समीक्षक : डॉ. दिनेश प्रसाद सिन्हा
भोजपुरी कविता का संसार अपनी लोक-स्मृति, जीवनानुभव, सहज कथन-शैली और मिट्टी से जुड़े सरोकारों के कारण विशिष्ट पहचान रखता है। समय के साथ इस परंपरा में नए काव्य-रूपों और शिल्पगत प्रयोगों का प्रवेश हुआ है। डॉ. ब्रजभूषण मिश्र का काव्य-संग्रह ‘खरकत जमीन, बजरत आसमान’ इसी प्रयोगशील प्रवृत्ति का प्रतिनिधि संग्रह है।
यह संग्रह भोजपुरी कविता की बहुरंगी संवेदना, बदलते जीवन-बोध और निरंतर विकसित होती प्रयोगधर्मिता पर पाठक को मंथन के लिए विवश करता है। रचनाकार ने स्वयं को किसी एक काव्य-विधा की सीमा में नहीं बाँधा है। मुक्तछंद, तितकी, हाइकू, सनेर् यू, गीत, नवगीत, जनगीत और दोहा जैसे विविध काव्य-रूपों के माध्यम से उन्होंने अपने अनुभवों और संवेदनाओं को अभिव्यक्ति दी है।
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छंदमुक्त कविता के संदर्भ में यह बात उल्लेखनीय है कि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की कविताएँ भी छंदमुक्त होकर तुक और लय से पूरी तरह विहीन नहीं होतीं। उनकी कविताओं में अंतर्लय के कारण संगीतात्मकता और गेयता बनी रहती है। इसी दृष्टि से डॉ. मिश्र की रचनाएँ भी पाठकों, समीक्षकों और आलोचकों को कविता के रूप, लय और अभिव्यक्ति पर नए सिरे से विचार करने के लिए प्रेरित करती हैं।
रचनाकार की रचनात्मक यात्रा
डॉ. ब्रजभूषण मिश्र इस पुस्तक को अपना प्रथम काव्य-संग्रह मानते हैं, हालांकि भोजपुरी साहित्य में उनकी रचनात्मक उपस्थिति पहले से रही है। ‘हम भोजपुरी परिवार’, ‘दु रंग’, ‘अचके कहा गइल’ तथा ‘महावीर जी सदा सहाय’ जैसी पुस्तकों के माध्यम से उनकी साहित्यिक सक्रियता सामने आती रही है। इसलिए ‘खरकत जमीन, बजरत आसमान’ को केवल उनके प्रथम काव्य-संग्रह के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा; इसे उनके पूर्ववर्ती रचनात्मक अनुभवों के एक संगठित काव्यात्मक पड़ाव के रूप में भी देखा जाना चाहिए।
शीर्षक में छिपा संग्रह का जीवन-दर्शन
‘खरकत जमीन, बजरत आसमान’ शीर्षक ही संग्रह की मूल चेतना की ओर संकेत करता है। यहाँ जमीन केवल मिट्टी नहीं, बल्कि श्रम, किसान, गाँव, जीवन और यथार्थ का प्रतीक है। वहीं आसमान उम्मीद, संभावना, प्रकृति और भविष्य की ओर उठती दृष्टि का संकेत देता है।
इन दोनों के बीच मनुष्य खड़ा है, जो अपने श्रम और अनुभव के आधार पर जीवन को समझता है। इसीलिए संग्रह की कविताओं में जमीन से जुड़े अनुभव बार-बार सामने आते हैं और आसमान की ओर देखने वाली आशा भी बनी रहती है। ‘खरकत’ और ‘बजरत’ का यह संबंध संग्रह को एक व्यापक वैचारिक आधार देता है।
काव्य-विविधता और प्रयोगधर्मिता
संग्रह की सबसे प्रमुख विशेषताओं में इसकी काव्य-विधागत विविधता है। मुक्तछंद में जीवन और समाज की जटिलताओं को अपेक्षाकृत खुला विस्तार मिलता है। ‘तितकी’ में भीतर की टीस और मौन पीड़ा उभरती है। हाइकू में संक्षिप्तता और संकेतात्मकता का प्रयोग है, जबकि दोहों में सामाजिक व्यंग्य और कथ्य की तीक्ष्णता दिखाई देती है।
