भोजपुरी के संवेदनशील साहित्यकार चंद्रेश्वर, गाँव, समाज और मनुष्यता के कवि

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भोजपुरी धुरंधर- चंद्रेश्वर, गाँव, समाज और मनुष्यता की आवाज़

भोजपुरी साहित्य में कुछ ऐसे रचनाकार हैं जिनकी लेखनी केवल शब्दों का संसार नहीं रचती, बल्कि समाज की धड़कनों को भी अभिव्यक्ति देती है। चंद्रेश्वर ऐसे ही साहित्यकार हैं, जिन्होंने हिन्दी और भोजपुरी दोनों भाषाओं में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई है। उनकी रचनाओं में गाँव की मिट्टी की महक, किसान जीवन का यथार्थ, सामाजिक बदलावों की बेचैनी और मनुष्यता की गहरी संवेदना एक साथ दिखाई देती है।

ग्रामीण पृष्ठभूमि और जीवन अनुभव

30 मार्च 1960 को बिहार के बक्सर जिले के आशा पड़री गाँव में एक साधारण किसान परिवार में जन्मे चंद्रेश्वर ने ग्रामीण जीवन को बहुत करीब से देखा और जिया। यही कारण है कि उनकी रचनाओं में गाँव केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक संसार के रूप में उपस्थित होता है। बचपन के अनुभवों ने उनके भीतर समाज और मनुष्य को समझने की दृष्टि विकसित की, जो आगे चलकर उनकी साहित्यिक पहचान का आधार बनी।

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शिक्षा पूरी करने के बाद उनका चयन उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा आयोग, प्रयागराज द्वारा हुआ और 1 जुलाई 1996 को उन्होंने बलरामपुर के एम.एल.के. पी.जी. कॉलेज में हिन्दी विभाग में अध्यापन कार्य शुरू किया। लगभग 26 वर्षों तक उन्होंने शिक्षक, शोधकर्ता और साहित्यकार के रूप में महत्वपूर्ण योगदान दिया। विद्यार्थियों को साहित्य पढ़ाने के साथ-साथ उन्होंने उन्हें सामाजिक और साहित्यिक चेतना से भी जोड़ने का काम किया। 30 जून 2022 को विभागाध्यक्ष एवं प्रोफेसर पद से सेवानिवृत्त होने के बाद भी उनकी रचनात्मक यात्रा रुकी नहीं। आज वे लखनऊ में रहकर लगातार लेखन और साहित्यिक गतिविधियों में सक्रिय हैं।

प्रमुख साहित्यिक कृतियाँ और रचनात्मक संसार

चंद्रेश्वर का साहित्यिक संसार बेहद व्यापक है। उनकी कविताएँ, लेख और समीक्षाएँ हिन्दी और भोजपुरी की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रही हैं। उनकी हिन्दी कविता संग्रह ‘अब भी’ (2010), ‘सामने से मेरे’ (2017) और ‘डुमरांव नजर आएगा’ (2021) ने उन्हें एक संवेदनशील और सजग कवि के रूप में स्थापित किया। इन कृतियों में समय, समाज और मनुष्य के बदलते संबंधों की गहरी पड़ताल दिखाई देती है।

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कविता के अलावा उन्होंने शोध और समाजशास्त्र के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय कार्य किया है। उनकी पुस्तक ‘जन नाट्य आंदोलन’ (1994) सांस्कृतिक आंदोलनों का गंभीर अध्ययन प्रस्तुत करती है, जबकि ‘इप्टा आंदोलन: कुछ साक्षात्कार’ (1998) सामाजिक विमर्श को नई दृष्टि देती है। साहित्य और समाज के बीच संवाद स्थापित करने की उनकी यह प्रतिबद्धता उन्हें विशिष्ट बनाती है।

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भोजपुरी साहित्य में योगदान और ‘हमार गाँव’

भोजपुरी साहित्य में उनका योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय है। वर्ष 2020 में प्रकाशित उनकी चर्चित कृति ‘हमार गाँव’ ने भोजपुरी साहित्य जगत में व्यापक सराहना प्राप्त की। यह पुस्तक केवल गाँव का वर्णन नहीं करती, बल्कि ग्रामीण जीवन की आत्मा को शब्द देती है। बदलते सामाजिक संबंध, लोक संस्कृति, मानवीय मूल्यों और गाँव की स्मृतियों को जिस आत्मीयता से चंद्रेश्वर ने इस पुस्तक में दर्ज किया है, वह इसे भोजपुरी कथेतर गद्य की महत्वपूर्ण कृतियों में शामिल करता है।  ये भी पढ़ें-भोजपुरी सिनेमा के ‘अमरीश पुरी’ के बारे में आप कितना जानते हैं?

