‘गोहार’ में गूंजत भोजपुरी समाज के पीड़ा, प्रेम आ प्रतिरोध के स्वर

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डाॅ. सुनील कुमार पाठक

भोजपुरी में गद्य से शुरुआत करिके पद्य के दुनियाँ में उतरे वाला हिन्दी-भोजपुरी के सुप्रतिष्ठित साहित्यकार चंद्रेश्वर जी के पहिला भोजपुरी कविता-संग्रह ‘गोहार’ के पढ़े से पहिले हम ‘कवि का ओर से दू गो बात’ के पढ़े लगनीं। अपना एह आत्मकथ्य में कवि कविता के लेके कुछ साफ-साफ बतकही कइले बाड़न। उनकर कहनाम बा-

1- “कविता सच्चाइयन से जोड़ के मनुष्य-जीवन के एगो गति प्रदान करेले। सभ्यता-संस्कृति के रचे-गढ़े में मय संसार में ओकर योगदान विशेष रहल बा। ऊ प्रेम आ प्रतिरोध साथ लेके आपन जय-जतरा प निकलेले।”

2- “कविता से मनुष्य के आत्मा के अंदर के टेढ़ापन दूर हो जाला। ऊ संस्कारित हो जाला। कविता अच्छाई आ बुराई में फर्क करे के पाठ पढ़ावेले। ऊ सच आ झूठ के हिगरावल जानेले। ऊ समाज में फइलल अन्हार के सबसे पहिले चीन्ह लेबे ले। ऊ विवेक आ तर्क के जरिये अँजोर के ओर ले जाले।”

3- “कविता खालिस सोहर ना हऽ। ऊ मिरतू-राग भी हऽ। मर्सिया भी हऽ। कविता के बारे में इहो कहल जा सकेला कि ऊ दूधारी तलवार लेखाँ होले।”

कविता के बारे में कवि के एह नजरिया से ई बात त साफे हो जात बा कि चंद्रेश्वर जी अपना कवितन के जरिये समय आ समाज के सच्चाइयन उकेरे के हरसंभव कोशिश कइले बाड़न। साथही इहो बात ऊ सँकरले बाड़न कि कविता प्रेम आ प्रतिरोध दूनू के साथे लेके आगे बढ़ेले। ऊ कविता के जनम के बेरा गावल जायेवाला सोहर के साथे-साथे ओकरा के मरन-रागो मान के चलल बाड़न—दूधारी तलवार मतिन।

कवि के ई समझदारियो वाजिब बा कि कविता के लगे अइसनका विवेक जरूर रहेला कि ऊ नीमन आ बाऊर के ठीक तरे पहचान-परख सके। कविता नीमन आ अच्छाई के पक्ष में बराबर ठाड़ रहेले, जबकि कवनो तरे के विसंगति आ बाऊरपन के खिलाफ ओकर स्वर प्रतिकार के रहेला।

चंद्रेश्वर जी के कविता में विचार पक्ष जेतना मजबूती के साथ उभरेला, ओकरा में संवेदना के तरलता आ अनुभूतियन के मौलिकतो ओतने भरपूर रूप में रहेला। एही बात का ओर इशारा करत ऊ खुदो अपना आत्मकथ्य में लिखले बाड़ें-“कविता पढ़ि भा लिख के हम अपना भीतर तरी आ तरावट के अनुभव करीला। हमार ग्यान कबो सूखे ना, ऊ संवेदना से जुड़ल रहेला।”

ई बात आज समकालीन कविता के कवि चंद्रेश्वर जी कहत बाड़ें त एह में कुछऊ अजूबा भा नयापन नइखे। मध्यकालीन भक्तिकाल के महाकवि तुलसीदासो जी के त अइसनके मान्यता रहे-

“जौं बरषइ बरु बारि बिचारू।
होहिं कवित मुकुतामनि चारू।”

श्रेष्ठ विचारन के सजलता से कविता मुकुतामनि के चारुता आ सौन्दर्य गहि लेले। कहे में कवनों संकोच नइखे कि चंद्रेश्वर जी के कविता भाव आ विचार, आउर सोच आ संवेदना-दूनू के पूरा संतुलन बना के चलल बिया।

भोजपुरी में चंद्रेश्वर जी के कविता संग्रह आवे के पहिले उनकर दू गो कथेतर गद्य के महत्वपूर्ण किताब आइल बाड़ी सँ- ‘हमार गाँव’ (2020) आ ‘आपन आरा’ (2023)। एह दूनू किताब के भोजपुरी साहित्य जगत में पूरा सम्मान मिलल बा। इहे कारण बा कि पहिलकी के त दूसरका संस्करण प्रकाशक के निकाले के पड़ल बा। पहिलकी किताब हमहूँ बढ़िया तरे पढ़ले बानीं।

बहुते रोचक आ गाँव-जवार के कथा, बोली-बात, आचार-व्यवहार, परम्परा-संस्कृति, कुरीति-कमजोरी, गीत-गवनई, प्रकृति से लगाव, आपसी प्रेम आ मनमुटाव, प्रगति आ ठहराव—सबके फोटोग्राफिक डिस्क्रिप्शन के साथे-साथे ओहिजा हो रहल बदलाव के सकारात्मक आ नुकसानदायी दूनू तरह के परिणामो के झलकावत लेखक अपना कृति में चलल बाड़ें। एह सुललित गद्य के भाषा में एतना प्रवाह आ व्यंजना बा कि ई पूरा कृति एके बइठकिये पढ़ जाये लायक बिया।

किताब में गाँव के प्रति अतीत-राग (Nostalgia) के भाव के साथे-साथे बहुत कुछ अइसनका बा, जवना से वर्तमान भारतीय गाँवन के ऊ छवि उभरि के सामने आ जात बिया, जवना से ई बात साफ हो जात बिया कि तमाम तरे के गड़बड़ियन आ चकरचाली के बावजूद भारतीय गाँव आजो आपन सुघरता आ सम्मोहन बरकरार राखे में कामयाब बाड़ें।

चंद्रेश्वर जी के ‘हमार गाँव’ उनका कवितो में चित्रित भइल बा। एह गाँव में ‘खेती-बारी’ बा, ‘अन्नदाता’ बाड़ें, उनका पधोराई खातिर ‘सतुआ’ बाटे, ‘माई रहे से माइये रहे’ बाड़ी, ‘केवना डाढ़ी प कोइलरि’ बइठल बाड़ी, त कवनों दुआरी ‘बबुआ के लोरी’ गावल जा रहल बा।

