Bhojpuri24.com की विशेष श्रृंखला ‘भोजपुरी धुरंधर’ में आज परिचय उस साहित्य साधक का, जिन्होंने भोजपुरी भाषा को केवल लोकभाषा के रूप में नहीं देखा, बल्कि उसे विचार, विमर्श, सामाजिक चेतना और साहित्यिक गरिमा से जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य किया। मऊ के डॉ. कमलेश राय भोजपुरी साहित्य के उन धुरंधरों में हैं, जिन्होंने गीत, कविता, दोहा, संपादन और सांस्कृतिक सक्रियता के माध्यम से भोजपुरी को राष्ट्रीय साहित्यिक मंच पर प्रतिष्ठित करने में उल्लेखनीय योगदान दिया है।
वे कवि, गीतकार, सांस्कृतिक कर्मी और सबसे बढ़कर भोजपुरी भाषा की अस्मिता के सजग प्रहरी हैं। उनकी साहित्यिक कृतियां आज भोजपुरी समाज के सामाजिक, सांस्कृतिक और वैचारिक सरोकारों का महत्वपूर्ण दस्तावेज मानी जाती हैं। भोजपुरी और हिंदी साहित्य की सेवा में समर्पित उनका चार दशक से अधिक लंबा साहित्यिक जीवन उन्हें समकालीन भोजपुरी साहित्य का एक विशिष्ट प्रतिनिधि बनाता है।
गाजीपुर की माटी से निकला साहित्य का साधक
31 अक्टूबर 1960 को उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जनपद के मुर्तजीपुर गांव में जन्मे डॉ. कमलेश राय का बचपन ग्रामीण परिवेश और लोक संस्कृति की समृद्ध परंपराओं के बीच बीता। उनके पिता स्वर्गीय आदित्य देव राय तथा माता स्वर्गीय मदिता राय ने उन्हें भारतीय संस्कृति, मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक मूल्यों के संस्कार दिए।
गांव की चौपाल, लोकगीतों की स्वर लहरियां और जनजीवन के अनुभवों ने उनके भीतर साहित्य के प्रति गहरा अनुराग पैदा किया। यही अनुराग आगे चलकर उनके जीवन की साधना बन गया। आज उनकी पहचान केवल एक साहित्यकार के रूप में नहीं, बल्कि भोजपुरी भाषा और संस्कृति के समर्पित संवाहक के रूप में स्थापित हो चुकी है।

शिक्षा और साहित्य का अद्भुत संगम
डॉ. कमलेश राय ने उच्च शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं। उन्होंने एम.ए. और पी-एच.डी. की उपाधियां प्राप्त कीं और साहित्यिक अध्ययन को सामाजिक सरोकारों के साथ जोड़कर देखा। उनकी शैक्षणिक दृष्टि ने उनके साहित्य को वैचारिक गहराई प्रदान की है।
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वे उन साहित्यकारों में शामिल हैं, जिन्होंने भोजपुरी साहित्य को केवल भावनात्मक अभिव्यक्ति तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे गंभीर साहित्यिक विमर्श और अकादमिक अध्ययन का विषय बनाया।
भोजपुरी साहित्य के राष्ट्रीय मंच पर भी दखल
डॉ. कमलेश राय लंबे समय से देश की अनेक प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े रहे हैं। विश्व भोजपुरी सम्मेलन, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान, हिंदुस्तानी एकेडमी प्रयागराज, भोजपुरी मैथिली अकादमी दिल्ली और भोजपुरी साहित्य अकादमी भोपाल सहित अनेक संस्थाओं द्वारा आयोजित साहित्यिक संगोष्ठियों और कवि सम्मेलनों में उनकी सक्रिय भागीदारी रही है।
वे विश्व भोजपुरी सम्मेलन के आजीवन सदस्य हैं और अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन की प्रवर समिति के सदस्य के रूप में भी साहित्यिक गतिविधियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे और वर्तमान में इसके राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं। भोजपुरी भाषा के संरक्षण और संवर्धन के लिए उनके प्रयास लगातार जारी हैं।

कबीर की चेतना को समकालीन समाज से जोड़ने वाले कवि
डॉ. कमलेश राय की चर्चित भोजपुरी कृति ‘अइसन आज कबीर कहां’ उनके साहित्यिक व्यक्तित्व का सबसे सशक्त परिचय प्रस्तुत करती है। यह केवल एक गीत संग्रह नहीं, बल्कि आधुनिक समाज में कबीर जैसी निर्भीक और जनपक्षधर चेतना की खोज है।
उनकी रचनाओं में सामाजिक विसंगतियों पर तीखी दृष्टि दिखाई देती है। वे लोकभाषा में समाज से प्रश्न पूछते हैं और साहित्य के माध्यम से जनचेतना को जागृत करने का कार्य करते हैं। उनकी लेखनी लोकजीवन की संवेदनाओं, सांस्कृतिक मूल्यों और मानवीय सरोकारों की प्रतिनिधि है।
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साहित्य के अनेक रंग
डॉ. कमलेश राय की साहित्यिक कृतियां उनकी बहुआयामी प्रतिभा की परिचायक हैं। उनकी प्रमुख प्रकाशित पुस्तकें हैं-

