक आयोजनों तक पहुंच चुकी है। सवाल यह है कि क्या यह बदलाव ‘मनोरंजन’ है या फिर एक सुनियोजित सांस्कृतिक क्षरण? और हर कोई अपने मनोरंजन के नाम पर अपनी प्यारी भोजपुरी का दम घोटने में लगें हैं.
अश्लीलता का उदय, 2000 के बाद का व्यापारीकरण
2000 के दशक में भोजपुरी फिल्म और संगीत उद्योग ने तेजी पकड़ी। कम लागत, उच्च कमाई के लालच में निर्माताओं ने ‘इटम सॉन्ग’ और डबल मीनिंग गीतों को बढ़ावा दिया। गीतकारों ने उत्तेजना के लिए अश्लीलता को सफलता का पैमाना बना लिया। नतीजा? भोजपुरी अब ‘अश्लील’ की पर्याय बन गई।
आज के लोकप्रिय गाने (जैसे कुछ हिट ट्रैक्स जो सौ करोड़ से ज्यादा व्यूज पा चुके) महिलाओं को वस्तु बनाते हैं, नशे-हिंसा को ग्लैमराइज़ करते हैं। एक अध्ययन में कहा गया कि भोजपुरी इटम सॉन्ग्स पैट्रियार्की को मजबूत करती हैं और हास्य के नाम पर अश्लीलता को सामान्य बनाती हैं। यूट्यूब एल्गोरिदम और सोशल मीडिया ने इसे घर-घर पहुंचा दिया। बच्चे-बच्चियां इन गीतों को सुनकर बड़े हो रहे हैं, जैसा कि बिहार के कई इलाकों में देखा जा रहा है।
अश्लील डीजे ही परंपरागत कलाकारों का सबसे बड़ा दुश्मन
आज की सबसे बड़ी समस्या अश्लील डीजे संस्कृति है। शादी-ब्याह, होली, छठ या किसी भी सामूहिक आयोजन में लोग अब पारंपरिक लोक कलाकारों को नहीं बुलाते। इसके बजाय सस्ते डीजे सेटअप लगाए जाते हैं जो अश्लील भोजपुरी गीतों के रीमिक्स बजाते हैं। तेज आवाज़, थर्रा देने वाली धुन और नग्नता भरे थंबनेल्स युवाओं को आकर्षित करते हैं। नतीजा? बैंड-पार्टी और लोक कलाकारों की आजीविका खतरे में पड़ गई है।
हर भोजपुरी इलाकों में डीजे के शोर ने पारंपरिक बैंड पार्टी कलाकारों को बेरोजगार कर दिया। ग्रामीण इलाकों में डीजे बजाने वाले आयोजक कहते हैं कि ‘लोग अब पुराने गीत नहीं सुनना चाहते’। डीजे एक ही रात में लाखों कमा लेता है, जबकि पारंपरिक कलाकार दिन-रात मेहनत करते हैं लेकिन बुकिंग नहीं मिलती। महिलाएं और बच्चे इन गीतों से असहज होते हैं, फिर भी डीजे बजता रहता है।
संवेदनशीलता से उत्तेजना तक
अश्लीलता का प्रभाव केवल संगीत तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह समाज की सोच और व्यवहार को भी प्रभावित करता है। पहले जहां भोजपुरी गीत पूरे परिवार के साथ बैठकर सुने जाते थे, वहीं आज कई गाने ऐसे हैं जिन्हें परिवार के बीच सुनना असहज हो जाता है। महिलाओं और बच्चों के लिए सार्वजनिक आयोजनों का माहौल भी बदल गया है। भाषा का सौंदर्य और भावनात्मक गहराई अब दोअर्थी और उत्तेजक शब्दों में सिमटती जा रही है। यह बदलाव धीरे-धीरे समाज की संवेदनशीलता को कम कर रहा है।
भोजपुरी की छवि पर असर और हीन भावना
अश्लीलता के इस बढ़ते प्रभाव ने भोजपुरी की छवि को भी गंभीर नुकसान पहुंचाया है। आज कई लोग इसे “अश्लील भाषा” के रूप में देखने लगे हैं। शहरी युवाओं में भोजपुरी बोलने को लेकर झिझक बढ़ी है और सोशल मीडिया पर इसका मजाक बनाया जाता है। यह स्थिति भाषा के अस्तित्व के लिए खतरनाक है, क्योंकि जब किसी भाषा के प्रति हीन भावना पैदा हो जाती है, तो उसका सामाजिक उपयोग स्वतः कम होने लगता है।
क्या सिर्फ अश्लीलता ही जिम्मेदार है?
हालांकि यह भी सच है कि परंपराओं के क्षरण के पीछे अन्य कारण भी हैं, जैसे शहरीकरण, पलायन, शिक्षा में स्थानीय संस्कृति की कमी और संस्थागत समर्थन का अभाव। लेकिन इन सभी कारणों के बीच अश्लीलता सबसे तेज़ी से असर डालने वाला कारक बनकर सामने आई है। इसने कम समय में न केवल मनोरंजन की दिशा बदली, बल्कि सामाजिक मान्यताओं और सांस्कृतिक प्राथमिकताओं को भी प्रभावित किया।
संस्कृति को पुनर्जीवित करने की जरूरत
इस स्थिति से बाहर निकलने के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी हैं। सबसे पहले, सामाजिक आयोजनों में लोक कलाकारों को फिर से मंच देना होगा। मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर साफ-सुथरे और गुणवत्ता वाले भोजपुरी कंटेंट को बढ़ावा देना होगा। शिक्षा प्रणाली में लोकसंस्कृति को शामिल कर नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ना होगा। साथ ही, समाज में भोजपुरी भाषा के प्रति गर्व की भावना विकसित करना आवश्यक है, ताकि लोग इसे सम्मान के साथ अपनाएं।
सरकारी हस्तक्षेप और आंकड़े
बिहार सरकार ने कई बार अश्लील भोजपुरी गानों और डीजे पर सख्ती की। 2023-2025 में होली, छठ और सार्वजनिक स्थानों पर अश्लील गाने बजाने पर FIR, जेल और जुर्माने का प्रावधान किया गया। पटना, समस्तीपुर, खगड़िया जैसे जिलों में डीजे संघों ने खुद अश्लील गाने न बजाने की शपथ ली। फिर भी समस्या बनी हुई है। एक ऑनलाइन पिटिशन (Change.org) में लाखों लोगों ने भोजपुरी गीतों से सांस्कृतिक पहचान खोने की शिकायत की।
स्वाद बदलेगा तो ही संस्कृति बचेगी
भोजपुरी संस्कृति का संकट बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक है। यह हमारी पसंद, हमारी स्वीकार्यता और हमारे चुनावों से जुड़ा हुआ है। अश्लीलता ने धीरे-धीरे हमारी सांस्कृतिक संवेदनाओं को कमजोर किया है, लेकिन इसे बदला भी जा सकता है। जरूरत इस बात की है कि हम मनोरंजन के साथ-साथ अपनी सांस्कृतिक जिम्मेदारी को भी समझें। क्योंकि अगर स्वाद नहीं बदला, तो संस्कृति बचाना मुश्किल होगा और अगर संस्कृति नहीं बची, तो भाषा भी ज्यादा दिन तक जीवित नहीं रह पाएगी।