अपना एह ग्राम्यबोध के चंद्रेश्वर जी अपना एगो कविता में अभिव्यंजित करत कहत बाड़ें-

“तोहरा बतकही में आ जाला
कबो-कबो देस
दुअरा के धवरा बैल
बाबा के बड़का पितरिया लोटा
लहरात टीकासन भरि के सोटा
ई सब देखि-सुनि के
अचरज होत बा।”
[तोहरा कविता में]

गाँवन के चित्रित करे के दौरान कुछ खतरा होला, जवना ओर इशारा करत डॉ. बलभद्र जी एह किताब के अपना भूमिका में लिखलें बाड़न-“लोक आ लोक संस्कृति पर बात करत अतीत के माया-मोह में लपेटाये के जादे जोखिम होला।”

चंद्रेश्वर जी ई जोखिम उठवले बाड़ें, बाकिर पूरा सावधानीपूर्वक। ऊ बात बनवले भा अझुरवले से जादे उचित समझलें बाड़ें कि सही तस्वीर सामने खड़ा कर दिहल जाए। ऊ किसान के ‘अन्नदाता’ भर बताइके उनकरा के सिकहरा चढ़ा दिहल उचित नइखन मानत। ऊ साँच के परत-दर-परत उघारे के चाहत बाड़न।

उनकर साफ कहनाम बा कि ‘अन्नदाता’ कहिके आ पलखत पावते मुड़ी उतार देबे वाली छली मानसिकता के समझे के जरूरत बा। ना केवल समझे के, बलुक जमके एकर प्रतिरोध आ विरोध करे के जरूरत बा। कवि के शब्दन में ओकर खफाई खुल के सामने आइल बा-

1- “नेयाय आ हक माँगे खातिर
जब उतरबऽ लोगन
राजधानी के राजमारग पऽ
तऽ छछनावहूँ जानेलन
उन्हिका जिनिगी के एगुड़े
मकसद हऽ
रोआइ-रोआइ मारल
पदा-पदा रोआवल
तोहरा अस लोगन के
ढेर बढ़ि जाला प्रतिरोध तऽ
देश के दरोही बतावेलन
जुझारू लोगन के।”
[अन्नदाता]

2- “अब किसान राजा ना
रंक के कतार में शामिल होई
जमीन से मिलल मुआवजा ओकरा
बेटा-बेटियन के शादी में खर्च होई
ऊ सरकारी इमदाद से ना
ओकरा खैरात पऽ जीही लोग
बाकिर ऊहो आखिर कब तक?”
[खेती-बारी]

विकास के नाम पर फोरलेन के जाल, औने-पौने भाव पर खेतीबारी लायक जमीनो के बिस्कुट आ साइकिल कंपनियन खातिर हड़प वाली मानसिकता ई बतावत बिया कि ‘अन्नदाता’ साथे कइसनका परपंच हो रहल बा।

महँगा खाद-बीज आ मजदूरन के घरे भ्रष्टाचार सिखावत, ओह लोग में खैराती बाँट के कामचोर बना दीहल-ई एगो अइसनका समस्या बा, जवना चलते किसान आज एकदम लाचारी के हालत में आ गइल बा।

चंद्रेश्वर जी के कविता एह सगरी सच्चाइयन के उघार के सोझा रख देत बिया। ऊ किसान भा मजदूर के जाँगरचोर बना के उनकरा आगे खियाली पुलाव परोसे के गलत मानत बाड़ें आ ओह लोग के वास्तविक समस्यन, यथा—फसल खातिर कम दाम पर खाद-बीया, पटवन आदि के सुविधा मुहैया करावे आ वाजिब बाजार मूल्य उपलब्ध करावे आदि-के समाधान चाहत बाड़ें।

चंद्रेश्वर जी के कविता किसानी जीवन के हलकानि, ओकर पीड़ा आ संघर्ष के बहुत नजदीक से निरेखत भोजपुरी समकालीन कविता के ताकतवर बनावे के भरपूर कोशिश करत बिया।

चंद्रेश्वर जी लगातार हिन्दी कविता लिखत आ रहल बानीं। अन्य भारतीय भाषा आ विश्व साहित्य के प्रगति से उहाँ के साबका बनल रहल बा। इहे कारण बा कि उहाँ के भोजपुरी कवितो के कथ्य में विषय के विविधता बनल रहल बा। आम तौर पर भोजपुरी कविता के बारे में ई धारणा रहल बा कि उहाँ खाली गीत-गजल भा छंदबद्ध रचना के सराहना बिटोर सकेली सँ, भा जवना कवितन में लयकारी कम-से-कम जरूर रही ताकि ऊ गावल-रेघावल जा सके। ओहिजा ‘बाकिर’ (शारदानंद प्रसाद), ‘ई हरनाकुस मन’ (पांडेय सुरेन्द्र), ‘जोत कुहासा के’ (प्रो. ब्रजकिशोर), ‘टटात परछाईं’ (विश्वरंजन), ‘लेके ई लुकार हाथन में’ (डॉ. स्वर्णकिरण), ‘एगो मेहरारू’ (महेन्द्र गोस्वामी), ‘कुछ खास किसिम के आवाज’ (शशिभूषण लाल), ‘औरत जात’ (मलयार्जुन) आदि दर्जनन महत्वपूर्ण कविता संग्रहनो के भोजपुरी के समकालीन कविता के समृद्ध करे में प्रमुख योगदान रहल बा।

तैयब हुसैन पीड़ित, भगवती प्रसाद द्विवेदी, ब्रजभूषण मिश्र, प्रकाश उदय, बलभद्र, जितेन्द्र कुमार, चंद्रदेव यादव, सदानंद शाही, लक्ष्मीकांत मुकुल आदि कवियन के परम्परा में चंद्रेश्वर जी के भोजपुरी समकालीन कविता में प्रवेश एगो अइसन परिघटना मानल जाई, जेकरा जरिये हिन्दी के आउरो बहुते कवि भोजपुरी में अपना कवितन के संग्रह सौंपे के सोचिहें।