तोहरो बिहान दांव पर (भोजपुरी गीत संग्रह)
अइसन आज कबीर कहां (भोजपुरी गीत संग्रह)
सन्नाटा बोलता है (हिंदी काव्य संग्रह)
रखिए शब्द सहेज कर (दोहा पंचशती)
हर समय में हंसे धरती (भोजपुरी गीत संग्रह)
उनकी रचनाओं में भोजपुरी समाज के बदलते स्वरूप, ग्रामीण जीवन की चुनौतियां, सांस्कृतिक संकट और मानवीय संवेदनाओं का गहरा चित्रण मिलता है। वे लोक और समकालीन समाज के बीच साहित्यिक संवाद स्थापित करने वाले रचनाकार हैं।
भोजपुरी फिल्मों और प्रसारण माध्यमों में भी दिया योगदान
डॉ. कमलेश राय का साहित्य केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं है। उन्होंने भोजपुरी फीचर फिल्म ‘चिरइयो न बोले’ के लिए गीत लेखन, संगीत धुनों की कंपोजिंग तथा संवादों का भोजपुरी भाषानुवाद किया है।
उनकी रचनाओं का प्रसारण दूरदर्शन, आकाशवाणी और विभिन्न टेलीविजन चैनलों के माध्यम से भी हुआ है। इससे भोजपुरी साहित्य और लोकभाषा को व्यापक जनसमुदाय तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण सहायता मिली है।
‘शब्दिता’ के माध्यम से साहित्यिक चेतना का विस्तार
डॉ. कमलेश राय मऊ से प्रकाशित समकालीन चिंतन और सृजन की साहित्यिक पत्रिका ‘शब्दिता’ का संपादन एवं प्रकाशन कर रहे हैं। साहित्यिक पत्रकारिता के इस क्षेत्र में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है।
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‘शब्दिता’ केवल एक पत्रिका नहीं, बल्कि साहित्यिक संवाद का मंच है, जहां स्थापित और नवोदित साहित्यकारों को समान अवसर प्रदान किया जाता है। नई पीढ़ी के लेखकों को मंच उपलब्ध कराने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
सम्मानों से अलंकृत साहित्यिक यात्रा
डॉ. कमलेश राय की साहित्य साधना को देश-विदेश की अनेक प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्थाओं ने सम्मानित किया है। उनकी रचनात्मकता और भोजपुरी भाषा-संस्कृति के प्रति समर्पण के लिए उन्हें राहुल सांकृत्यायन सम्मान (उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ), एकेडमी सम्मान (हिंदुस्तानी एकेडमी, प्रयागराज), आचार्य विद्यानिवास मिश्र लोक कवि सम्मान, आचार्य महेंद्र शास्त्री पुरस्कार, साहित्य श्री सम्मान (काठमांडू, नेपाल), काव्य किरीट सम्मान, विशिष्ट साहित्यकार सम्मान, पं. श्याम नारायण पांडेय स्मृति सम्मान, सेवक साहित्य श्री सम्मान, बाबा श्याम दास सम्मान, स्वामी विवेकानंद सम्मान, सरयू शिरोमणि सम्मान, सरस्वती सम्मान, पाती अक्षर सम्मान, प्रो. रामप्यारे तिवारी स्मृति सम्मान और सर्जना सम्मान सहित अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से अलंकृत किया जा चुका है।

वर्ष 2023 में हिंदुस्तानी एकेडमी, प्रयागराज द्वारा उन्हें प्रतिष्ठित ‘एकेडमी सम्मान’ प्रदान किया गया। यह सम्मान उनकी दीर्घकालीन साहित्य साधना, भोजपुरी भाषा के संवर्धन और भारतीय साहित्य में उनके महत्वपूर्ण योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर मिली एक बड़ी पहचान है। उनके सम्मान केवल व्यक्तिगत उपलब्धियां नहीं, बल्कि भोजपुरी साहित्य की समृद्ध परंपरा और लोकभाषा की बढ़ती प्रतिष्ठा के प्रतीक हैं।
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आकाशवाणी और साहित्यिक मंचों के लोकप्रिय कवि
डॉ. कमलेश राय की कविताएं और गीत देशभर के अनेक साहित्यिक मंचों पर सराहे जाते रहे हैं। आकाशवाणी और दूरदर्शन के माध्यम से उनकी रचनाओं का नियमित प्रसारण उनकी लोकप्रियता का प्रमाण है। वे अपने सहज और प्रभावशाली काव्य पाठ के लिए साहित्यिक जगत में विशेष पहचान रखते हैं।
क्यों हैं भोजपुरी धुरंधर?
डॉ. कमलेश राय को भोजपुरी धुरंधर इसलिए कहा जाना चाहिए क्योंकि उन्होंने भोजपुरी साहित्य को लोकजीवन, सामाजिक चेतना और अकादमिक विमर्श से जोड़ते हुए उसे राष्ट्रीय साहित्यिक पहचान दिलाने का महत्वपूर्ण कार्य किया है। उनकी लेखनी में कबीर की निर्भीकता, लोकजीवन की आत्मीयता और समाज के प्रति गहरी प्रतिबद्धता दिखाई देती है।
भोजपुरी धुरंधर श्रृंखला में डॉ. कमलेश राय उस साहित्य पुरोधा के रूप में दर्ज हैं, जिन्होंने शब्दों को केवल कविता नहीं बनाया, बल्कि उन्हें भोजपुरी समाज की चेतना और सांस्कृतिक अस्मिता का स्वर बना दिया।


भोजपुरी लोक जीवन को निकट से देखकर लिखने वाले कवि, गीतकार, गजलको हैं डॉ० कमलेश राय जी। बधाई और शुभकामनाएँ।