छपरा। भोजपुरी भाषा और साहित्य को नई पहचान देने वाले प्रसिद्ध साहित्यकार एवं भोजपुरी के प्रथम उपन्यासकार रामनाथ पांडेय की जयंती के अवसर पर सारण जिले के बनियापुर स्थित सीताराम वाटिका में एक भव्य साहित्यिक गोष्ठी और विचार-विमर्श कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में साहित्यकारों, शोधकर्ताओं, शिक्षकों और भोजपुरी प्रेमियों ने उनकी साहित्यिक विरासत को याद करते हुए भोजपुरी भाषा के विकास में उनके योगदान पर विस्तार से चर्चा की।
कार्यक्रम का शुभारंभ रामनाथ पांडेय के चित्र पर माल्यार्पण और दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। वक्ताओं ने कहा कि रामनाथ पांडेय केवल एक लेखक नहीं थे, बल्कि भोजपुरी साहित्य के ऐसे पुरोधा थे जिन्होंने भोजपुरी को उपन्यास जैसी गंभीर साहित्यिक विधा से जोड़ा। उनका प्रसिद्ध उपन्यास ‘बिंदिया’ भोजपुरी का पहला उपन्यास माना जाता है, जिसने भोजपुरी साहित्य को नई दिशा और पहचान प्रदान की।
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इस अवसर पर आयोजित संगोष्ठी में “रामनाथ पांडेय के उपन्यासों में प्रतिरोध और सामाजिक चेतना” विषय पर विशेष चर्चा हुई। वक्ताओं ने कहा कि उनकी रचनाओं में ग्रामीण जीवन, सामाजिक विषमताएं, नारी संघर्ष, मानवीय संवेदनाएं और सामाजिक न्याय की गहरी अभिव्यक्ति दिखाई देती है। उनकी कृतियां आज भी समाज और साहित्य के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।
साहित्यकारों ने कहा कि वर्तमान समय में जब क्षेत्रीय भाषाओं के सामने अनेक चुनौतियां हैं, तब रामनाथ पांडेय का साहित्य नई पीढ़ी को अपनी भाषा, संस्कृति और जड़ों से जोड़ने का काम करता है। उनकी रचनाएं भोजपुरी समाज के जीवन, संघर्ष और सांस्कृतिक मूल्यों का जीवंत दस्तावेज हैं।
कार्यक्रम के दौरान कई साहित्यकारों और कवियों ने अपने विचार व्यक्त किए तथा भोजपुरी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग को दोहराया। साथ ही राष्ट्रीय भोजपुरी संस्थान के नए पदाधिकारियों को मनोनयन पत्र भी प्रदान किए गए।
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वक्ताओं ने कहा कि भोजपुरी साहित्य के इतिहास में रामनाथ पांडेय का योगदान अविस्मरणीय है। यदि उन्होंने भोजपुरी में उपन्यास लेखन की शुरुआत नहीं की होती, तो संभवतः भोजपुरी साहित्य का विकास इतनी तेजी से नहीं हो पाता। आज भी उनके साहित्य पर शोध कार्य हो रहे हैं और नई पीढ़ी उनके लेखन से प्रेरणा प्राप्त कर रही है।
भोजपुरी साहित्य को नई दिशा देने वाले साहित्यकार
रामनाथ पांडेय को भोजपुरी साहित्य का एक महत्वपूर्ण स्तंभ माना जाता है। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से भोजपुरी भाषा को केवल लोकभाषा तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि उसे साहित्य की मुख्यधारा में स्थापित करने का महत्वपूर्ण कार्य किया। उनकी जयंती पर आयोजित यह कार्यक्रम उनकी साहित्यिक साधना और योगदान को याद करने का एक महत्वपूर्ण अवसर बना।