सम्मान, दृष्टि और साहित्यिक विरासत

‘हमार गाँव’ को मिली लोकप्रियता का प्रमाण तब देखने को मिला जब वर्ष 2024 में नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेले में इस कृति के लिए उन्हें प्रथम ‘सर्व भाषा सम्मान’ से सम्मानित किया गया। यह सम्मान हिन्दी के शताब्दी साहित्यकार रामदरश मिश्र के हाथों प्रदान किया गया। यह पुरस्कार भोजपुरी के प्रतिष्ठित साहित्यकार स्मृति शेष चौधरी कन्हैया प्रसाद सिंह की स्मृति में प्रतिवर्ष दिया जाता है। यह सम्मान न केवल चंद्रेश्वर की साहित्यिक उपलब्धि है, बल्कि भोजपुरी भाषा और साहित्य के बढ़ते सम्मान का भी प्रतीक है। इसकी लोकप्रियता को देखते हुए इसका दूसरा संस्करण भी आ चुका है.

इसके बाद वर्ष 2023 में प्रकाशित उनकी भोजपुरी पुस्तक ‘आपन आरा’ ने भी पाठकों के बीच अपनी अलग पहचान बनाई। उनकी भोजपुरी रचनाओं में लोकभाषा की सहजता, जीवन की सच्चाई और सामाजिक सरोकारों का जीवंत चित्रण मिलता है। वे मानते हैं कि भोजपुरी केवल एक बोली नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की सांस्कृतिक अस्मिता और भावनात्मक पहचान है।     ये भी पढ़ें- करोड़ों बोलते हैं, फिर भी ‘भाषा’ नहीं भोजपुरी

चंद्रेश्वर का विश्वास है कि अच्छे साहित्य के पाठक आज भी मौजूद हैं। वे इस धारणा को खारिज करते हैं कि किताबों का पाठक वर्ग समाप्त हो रहा है। उनका मानना है कि यदि रचना ईमानदारी, संवेदनशीलता और साहित्यिक गुणवत्ता के साथ लिखी जाए, तो पाठक उसे अवश्य अपनाते हैं। उनकी पुस्तकों की लोकप्रियता इस विश्वास को मजबूत करती है।

वर्ष 2024 में उन्हें ‘रेवांत साहित्य सम्मान’ से भी सम्मानित किया गया। यह सम्मान उनकी बहुआयामी साहित्यिक प्रतिभा और सतत रचनात्मक योगदान की स्वीकृति है। साहित्य, समाज और लोकजीवन के प्रति उनकी प्रतिबद्धता आज भी उतनी ही मजबूत है जितनी उनके लेखन के शुरुआती दिनों में थी।

भोजपुरी साहित्य के इस धुरंधर रचनाकार की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे अपनी जड़ों से जुड़े हुए हैं। गाँव से निकलकर विश्वविद्यालय तक की यात्रा करने वाले चंद्रेश्वर की रचनाओं का केंद्र आज भी वही आम आदमी है, जो खेतों, खलिहानों, चौपालों और कस्बों में अपना जीवन जी रहा है। यही कारण है कि उनका साहित्य पाठकों के दिल तक सीधे पहुँचता है।

चंद्रेश्वर की लेखनी आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा है। उन्होंने साबित किया है कि सच्चा साहित्य वही है, जो अपने समय, समाज और मनुष्य के सुख-दुख को संवेदनशीलता के साथ अभिव्यक्त कर सके। भोजपुरी और हिन्दी साहित्य में उनका योगदान लंबे समय तक याद किया जाएगा।

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