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हिन्दी समकालीन कविता में देशज बिम्बन-प्रतीकन के प्रयोग, लोक-संस्कृति, लोकाचार आ लोककथा आदि के छटा आ भाव-भंगिमा के उपयोग के जवन प्रवृत्ति हिन्दी में नागार्जुन, त्रिलोचन, अरुण कमल, अष्टभुजा शुक्ल आदि से लेके आज रूपम मिश्र आ प्रभात जी तक ले देखे के मिलत बा, ऊ सब त भोजपुरिया कवियन खातिर अपना घर के थाती रहल बा।

अपना भूमिका में चंद्रेश्वर जी के ‘गोहार’ के कवितन पर अपन बात राखत डॉ. बलभद्र जी कुछ बहुत सार्थक चर्चा कइले बाड़न। ऊ कहत बाड़ें-

“सत्ता से सवाल आ असहमति चंद्रेश्वर के कविता के एगो आपन स्वर बा। आज के अस्सी प्रतिशत से अधिक भोजपुरी साहित्य सत्ता से इयारी के साहित्य ह। भोजपुरी के मंच पर सत्ता के दखल बा आ कवि-लेखक लोग सत्ता के चाकर। चंद्रेश्वर के लेखन एह से अलग बा।”

भोजपुरी साहित्य के लेके बलभद्र जी के ई टिप्पणी बहुत गंभीर बा। बलभद्र जी अपना टिप्पणी में एक ओर अगर अधिकतर भोजपुरी साहित्य के ‘सत्ता से इयारी के साहित्य’ कह रहल बानीं, त दोसरा ओर भोजपुरी मंच पर सत्ता के ‘दखल’ के गैरवाजिब बता रहल बानीं। भोजपुरी मंचन पर सत्ता के दखल खूब बढ़ल बा, एह में कवनों दू राय नइखे। बाकिर आज के भोजपुरी साहित्य के अस्सी प्रतिशत के सत्ता से इयारी के साहित्य बता दिहल हमरा तनिका आक्रोश आ नाराजगी लेखाँ जादे लागत बा।

हमनी आज के सैकड़न ओह जनधर्मी कवियन के देशज संवेदना के, सत्ता के विरुद्ध उनका संघर्ष के नइखीं नकार सकत, जवन भोजपुरी कविता के आज मूल स्वर बन सके में कामयाब दिख रहल बा। अपना एगो हिन्दी आलेख ‘समकालीन भोजपुरी कविता’ में अइसनका अनेक कवियन के रचनन के जरिए भोजपुरी कविता में हाजिर मौजूदा समय आ समाज के बीच उपजल तल्खी आ ओकर कारनन के पहचान करत सत्ता के खिलाफ प्रतिरोध के रेखांकित करे के प्रयास कइले बानीं।

हमरा उमेद बा बलभद्र जी ई आलेख जरूर पढ़ले होखबि आ भोजपुरी साहित्य, खास करिके भोजपुरी कविता से उहाँ के शिकायत कमल होई।

चंद्रेश्वर जी सत्ता से सवाल करे वाला आज इकलौता भोजपुरी कवि नइखन। जितेन्द्र कुमार, प्रमोद कुमार तिवारी, प्रकाश उदय, खुद बलभद्र, कुमार विरल, सुरेश काँटक, गुलरेज शहजाद, हरेन्द्र हिमकर, मिथिलेश गहमरी, तंग इनायतपुरी, चंद्रदेव यादव, नुरैन अंसारी आदि दर्जनन कवियन के जमात उनका साथे ठाड़ बा। एह कवियन के कविता पर नजर डालल जा सकत बा, जिनका कविता के मूल स्वर सत्ता से असहमति आ शोषण के प्रतिरोध के रहल बा।

रहल बात सत्ता के मंचन पर दखल के, त हमरा कबो-कबो बुझाला कि भोजपुरी में शुरूए से पाग-पगड़ी, चादर-माला के जवन लकम लाग गइल, ऊ आज महामारी के रूप ले लेले बा। अब त मानपत्र मढ़वा के खूबसूरत मोमेंटो के साथे दिआये लागल बा। सिकहरा चढ़ाके गैरसाहित्यिक संस्कार वाला साहित्यकारन के भोजपुरी मठाधीश लोग अपना विरोधी के खिलाफ लोहकारे आ गारागारी में भिड़ा देत बा। ई मठाधीश लोग के आँवक में भोजपुरी मंच अझुरा के रह गइल बा।

जाति, धरम, क्षेत्र के आधार पर गुटबंदी से भोजपुरियो साहित्य आज अछूता नइखे रह गइल। सत्ता के ओर झुकाव के एगो आउर कारण ऊ ‘आठवीं सूची’ वाला कंगनवो हो गइल बा, जवना के लालच में भोजपुरिहा अब ठगाते ना, हताइलो शुरू हो गइल बा।

हमरा समझ से ई नवरतनी कंगना मिलबो करी त ओह लेखाँ जइसे हारल-थाकल मन के कवनों जीवन-अनुदान मिलल होखे, तड़कल खेतन के कवनों घटा के दूई बूँद फुहार मिलल होखे, सेराइल सपनन के झूठा दिलासा मिलल होखे।

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बलभद्र जी बिलकुल ठीक कहले बानीं मंचन पर सत्ता के दखल वाली बात। सत्ता के गोदी में बइठके ओकर मुखालफत ना हो सकी। आरती उतारत ढेर दिन हो गइल। गिरोहबंदी आ आपन छोट-छोट मन-मुटाव छाड़ि के भोजपुरिया एकवट के जब आपन बिगुल बजा दीहें, त सत्ता के कान खड़ा होखे लागी।

जबले आपन नोकसान ना बुझाय, सत्ता ना चेतेले। तथ्य आ तर्क सब भोजपुरी के हक में बा, बस घाती बाड़ें अपने कुछ पोंछडोलावन महाप्रभु सभे, जे जिनिगी के आखिरी दिनो में सभ चढ़ावन अपने माथे सहोटे खातिर आतुर हो उठल बाड़ें। सत्ता के विरोध के साथे-साथे भोजपुरी का अपना भीतरी भस्मासुरो लोग से जान बचावे के बा।