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गीत, नवगीत और जनगीत संग्रह की लोकधर्मी तथा सामूहिक संवेदना को विस्तार देते हैं। इस विविधता का महत्त्व केवल अलग-अलग विधाओं के इस्तेमाल में नहीं है, बल्कि इस बात में है कि कवि हर काव्य-रूप के माध्यम से अनुभव के अलग-अलग स्तरों को अभिव्यक्त करने का प्रयास करता है। यही प्रयोगधर्मिता इस संग्रह को सामान्य कविता-संग्रह से अलग पहचान देती है।
मुक्तछंद : बदलते जीवन और भीतर के संसार की कविता
संग्रह का मुक्तछंद खंड विशेष रूप से ध्यान आकर्षित करता है। यहाँ मुक्तछंद केवल छंद से मुक्ति नहीं, बल्कि जीवन की असमानता, टूटन, बेचैनी और अनुभव की स्वाभाविक गति को व्यक्त करने का माध्यम बनता है। छोटी-बड़ी पंक्तियों, विराम और आंतरिक लय के सहारे कवि ने अपनी बात कही है।
‘मन के डर’ और ‘अवसाद’
‘मन के डर’ कविता मनुष्य के भीतर मौजूद भय को पकड़ती है। यह भय केवल बाहरी परिस्थिति नहीं, बल्कि धीरे-धीरे मन का हिस्सा बन जाने वाली मानसिक स्थिति है। ‘डर का आँख में बसना’ जैसा बिंब इस मनःस्थिति को प्रभावी ढंग से दृश्य रूप देता है। कवि भय को किसी नाटकीय घटना में बदलने के बजाय उसे मन के भीतर की वास्तविक अनुभूति के रूप में प्रस्तुत करता है। ‘अवसाद’ में भी मानसिक पीड़ा को नाटकीय बनाने से कवि बचता है। ‘उजाला कम होना’ केवल प्रकाश के कम होने का बिंब नहीं, बल्कि जीवन में ऊर्जा और उम्मीद के क्षीण पड़ने का प्रतीक बन जाता है। छोटी पंक्तियाँ और विराम कविता को सघन बनाते हैं। कवि अवसाद को चीखकर नहीं, बल्कि उसकी धीमी और भीतर तक उतरने वाली उपस्थिति के माध्यम से महसूस कराता है।
‘मछरी’ और जीवन-संघर्ष
‘मछरी’ जैसी कविता एक साधारण लोक-वस्तु को सामाजिक और भावनात्मक अर्थ देती है। मछली यहाँ केवल जलचर नहीं रह जाती, बल्कि जीवन, संघर्ष और मनुष्य की नियति से जुड़ जाती है। ‘भाषा जानेली’ और ‘नियत ना समझ पावे’ के बीच भाव की पुनरावृत्ति जरूर महसूस होती है, लेकिन मूल प्रतीक कविता को व्यापक अर्थ देने में सक्षम है।
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‘बाबा के खटिया’ : लोक-स्मृति का मार्मिक दस्तावेज
‘बाबा के खटिया’ संग्रह की स्मृति-प्रधान महत्वपूर्ण रचनाओं में है। खटिया यहाँ केवल घरेलू वस्तु नहीं, बल्कि एक पीढ़ी, जीवन-पद्धति और उस लोक-संसार की स्मृति है, जहाँ बैठना, बतियाना, आराम करना और सामूहिक जीवन जीना सहज था। ‘अबो पूरा गाँव बइठेला’ जैसी अनुभूति निजी स्मृति को सामूहिक लोक-स्मृति में बदल देती है। बाबा की खटिया एक व्यक्ति की स्मृति से निकलकर पूरे गाँव के अतीत की स्मृति बन जाती है।
‘कतना बदल गइल बा गाँव’ : विकास की विडंबना
‘कतना बदल गइल बा गाँव’ में कवि ग्रामीण परिवर्तन को केवल बाहरी विकास के रूप में नहीं देखता। ‘रास्ता चौड़ा भइल, मन अउरी सँकर’ जैसी पंक्ति आधुनिक विकास की विडंबना को बहुत कम शब्दों में व्यक्त करती है। रास्ते चौड़े हो रहे हैं, लेकिन मनुष्य के बीच संबंध और संवेदनाएँ संकरी होती जा रही हैं।
