गाजीपुर, उत्तर प्रदेश। भारतीय लोकपरंपराओं, लोकसंस्कृति और लोकविज्ञान के व्यापक अध्ययन को केंद्र में रखते हुए गाजीपुर में ‘Does Indian Folkloristics Need Grand Theory?’ (क्या भारतीय लोकविज्ञान को ग्रैंड थ्योरी की जरूरत है?) विषय पर अंतरराष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन किया जाएगा। यह दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सेमिनार 31 अक्टूबर और 1 नवंबर 2026 को कम्युनिटी हॉल, लंका, गाजीपुर, उत्तर प्रदेश में आयोजित होगा।
सेमिनार के आयोजक अध्यक्ष डॉ.राम नारायण तिवारी ने बताया कि इसका मुख्य उद्देश्य भारतीय लोकविज्ञान के वर्तमान स्वरूप, उसकी सैद्धांतिक चुनौतियों और भारतीय लोकपरंपराओं को समझने के लिए उपयुक्त अध्ययन-पद्धतियों पर गंभीर अकादमिक विमर्श को आगे बढ़ाना है। भारतीय समाज की विविध लोकपरंपराओं में लोकगीत, लोककथाएं, लोकनाट्य, लोकविश्वास, रीति-रिवाज, मौखिक परंपराएं, पर्व-त्योहार और सामुदायिक स्मृतियां महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। इन परंपराओं का स्वरूप अलग-अलग क्षेत्रों, भाषाओं और समुदायों में भिन्न दिखाई देता है। ऐसे में यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या भारतीय लोकविज्ञान के अध्ययन के लिए किसी एक व्यापक सैद्धांतिक ढांचे या ‘ग्रैंड थ्योरी’ की आवश्यकता है, अथवा भारतीय विविधता को समझने के लिए स्थानीय और बहुलतावादी दृष्टिकोण अधिक उपयोगी हो सकते हैं।
डॉ. तिवारी ने बताया कि दो दिवसीय सेमिनार में इस विषय से जुड़े शोधकर्ताओं, शिक्षाविदों, साहित्यकारों, लोकसंस्कृति विशेषज्ञों और अकादमिक जगत से जुड़े प्रतिभागियों के विचार सामने आने की उम्मीद है। कार्यक्रम के दौरान भारतीय लोकविज्ञान की अवधारणा, उसकी विकास-यात्रा, लोक और शास्त्र के संबंध, मौखिक परंपराओं के अध्ययन तथा बदलते सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश में लोकसाहित्य की भूमिका जैसे विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की जा सकती है।
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गाजीपुर जैसे पूर्वांचल के महत्वपूर्ण सांस्कृतिक क्षेत्र में इस तरह के अंतरराष्ट्रीय अकादमिक आयोजन को विशेष महत्व दिया जा रहा है। पूर्वांचल की समृद्ध लोकपरंपराएं, भोजपुरी भाषा-संस्कृति और मौखिक विरासत भारतीय लोकविज्ञान के अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण आधार प्रस्तुत करती हैं। आयोजकों के अनुसार, सेमिनार का उद्देश्य केवल किसी एक सिद्धांत को स्थापित करना नहीं, बल्कि भारतीय लोकविज्ञान के अध्ययन की दिशा, दृष्टि और भविष्य को लेकर व्यापक संवाद स्थापित करना है। दो दिनों तक चलने वाला यह आयोजन लोकसंस्कृति और अकादमिक जगत के बीच संवाद का महत्वपूर्ण मंच बन सकता है।