समकालीन भोजपुरी कविता के कवियन के अनेक अइसन कविता मिल जइहें सँ, जवनन में कवि कविता भा कवि के लेके कुछ बात कहले होई भा अपना काव्य-दृष्टि के स्पष्ट कइले होई। ‘गोहार’ के कवियो अपना कुछ कवितन में कविता के लेके आपन कुछ बात रखले बाड़न, जवनन के जरिये उनकर काव्य-दृष्टि के परिचय मिलत बा। कहल जाला कि कविता आ कवि-व्यक्तित्व के फरिया-फरिया के देखल कठिन होला। कविता में कवि के व्यक्तित्व के साफ झलक देखे के मिलेला। काव्य-शैलियो पर कवि-व्यक्तित्व के भरपूर प्रभाव पड़ेला।

अपना कविता-संग्रह ‘परिमल’ के ‘भूमिका’ में निराला जी के कहनाम रहे कि मनुष्य के मुक्ति के तरे कवितो के मुक्ति के होले। मनुष्य के मुक्ति कर्म के बंधन से अलग हो गइल हटे आ कविता के मुक्ति के मायने छंदन आ काव्य-रूढ़ियन के बंधन से कविता के स्वतंत्र हो गइल मानल जाला। भोजपुरी के समकालीन कविता के अधिकतर कवियन मतिन चंद्रेश्वर जी के काव्य-शैलियो पर उनका निर्बंध, सर्वतंत्र-स्वतंत्र व्यक्तित्व के भरपूर प्रभाव पड़ल बा।

फ्रांसिसी चिंतक आ विचारक बफन के मान्यता बा कि—”Style is the man himself.” माने कि जीवन-शैली मनुष्य के व्यक्तित्व के सीधे तौर पर अनुगामिनी होले। मनुष्य एकरे जरिए अपना के अभिव्यक्त करेला। चंद्रेश्वर जी के कविता आ उनकर काव्य-शैली पर उनकर स्वतंत्रता आ समानता-कामी कवि-व्यक्तित्व के स्पष्ट छाप देखे के मिलत बा। अपना एगो कविता में ऊ कहत बाड़न—

“ई एगो अइसन समय रहे/जेवना में कई-कई गो कवि गन/थोरिके असुविधा में पड़ते/चुपाई मार जात रहे/भा पूँछ हिलावे-डोलावे लागत रहे/जादा होखे त मोका पर बोलहीं के बेर/पगुराये लागत रहे/भोरहरिए से साँझ ले।” (हरि गुन)

-कविता में पगुरइनी साँचो बड़ बाऊर बेमारी हऽ।

समकालीन कवि पर समय के अइसनका दबाव बा कि ऊ कविता में ‘पगुरइनीं’ देखावत अपना कवि-धरम के ठीक से नइखे निबाह सकत। चंद्रेश्वर जी एक जगे एह ‘पगुरइनीं’ आ ‘ठकुरसोहाती’ बात बोले के हेय मानत खुल के कह रहल बाड़न-

“झूठे आवत बा आँकड़ा/टीवी न्यूज चैनलन प/अखबारो से सच अब/दूर परा गइल/कवितो के हाल बेहाल बा बहुत/मैराथन में पाँव ओकर/साचहूँ लड़खड़ा गइल।/गोली चलल बहुते एनकाउंटर में/माफिया के मकान प/देखते-देखते केस रेप के/बढ़िया गइल/गजबे ई आइल बा बखत/बखत प आपन तनिके में/चीन्हा गइल।” (गजबे ई आइल बा बखत)

-एह रचना में कवि एकसाथे कई-कई बातन पर से भरम आ छल के छिलका नोचत-हटावत ई साफ कह रहल बा कि विभिन्न संचार-माध्यमन के जरिए समाचार आ सूचनन के जवन ढेह लागल दिख रहल बा, ओमें कवनों सच्चाई नइखे। ऊ सब झूठ के पोलिंदा बाड़े सँ। ओइसहीं धकाधक बिना गंभीर सोच आ संवेदना के जवन कविता लिखा रहल बाड़ी सँ आ कवि सब मैराथन में शामिल बाड़े, ओकरा चलते कवितो के हाल बेहाल होत जा रहल बा। भोजपुरी समकालीन कवितो में जवन एकतरहीपन देखे के मिल रहल बा, ओकर कारण छंदमुक्ति के नाजायज फायदा उठावत अँवाट-बँवाट कुछऊ परोस के कइसहूँ लोकप्रसिद्ध हो जाये के विकल मनोकामना बा।

कवि के एह ‘मैराथन दौड़’ के एगो कारण आज के समय में हो रहल लगातार सूचना के विस्फोटो हो सकत बा। सूचना के ई विस्फोट लगातार एतना तेजी से हो रहल बा कि ओकर सम्यक आ सघन प्रभाव कवि-मन पर पड़ल कठिन हो जात बा। विश्व के कवनों कोना में घटे वाली घटनन के जानकारी पल भर में सभका मिल जा रहल बा। एक जगह के कवनों घटना पर मनई जब ले कुछ गंभीरता से सोचो-समझो, ताले ऊहू ले जादे हैरान करे वाली कवनों घटना दुआरे हाजिर हो जात बा। सूचना के एह रेलारेलियो के ई नतीजा बा कि कवि गंभीर सोच आ विचार के साथे अपना रचनन में उपस्थित नइखे हो पावत।

चंद्रेश्वर जी आज के दौर के एह मजबूरी के बूझत-समुझत अपना रचनन में पर्याप्त विषय-वैविध्य ले आवे के प्रयास में बाड़न। ऊ अपना कविता के मामूली से मामूली बातन आ चीजन से जोड़ के चलल बाड़ें आ अपना अड़ोस-पड़ोस के लोग-बाग, देस-दुनिया, पशु-पक्षी, बेवहार, बेवस्था—सभके निरखत-परखत चलल बाड़ें। उनकर कहनाम बा—

“तोहार कविता में आवत बा/बार-बार देस/तोहरा चिंता में समाइल बा देस/ई पढ़ि-सुनि के अचरज होत बा ××××× तोहार बतकही में आ जाला/कबो-कबो देस/दुआर के धवरा बएल/बाबा के बड़का पितरिया लोटा/लहरात टीकासन भरि के सोटा/ई सब देखि-सुनि के अचरज होत बा।” (तोहार कविता में)

-एजवा “बाबा के पितरिया थरिया” आ “दुआर के धवरा बएल” जइसनका प्रतीक लोक जीवन में सभ्यता-विमर्श के अइसनका सवाल खड़ा कर रहल बाड़े सँ, जवना में परम्परागत जीवन-मूल्यन आ विरासत के संगिरहा के एगो बहुते सार्थक बहस भोजपुरी कविता में छिड़त दिख रहल बा।