आज की भौतिक दृष्टि अपने समय को ही सत्य मान बैठी है। पहले की सादगी, भलमनसाहत और भोलापन आज के दौर में उपहास की वस्तु बनते जा रहे हैं। पुराने लोक-संस्कारों और गीतों की जगह मोबाइल संस्कृति के बढ़ते प्रभाव को देखकर कवि के भीतर पुरानी अच्छाइयों के लिए कसक और टीस दिखाई देती है—
बदल रहल बा सभे पैंतरा
लगा रहल बा दाँव
कतना बदल गइल गाँव।
यहाँ गाँव केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं रह जाता, बल्कि बदलती सामाजिक संरचना का प्रतीक बन जाता है।
‘खोजीं अब सूरज के’ : अँधेरे में उम्मीद की तलाश
‘खोजीं अब सूरज के’ में अँधेरे के बीच प्रकाश की तलाश दिखाई देती है। सूरज यहाँ केवल प्राकृतिक प्रकाश का स्रोत नहीं, बल्कि आशा, चेतना और सक्रियता का प्रतीक बन जाता है। कविता निष्क्रिय प्रतीक्षा के बजाय खोज और प्रयास की प्रवृत्ति को महत्त्व देती है।
इसी तरह ‘चान उगला पर’ में लोक-कल्पना और निजी संवेदना का सुंदर मेल दिखाई देता है। चाँद के उगने की प्राकृतिक घटना से कविता मनुष्य के भीतर के खालीपन तक पहुँचती है। ‘घर के छत आ खालीपन’ जैसा बिंब बाहरी दृश्य और आंतरिक अकेलेपन को एक साथ जोड़ता है।
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‘पावे लमहर फइलाव’ में शीत, गर्मी, धुआँ और आँधी-तूफान जैसे प्रतीक परिवर्तन, गति और विस्तार की ओर संकेत करते हैं। कम शब्दों में संकेत पैदा करना इस कविता की विशेषता है, हालांकि भाव-विस्तार की संभावनाएँ भी यहाँ दिखाई देती हैं।
‘चान उगला पर’ : लोक-कल्पना और निजी संवेदना
‘चान उगला पर’ में लोक-कल्पना और निजी संवेदना का सुंदर मेल दिखाई देता है। चाँद के उगने की प्राकृतिक घटना से कविता मनुष्य के भीतर के खालीपन तक पहुँचती है। ‘घर के छत आ खालीपन’ जैसा बिंब बाहरी दृश्य और आंतरिक अकेलेपन को एक साथ जोड़ता है।
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‘पावे लमहर फइलाव’ में शीत, गर्मी, धुआँ और आँधी-तूफान के प्रतीक सामाजिक अर्थ ग्रहण करते हैं। ये परिवर्तन, गति और विस्तार की ओर संकेत करते हैं, जबकि ‘खिलल फूल’ स्थिरता, सीमा और हर्ष का प्रतीक बन सकता है। कम शब्दों में संकेत पैदा करना इस कविता की विशेषता है, यद्यपि भाव-विस्तार की संभावना यहाँ भी बनी हुई है। इन रचनाओं को एक साथ देखने पर स्पष्ट होता है कि कवि का मुक्तछंद बाहर और भीतर, दोनों संसारों को देखता है। गाँव बदल रहा है, संबंध बदल रहे हैं, मन डरता है, अवसाद आता है, स्मृतियाँ बची हुई हैं और फिर भी सूरज खोजने की इच्छा समाप्त नहीं होती। यही इस खंड की केंद्रीय संवेदना है।
भीतर की आग : अभाव, आक्रोश और समय की तपिश
‘भीतर की आग’ में कवि की काव्य-चेतना भीतर सुलगती हुई आग की तरह दिखाई देती है। अभावजनित आक्रोश और आज के समय की तपिश को सहज ही महसूस किया जा सकता है। ऐसी ही चेतना के दर्शन ‘कालीन आ काई’, ‘मुंह पर करिखा’, ‘बिहारी मजदूर’, ‘कउड़ा’, ‘सांसत में जान’ और ‘बारूद पर गाँव’ जैसी कविताओं में किए जा सकते हैं।
