अवध किशोर ‘अवधू’ की कविताओं में धड़कती है भोजपुरी आत्मा

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Bhojpuri24.com की ‘भोजपुरी धुरंधर’ श्रृंखला में आज पढ़िए अवध किशोर ‘अवधू’ की कहानी। ‘अन्हार में दीया’ जैसे काव्य संग्रह से लेकर आकाशवाणी, दूरदर्शन और देशभर के कवि सम्मेलनों तक, उन्होंने भोजपुरी साहित्य और लोकसंस्कृति को नई पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

भोजपुरी साहित्य की सबसे बड़ी ताकत उसकी लोकधारा और गांव की मिट्टी से जुड़ी संवेदनाएं हैं। इसी परंपरा को अपनी सशक्त लेखनी और मंचीय प्रस्तुति से आगे बढ़ाने वाले कवि हैं अवध किशोर ‘अवधू’। उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले के एक साधारण किसान परिवार में जन्मे अवधू ने खेती को जीवन का आधार बनाया, लेकिन कविता को अपनी पहचान। उनकी रचनाओं में गांव की खुशबू, सामाजिक सरोकार, मानवीय संवेदनाएं और भोजपुरी समाज की आत्मा एक साथ दिखाई देती है। हास्य-व्यंग्य के माध्यम से गंभीर सामाजिक संदेश देने वाले अवधू आज भोजपुरी के लोकप्रिय मंचीय कवियों में गिने जाते हैं।

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गांव की मिट्टी से मिली साहित्य की प्रेरणा

14 जून 1973 को उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जनपद के ग्राम बरवां (रकबा राजा) में जन्मे अवध किशोर का बचपन ग्रामीण परिवेश में बीता। पिता रामजीत यादव और माता शामकली देवी ने उन्हें संस्कार और श्रम का महत्व सिखाया। इंटरमीडिएट तक शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने खेती को अपना व्यवसाय बनाया, लेकिन गांव का जीवन, लोकगीत और सामाजिक अनुभव उनकी रचनात्मकता के आधार बन गए। यही कारण है कि उनकी कविताओं में कृत्रिमता नहीं, बल्कि जीवन का वास्तविक चित्र दिखाई देता है।

खेती के साथ साहित्य साधना, ‘अन्हार में दीया’ बनी पहचान

अवध किशोर का मानना है कि साहित्य समाज को दिशा देने का माध्यम है। खेती-बाड़ी की व्यस्तता के बीच भी उन्होंने अपनी लेखनी को कभी विराम नहीं दिया। उनकी प्रकाशित भोजपुरी काव्य कृति ‘अन्हार में दीया’ इसी साहित्य साधना का परिणाम है। इस संग्रह में समाज की विसंगतियां, उम्मीद, संघर्ष और लोकजीवन की पीड़ा को सहज भाषा में अभिव्यक्त किया गया है। उनकी रचनाएं यह साबित करती हैं कि बड़े साहित्यकार बनने के लिए महानगर नहीं, बल्कि संवेदनशील सोच की आवश्यकता होती है।

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हास्य-व्यंग्य के मंच पर बनाई अलग पहचान

अवधू केवल पुस्तककार ही नहीं, बल्कि एक लोकप्रिय मंचीय कवि भी हैं। उन्होंने आकाशवाणी, दूरदर्शन, अंजन टीवी, बिग मैजिक टीवी और बिग गंगा टीवी जैसे प्रतिष्ठित मंचों पर अपनी कविताओं का पाठ किया है। देशभर में आयोजित अनेक कवि सम्मेलनों में हास्य कवि के रूप में उनकी प्रस्तुति श्रोताओं को खूब पसंद आती है। उनकी कविताओं में हास्य के साथ सामाजिक चेतना का संतुलित समावेश देखने को मिलता है, जो उन्हें अन्य मंचीय कवियों से अलग पहचान दिलाता है।

गीत
आन के जियान कके, काटs जनि चानी
सुतरि जाई जहिये, उतरि जाई पानी
चाभत रहे दही रोज चभकल बिलरिया
लबदा से भेंट भइल छटकल गतरिया
आ गइल इयाद ओ बिलरिया के नानी
सुतरि जाई जहिये, उतरि जाई पानी
चुअला से तरकुल जो माथा कुँचइहें
फिर से सियार नाहीं ताड़े तर जइहें
बिसरी ना तरकुल के हँइचल निसानी
सुतरि जाई जहिये, उतरि जाई पानी
दुसरा में चोरी से जाल जनि फेकs
अवधू हो आपन पोखरिया तू छेंकs
गिरो जनि तहरे मछरिया पर घानी
सुतरि जाई जहिये, उतरि जाई पानी

अवध किशोर ‘अवधू’

सम्मानों ने बढ़ाया भोजपुरी साहित्य का गौरव

अवध किशोर के साहित्यिक योगदान को अनेक संस्थाओं ने सम्मानित किया है। वर्ष 2018 में उन्हें सर्व भाषा ट्रस्ट, नई दिल्ली द्वारा परीक्षण मिश्र साहित्य सम्मान प्रदान किया गया। इसके बाद 2021 में नवांकुर अंजलि साहित्यिक आस्था काव्य मंच ने उन्हें हिंदी सेवा सम्मान से सम्मानित किया। वर्ष 2024-25 में राष्ट्रीय भोजपुरी संस्थान के छठे अधिवेशन में उन्हें प्रतिष्ठित जमादार भाई कवि सम्मान मिला। इसके अतिरिक्त विभिन्न साहित्यिक और काव्य मंचों से भी उन्हें अनेक सम्मान प्राप्त हो चुके हैं।

भोजपुरी ग़ज़ल
जवानी चार दिन के हS चढ़े तब आगि बरि जाला
मगर चारे दिनन के बाद सब गरमी उतरि जाला
चढ़े बइसाख तब सूरज महोदय खूब अँइठेलें
मगर अँइठल उहो अगहन चढ़त दुकहाँ घुसरि जाला
बहुत बा तेल तहरा में दिया से सीख लS कुछऊ
दिया के तेल जरि जाला मगर उजीयार करि जाला
जवानी फूल जस चाहीं फुलाते जग लगे महके
झरे से पूर्व सबका साँस में जाके उतरि जाला
खपल जेकर जवानी जगत के कल्याण में अवधू
सहज ओकर मुअलको सात पीढ़ी साफ तरि जाला
अवध किशोर ‘अवधू’

भोजपुरी केवल मनोरंजन की भाषा नहीं…

अवध किशोर ‘अवधू’ उन रचनाकारों में हैं, जिन्होंने यह सिद्ध किया कि भोजपुरी केवल मनोरंजन की भाषा नहीं, बल्कि समृद्ध साहित्य, संस्कृति और सामाजिक चेतना की भाषा है। उनकी कविताएं गांव के जीवन, किसान की पीड़ा, रिश्तों की गर्माहट और समाज की विसंगतियों को सरल लेकिन प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती हैं। आज भी वे खेती और साहित्य दोनों को समान समर्पण के साथ निभा रहे हैं। भोजपुरी भाषा और साहित्य के संरक्षण तथा संवर्धन में उनका योगदान आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत रहेगा।

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