जवना दौर में केहू आपनो तनिके में आपन स्वारथ लेके प्रकट हो जात बा आ जुरते लखा जात बा, ओह दौर में निराशा के धुँधुलका छाँटे खातिर कवि के सजगता काबिलेगौर बा। ओकर गोहार बा—

“कवि साँचो/शब्दन के संगत से/अब बनि जा पहरुआ/हो जा सावधान/एह समय के बहुते/जरूरत बा/तोहार..।” (शिकायत पेटी)

कवि अपना एह गोहार के पहिले अपना एही रचना में एक जगहा सावधान करत कहले बा—”चूमत चाहे लऽ हाथ ऊहे/जवन सनाइल बा खून से/तोहार शब्द डूबल रहत बा/एहघरी चमचई के/गाढ़ चासनी में।” (शिकायत पेटी)

‘शिकायत पेटी’ कविता के अंत जवना तरे गोहार के रूप में भइल बा—ऊ आज के कविता के शिल्प आ कहन के तौर-तरीका के दिसाईं तनिका निराश करे वाला जरूर बा, बाकिर कवि के मंगल कामना के ईमानदारी पर अचिको शंका नइखे कइल जा सकत। कविता के शुरुआती पंक्ति बाड़ी सँ—”कवि, तोहार दिमाग/खलिसा शिकायत पेटी तऽ/ना हो सके।”

स्पष्ट बा कि कविता के नकारात्मक चिंतन आ वर्णन से भरि के कवि खाली इहे नइखे बतावे के चाहत कि एह दुनिया में जवन कुछ बा—सब बाऊरे बा। ई सही बा कि हमनीं के जनतंत्रो आज जाति, धरम, संप्रदाय, नसल आदि में बुरा तरे बझल-फँसल दिख रहल बा। नेता अपना हिसाब से एह जनतंत्र के परिभाषा गढ़त जा रहल बाड़ें। समाज के बाँट के राखल आज अपना सत्ता के बरकरार राखे खातिर जरूरी समझल जाये लागल बा। हैरत वाली बात बा कि सत्ता के मायाजाल के समझला के बावजूदो आम जन ओकरा से टकराये खातिर तइयार नइखे। बाकिर कविता लगातार एह कोशिश में बिया कि प्रतिरोध आ संघर्ष के ऊ तेवर ओकर बनल रहे, ताकि जेतने आ जवन कुछ नीमन आ जीवन के सुघर आ सुन्दर बनावे खातिर बाचल रह गइल बा, ओकरा के कम-से-कम जरूर बचा लिआव। बाचल नीक के बचा लेबे के कोशिश में चंद्रेश्वर के कवितो खूब तत्पर दिखत बिया।

चंद्रेश्वर जी के कविता के कैनवास बहुत लमहर बा। एमें गाँव-जिरात, पशु-पक्षी, अन्न-पिसान, खेती-बारी, किसान-मजदूर, सामाजिक कुपरंपरा, भ्रष्टाचार, विकास के नाम पर जमीन-हड़प, दारू के नशा में बिलात आ भटकत समाज, शहरी जीवन के दिखावा-आडम्बर, बाजारवाद आ कॉरपोरेटी कल्चर के चलते फइल रहल भौतिकतावादी संस्कृति, धार्मिक सहिष्णुता आ सामाजिक सद्भावना के तहस-नहस करेवाली ताकतन के लगातार मिल रहल समर्थन आदि के मजिगर ढंग से चित्रित भइल बा। बाकिर एह कविता-विरोधी समयो में जीवन में रचल-बसल कुछ राग, कुछ आग, कुछ मस्ती, कुछ संवेदना, कुछ संघर्ष आ कुछ स्पंदनो के चंद्रेश्वर जी अपना कविता में बखूबी उतारे आ जगह बनावे देले बाड़ें।

एह संग्रह के शीर्षक-कविता ‘गोहार’ एह संग्रह के शायद सबसे लमहर कविता बिया। कवि एह दौर के सगरी विसंगतियन आ विडम्बना के झलकावत ई स्पष्ट करे के चाहत बाड़ें कि थोरिके भरोसा आ उम्मीद अभियो कविते के प्रति बचल बा, काहे कि ई प्रतिरोध के स्वर बनला के साथे-साथ जीवन जीये के सलीका सिखावत लउकत बिया। एह कविता के कुछ पंक्ति विचारे जोग बाड़ी सँ-

“ऊ एगो कायर समय रहे/
जेवना घरी/
केवनो गुंडा के गुंडा कहे से/
बचत रहे शरीफ लोग/
××× झूठ के डंका बाजत रहे/
देश-दुनिया में ×××
दागदार होखे से/
ना डरत रहे केहू/
अब ईहे सब तऽ/
अलंकरन बाँचल रहे/
सभ्य कहाये वाला/
लोगन खातिर/
नयकी सभ्यता में।”
(गोहार)

दागदार हो जाए के भय जहाँ ना रह गइल होखे, आदमिये आदमी के काट खाए खातिर बेताब हो गइल होखे, जिनगी में इयारी ना, खाली बैर-भावने के बोलबाला बन गइल होखे, कायर समय में गुंडा के गुंडा कहे में लोग कतरात होखे, विचारवान के जहाँ चऊपट-चपाट मान लेबे के मानसिकता मुनासिब बनल जात होखे, साँच सकुचाइल कोना में कतहूँ ठाढ़ होखे आ झूठे के चारू ओर डंका बाजत होखे-अइसनका अनैतिक आ अमानवीय समय में कविते पर सगरी आश टिकल बा-

“भरोसा आ उम्मीद जइसन/
सुन्नर शब्द बाँचल रहि गइल रहन सँ/
खलिसा कवियन के कविते में।”
(गोहार)

कविता के प्रति इहे भरोसा आ विश्वास कवि चंद्रेश्वर के एगो जिंदादिल आ दूरदर्शी कवि साबित कर रहल बा। कविता के प्रति कवि के ई भरोसा मनुष्यता के प्रति ओकर अखंड आस्था के परिचायक बा। ऊ मनुष्य-मनुष्य के बीच हर रिश्ता-नाता के जगवले-जोगवले रहे के चाहत बाड़ें। ऊ माई, बाप, भाई, मामा सभके संबोधित आपन नन्हबीतनी छोट-छोट बाकिर सुबुक-सुबुक कविता लिखले बाड़ें, जवनन में संवेदना के धार देखे लायेक बा-

“ए माई! दे किछु खाईं।”
“का दीं, लऽ ना खा हमार कपार।”
(ए माई)

बस दू लाइन के एह कविता के पढ़िके माई के स्नेह-भरल खीझ तऽ प्रकट होइये जात बा। साथही ई कपार खाए वाला मुहावरा आ जुमलो साकार हो जात बा, जवन झालमूढ़ी खाए के दौरान कवनों महामानव ओह मूढ़ीवाला के संबोधित करत कहत बाड़ें। एजा कपार खाए वाला काम ना ऊ मतारिये करत बिया, ना ऊ मूढ़िये वाला करत बा। अचरज ई होत बा कि दिन-रात बकबक करि के जे सभकर माथा खा रहल बा, चाट रहल बा, ऊहे कहत बा कि “कपार खाए के थोड़े माँगत बानी!”

‘बाप रे बाप’, ‘ए भाई’, ‘ए मामा’, ‘ए हो’, ‘दोबरी दुख’, ‘जीए के ढब ना आइल’ आदि अइसन कविता बाड़ी सँ, जवन अपना लघुता में काफी मार्मिक आ मारक बने में सफल हो गइल बाड़ी सँ। चंद्रेश्वर जी के एगो संवादधरमी रचना बिया—‘ए मामा’। छव पाँति के ई कविता अपना सहजता आ अभिधात्मकता में अइसन एगो ‘कम्प्लीट कविता’ बिया, जवना से गृहस्थ जीवन के जिम्मेवारी भरल बंधन के सौंदर्य मुखरित हो गइल बा—

“ए मामा!”
“का हो भगिना गामा!”
“काहे सूतल बाड़ऽ घामा?”
“बड़बड़ो मत तोरो बुझाई/
जब पहिनेबे बियाह के/
जोड़ा जामा।”
(ए मामा)

एह कविता में भोजपुरी अंचल में बियाह के लेके जवन सोच देखे-सुने के मिलेला, ओह से अलगा कवि के विचार नइखे। बिगड़ैल आ मनबढ़ू लइका लोग के ‘नाथे’ खातिर बियाह एगो कारगर तरीका भोजपुरी अंचल में मानल जाला, जवना के जरिये लड़िका लोग सीधे बिना बहकले ‘हराई’ में बहे लागेलें।

चंद्रेश्वर जी के एह कवितन पर कविता के कुछ गंभीर आस्वादक सभे चुटकुलाबाजी के आरोप लगा सकत बाड़ें, बाकिर हमरा तऽ एकनीं के खिलंदड़ापन में एगो खास तरे के जीवन-रस से भरल अनुभूतियन के जथारथ से जुड़ल अभिव्यक्ति साफ-साफ नजर आ रहल बिया।

चंद्रेश्वर जी के कविता में गाँव-जवार, खेत-खरिहान, खेती-बारी आ किसानी जीवन के समस्यन के वास्तविक पहचान करि के ओह कारनन के बतावल गइल बा, जवनन के चलते एकनीं पर संकट के बदरी घिरल जा रहल बा। कवि किसान के लगातार मटियामेट होत जा रहल जिनिगी के लेके बहुत चिंतित बा—

“अब किसान राजा ना/ रंक के कतार में शामिल होई /जमीन से मिलल मुआवजा ओकरा /बेटा-बेटियन के शादी में खर्च होई/ऊ सरकारी इमदाद से ना /ओकरा खैरात पऽ जीही लोग /बाकिर ऊहो आखिर कब तक?”

“ऊहो आखिर कबतक के सवाल” — अइसन बा, जवन एक ओरि स्थितियन के गंभीरता झलकावत बा, तऽ दूसर ओरि ओह चुनौतियन से जूझे खातिर आगाहो करत बा।

सत्ता के पूंजीवादियन से गठजोर किसानी जीवन में हलकानी ले आ देले बा। बाजारवाद चसका-चसका अलगे जान मार रहल बा—

“भइया हो काढऽ काढ़ऽ काढ़ऽ करजा/मनावऽ रोज दिवाली/जरावऽ दियरी घीव के /अब नइखे जरूरत कि बचा के /पाई-पाई जमा करऽ बैंक में।” (ठाढ़ बा माथ के बल)

दिखावा आ आडम्बर के पीछे संग्रही मानसिकता पर ‘बाजारवाद’ आपन आसन जमा लेले बा।

किसान के राजनीति आ पूंजीवाद के इयारी के कुफल एतना ले भोगे के पड़त बा कि कवि का कहे के पड़ल बा—

“उन्हुका जिनिगी के एगुड़े/मकसद हऽ/रोआइ-रोआइ मारल /पदा-पदा रोआवल/तोहरा अस लोगन के/ढेर बढ़ि जाला प्रतिरोध तऽ /देशै के दरोही बतावेलन/जुझारू लोगन के।” (अन्नदाता)

दिन-रात देह ठेठवला के बावजूदो किसान-मजदूर के ना माली हालत सुधर पावत बा, ना सामाजिके न्याय मिल पावत बा। ई सब देखि के कवि कहीं-कहीं घोर निराशा में डूब जात बा—

“एह दुनिया में काम बा/जूनके के /नीमनका के ना ××××आगे के छीनल थरिया/लूट लिहल गरीब के /छज्जा के /खपड़ो आ नरिया ऊ लोग से ना होखे /हमरा अब ई बुझाला कि /सच्चाई प ना /झूठे के थूनी प/टिकल बिया /ई सोगहग दुनिया।” (झूठ के थूनी प टिकल दुनिया)

चंद्रेश्वर जी के कविता के एह नकारात्मकता में एगो सकारात्मक ध्वनि उभर के सामने आ रहल बा। बुझात बा जइसे कवनों रोगी आजिज आके आपन पाकल घाव के जुरते चिरवा लेबे खातिर तइयार हो गइल होखे।

अपना पहिलके भोजपुरी कविता-संग्रह के जरिए चंद्रेश्वर जी भोजपुरी कविता के ओह दिशा के ओर मोड़े के कोशिश कइले बाड़ें, जवना चलते ऊ वैश्विक समस्यन से अपना आँखिन के चार करे लागत बिया। पूरा विश्व आज तीसरका विश्वयुद्ध के मुहाना पर ठाढ़ बा। शासकन के अहंकार से भरल अगंभीर, ढुरमुल आचरण से ई खतरा आउरो खतरनाक आ गंभीर बनल जा रहल बा। कवि एह खतरा से पूरा तरे वाकिफ बा। ओकर चिन्ता ‘जइसे यूक्रेन अकेल बा’, ‘दहशतगर्द’ आ ‘बुद्ध बनल कठिन’ जइसन कवितन में खुलि के सामने आइल बा—जहवाँ युद्ध से मानवता के खतरा के दिसाईं सावधान करत बुद्ध के शांति आ अहिंसा के शिक्षा के विश्व मानवता खातिर संजीवनी बतावल गइल बा—

“जुद्ध कइल आसान बा / बुद्ध बनल कठिन। / मरल-मारल आसान बा, जियल जिनगी कठिन। /××××× ए घरी चुपाइल आसान बा / बोलल त बहुते कठिन।”
(बुद्ध बनल कठिन)

—एहिजा चंद्रेश्वर जी जवना ‘चुप्पी’ के बात कर रहल बाड़न, ऊ तथाकथित भद्रजन लोग के अपना सुविधा-सुख-शांति में खलल ना पड़े देबे के लालसा के परिणाम बा। ऊ लोग कुछ बोल के कवनों झंझट मोल लेबे के नइखे चाहत। एही वर्ग में भारतीय बुद्धिजीवियो शामिल बाड़ें। दोसरका ओर, विश्व स्तर पर विभिन्न देश के रहनुमाई करेवाला लोग के बकबकइनीं के रोगो से पूरा दुनिया के कान अब पाक गइल बा।

एह संग्रह में चंद्रेश्वर जी के एगो कविता बिया, जवना के शीर्षक बा—‘बबुआ के लोरी’। ई लोरी खाली लोरी भर नइखे। बबुआ के हर तरे के बात बतावत, दुनियादारी सिखावे वाली रचना बिया। एकर पाँतियन के देखल जा सकत बा—

“एकदम हलुवा मत बनऽ ××× / नरम चारा / मत बनऽ / कि दलदल में ठाढ़ / कंगन वाला बूढ़ा शेर के / तराना कि फसाना / मत सुनऽ।”

बबुआ के एतना बतावत-समुझावत कवि आउरो तनिका गज्झिन बात के ओर इशारा कर देत बा—

“नदियने में नइखे भरल / खाली गाद / इंसानी दिलो में / भर गइल बा / गादे-गाद।”

कवि आउरो बहुत कुछ सीख देत बा एह कविता में बबुआ के, जवना बूते शहर गइला के बादो ऊ ठीक से आपन जिनगी गुजार सकस। इंसानी दिल में बइठल गादो (काल के प्रवाह में बटोराइल भावनात्मक गंदगी के ढेर) के सफाई एक दिन के काम नइखे। धीरे-धीरे मनई एहसे मुक्ति पा सकत बा। लोरी के जरिए दिहल सीख बबुआ लोग का साथे-साथे आम मनइयो खातिर ओतने प्रेरणादायी बा।

एह संग्रह के एगो निठाह राजनीतिक कविता ‘मोरे राजा’ सामयिक व्यंग्य कविता के जबरदस्त नमूना बिया। एकरा पाँतिन के देखल जा सकत बा—

“एगो घेरलस महामारी / ई लाचार दुनिया सारी / ऊपर से जनि करऽ / बमबारी मोरे राजा हो / दिमाग फाटेला ××× अबकी फाटल ढोल ना मँढ़ाई / लोगवा जानि गइल बा सच्चाई / मोरे राजा हो कि पह फाटेला / पूरब के आसमान से / अँजोर लउकेला / चरम प बा मँहगाई / चरमे प रोजगार के छीनाई / देशवा डूबल जात बा / साँचो डूबल जात बा / रसातल में / हे हो मोरे राजा जी !”

चंद्रेश्वर जी के भोजपुरी कवितन में कोरोनाकाल के मानवीय तबाही, व्यथा आ संघर्षो के पुरहर स्वर मिलल बा। ऊ प्रेम, दाम्पत्य, जीवन-मृत्यु आदि पर भी भोजपुरी में बहुते मार्मिक रचना कइले बाड़ें। एहिजा अनुभूतियन के भावनात्मक आ वैचारिक आग्रह के बीच संतुलन बइठावे के भरपूर प्रयास भइल बा—

“प्यार हमरा खातिर / गुलामी ना रहे / आउर जरूरत से जादे आजादियो ना रहे ×××× हर मउसम के कइनीं जा मुकाबला / साथे लड़नी जा / साथे हँसनी-रोअनी जा / हर मोरचन पर।”
(पियार)

—ऊपर के कविता में पियार के बारे में बतावत कवि जवना संतुलन के कायम रखे के कोशिश कइले बा, ओही तरे के वैचारिकता ओकरा ‘कतो एगो खिलल फूल’ शीर्षक कवितो में देखे के मिलत बा।

नारी-विमर्श के लेके भोजपुरियो में कइगो बहुचर्चित कविता-संग्रह आइल बाड़े, जवना के केन्द्र में नारी-जीवन बा। एहिजा भोजपुरी में नारी-विमर्श के लिहाजन समकालीन भोजपुरी कविता के पोढ़पन के झलकावे वाली कृति—‘एगो मेहरारू’ (महेन्द्र गोसाई) आ ‘औरत जात’ (मलयार्जुन) के उल्लेख कइल बहुत जरूरी बुझात बा। एह दूनू कविता-संग्रहन के कवितन में भोजपुरिहा क्षेत्र के नारी-जीवन के समस्या, पुरुष वर्चस्व वाला समाज से मुक्ति खातिर ओकर जारी संघर्ष आ धीरे-धीरे परिस्थितियन में आ रहल बदलाव के साफ तौर पर परखल-निरेखल जा सकत बा।

चंद्रेश्वर जी के कविता में नारी-विमर्श के बात भोजपुरिहा समाज के हिसाब से बहुते स्वाभाविक रूप में आइल बा। ऊ जानत बाड़ें कि भोजपुरिहा समाज के नारी पुरुष से एगो सीमा तक आजादी चाहेली आ पुरुष के संघर्ष में डेग में डेग मिलावत चलेली। महिला आरक्षण आ आउरो केतना सरकारी योजना आ प्रयासनो के चलते नारियन में आर्थिक स्वावलंबन आइल बा आ ओह लोग के सामाजिक प्रतिष्ठो बढ़ल बा। चंद्रेश्वर जी भोजपुरिहा नारी-जीवन के दुविधाग्रस्त मानसिकता के उकेरत इहे बतावे के कोशिश कइले बाड़न कि भोजपुरिहा नारी दुविधो में अपना पति के साथ निभावे के भरपूर प्रयास करेली—

“जब से भइल बा तोहार संग / ना जिअते बानीं / ना मुअते बानीं / ना हँसते बानीं / ना रोअते बानीं / ना तोहरा के छोड़ते बनत बा / ना तोहरा संग रहते बनत बा / तोहार किरिए / बियाहे के बाद जनलीं / कि का होला तिरिया-जनम!”
(कतो एगो खिलल फूल)

“बियाहे के बाद जनलीं / कि का होला तिरिया-जनम!”—एह बात में पूरा सच्चाई नइखे। साँच पूछीं तऽ आम भारतीय नारी आज जनमते विभेद, पीड़ा आ प्रताड़ना में जीये खातिर मजबूर हो जात बाड़ी। बियाह जिनिगी में एगो नया जतरा के शुरुआत जरूर होला औरत खातिर, बाकिर पुरुष प्रधान भोजपुरिहा समाज में मेहरारुन के दुरदसा के कहानी जनमते शुरू हो जाला।

शिक्षा के प्रसार के साथे-साथे, हालांकि रोजी-रोजगार आ घर के बहरी दुनिया में बड़हन सामाजिक बदलाव देखे के मिल रहल बा, तबो औरत के आजादी आ बराबरी के सपना पूरा होखे में अभी देरी बा। सामाजिक बराबरी के चाह में नारी वर्ग के उग्रता कहीं-कहीं नया ढंग के समस्यो पैदा कर रहल बा, तबो एह बदलाव के स्वागत होखे के चाहीं, काहे कि जुगन से पीड़ित नारी समाज के स्थितियन में आ रहल बदलाव समाज के आउरो गतिशील बनावे में कवनों-ना-कवनों रूप में सहायक बा।

हम पहिलहीं कह चुकल बानीं कि चंद्रेश्वर जी के कविता के पाट बहुत फइलल बा। हर तरे के संवेदना आ भावधारा के रचनन के जरिये कवि अपना पहिलके संग्रह से भोजपुरी समकालीन कविता के समृद्ध करे के हरसंभव प्रयास कइले बाड़न। चंद्रेश्वर जी भोजपुरी कविता में हाथ-आजमाइश के पहिले भोजपुरी कथेतर गद्य-लेखन में आपन कमाल दिखा चुकल बाड़न। ओही से प्रेरित होके भोजपुरी कविता के दिसाईं उनकर जवन सृजनशीलता शुरू भइल बिया, ओकर सराहना करत हम ईहो जोड़े के चाहब कि चंद्रेश्वर जी का भोजपुरी कविता लिखे के बेरा अपना सोच आ संवेदना के पूरा तरे भोजपुरिहा लोक समाज, लोक संस्कृति आउर लोक के आचरण आ बेवहार से जोड़ले रहे के चाहीं। अपना कविता ‘सतुआ’, ‘केवना डाढ़ प कोइलर’ आ ‘झूठ के थूनी प टिकल दुनिया’, ‘अमरफल’ आदि में कवि जहाँ लोक से अपना गहिर लगाव के परिचय देले बा, ओजवा ओकर कविता भोजपुरिहा मन-मिजाज के जादे करीब बिया। हिन्दी में सोचल-समुझल अनुभूतियन आ भाव-विचारन के अभिव्यक्त करत बेरा अतिरिक्त सावधानी के जरूरत ओह हर कवियन खातिर बा, जे हिन्दी आ भोजपुरी दूनू में समानान्तर रूप से सक्रिय बा। एतना हम इहो रेखांकित करे के चाहब कि लोक से लगाव के साथे-साथ भोजपुरी कविता का बीच-बीच में शहरी जीवनो का ओरि आपन नजर दउड़ावत रहे के पड़ी। आज ई एगो सच्चाई बा कि गाँव आ शहर के दूरी अब काफी कम गइल बा। गाँव आ शहर एक-दोसरा में घुसिया के आपन-आपन असर एक-दोसरा पर खूब छोड़ले बा। बाकिर तबो हम कहबि कि लाख विकास के बादो अभी बहुत कुछ अइसनका बा, जवना के चलते गाँव अभियो गाँव बा आ शहर शहर।

देश-दुनिया के गतिविधियन आ दोसर भारतीय भाषा में रचल जा रहल कवितन के देखत-पढ़त रहला से भोजपुरी कविता में विषयगत आ शिल्पगत आऊरी पोढ़पन आ ताजगी आई—एमें दूई राय नइखे। बाकिर सही रही कि लोक के आलोक में भोजपुरी कविता इतर भारतीय भाषा में हो रहल प्रयोगन आ सोच-विचार के स्तर पर पावल जायेवाला खुलापन के अपनावत लगातार डेगारे बढ़त चले। चंद्रेश्वर जी के कविता-संग्रह ‘गोहार’ के एह दिशा में एगो महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में देखत हम उनकरा भोजपुरी कवि के खुशी के साथ स्वागत कर रहल बानीं। चंद्रेश्वर जी अपना एगो कविता ‘अमरफल’ में कुछ एही तरे के विचार रखले बाड़न कि लोक के पीड़ा, पुलक आ मरम से गँठजोर करिये के कवनों कवि श्रेष्ठ सिरिजना परोस सकत बा-

“दुनिया के बड़हन-बड़हन / कवियन के कविता में / समाइल बा जेवन जादू / ई एकरे त कमाल हऽ / चाहे भाव होखे भा भाषा / भा कहन के अंदाज / सबमें ईहे छवले रहेला / अमरफल के मिठास बनि के।”

हमरा भरोसा बा—चंद्रेश्वर जी के आगे आवे वाली कवितन में भोजपुरी लोकजीवन के ई ‘अमरफल’ मिठास के साथे-साथे ओकरा धड़कन आ स्पंदनो के स्वर देत, हर तरे के सवाद आ सौन्दर्य से परिपूरन करत भोजपुरी कविता के घर-अँगना के गुलजार राखी। (पाती’ से साभार)

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