इन रचनाओं में कवि के भीतर की बेचैनी केवल निजी अनुभव नहीं रह जाती, बल्कि सामाजिक यथार्थ से जुड़कर व्यापक अर्थ ग्रहण करती है। अभाव, श्रम, पीड़ा, असुरक्षा और समय की विसंगतियाँ कवि की संवेदना को उद्वेलित करती हैं। यहाँ आक्रोश किसी नारे की तरह नहीं, बल्कि जीवन के भीतर से उठने वाली स्वाभाविक प्रतिक्रिया के रूप में सामने आता है। कवि अपने आसपास घट रही स्थितियों को देखकर चुप नहीं रहता; उसकी कविता उन परिस्थितियों की तपिश और बेचैनी को शब्द देती है।
गाँव में चुपके से शहर बना डालने का छल, पलायन, शिक्षा की कुव्यवस्था, बेरोजगारी और ग्रामीण परिवेश के बिखराव का सटीक और प्रभावी चित्रण ‘मन चिहाइल’, ‘मछरी’, ‘मन के डर’, ‘धधक रहल गाँव’, ‘कर्णधारन’ और ‘पीपर आ बबूर’ जैसी रचनाओं में मिलता है।
‘बिहारी मजदूर’ में श्रम और जीवन-संघर्ष की पीड़ा है, तो ‘बारूद पर गाँव’ में ग्रामीण जीवन की असुरक्षा और भयावह परिस्थितियों का संकेत मिलता है। ‘मुंह पर करिखा’ और ‘कालीन आ काई’ जैसी रचनाएँ सामाजिक यथार्थ के अलग-अलग रूपों को सामने लाती हैं। इस प्रकार संग्रह में ‘भीतर की आग’ एक ऐसी काव्य-ऊर्जा बन जाती है, जो कवि को अपने समय के प्रति सजग और प्रश्नाकुल बनाती है।
गाँव का बिखराव, शहरीकरण और पलायन
कवि गाँव में हो रहे पारंपरिक बिखराव, शहरीकरण, विकास के नाम पर हो रही लूट-खसोट, युवा बेरोजगारी और युवाओं के पलायन से व्यथित हैं। इन्हीं विषयों को केंद्र में रखकर ‘पीपर आ बबूर’, ‘मन के डर’, ‘मछरी’, ‘मन के चिहाइल’, ‘कतना बदल गइल बा गाँव’, ‘धधक रहल गाँव’ और ‘कर्णधारन’ जैसी रचनाएँ रची गई हैं, जो उनके मन की उपज हैं।
इन रचनाओं में गाँव केवल भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि बदलती हुई सामाजिक संरचना का जीवंत रूप है। विकास के नाम पर गाँव का बाहरी रूप बदल रहा है, लेकिन उसके साथ पारंपरिक संबंधों, लोक-संस्कृति और सामुदायिक जीवन में भी बदलाव आ रहा है। युवा बेरोजगारी और पलायन इस संकट को और गहरा करते हैं। गाँव का युवा जब रोजगार की तलाश में बाहर जाता है, तो उसके साथ परिवार और गाँव की सामाजिक संरचना भी प्रभावित होती है।
‘कतना बदल गइल बा गाँव’ इस परिवर्तन की विडंबना को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से सामने रखती है। गाँव के रास्ते चौड़े हो सकते हैं, लेकिन यदि मनुष्यों के बीच की दूरी बढ़ती जाए, तो विकास का अर्थ प्रश्नों के घेरे में आ जाता है। ‘पीपर आ बबूर’ जैसे शीर्षक गाँव की प्राकृतिक और सांस्कृतिक स्मृति की ओर संकेत करते हैं, जबकि ‘धधक रहल गाँव’ में बदलते ग्रामीण जीवन की बेचैनी और ताप का अनुभव किया जा सकता है। इस प्रकार गाँव से जुड़ी ये रचनाएँ कवि की उस चिंता को व्यक्त करती हैं, जिसमें परंपरा, आधुनिकता, विकास, बेरोजगारी और पलायन एक-दूसरे से जुड़कर समकालीन ग्रामीण जीवन की जटिल तस्वीर बनाते हैं।
‘तितकी’ : मौन पीड़ा का लोक-संकेत
‘तितकी’ इस संग्रह का ऐसा प्रयोग है, जिसे केवल किसी काव्य-विधा के नाम से समझना पर्याप्त नहीं होगा। यह कवि के भीतर चल रहे वैचारिक और भावनात्मक अंतर्द्वंद्व से पैदा होने वाली सूक्ष्म मानसिक हलचल का संकेत है। यह वह टीस है, जो दिखाई नहीं देती, लेकिन भीतर बनी रहती है और किसी अनुकूल क्षण में शब्द बनकर बाहर आती है।
‘तितकी’ को छोटी-सी चिनगारी की तरह भी समझा जा सकता है। यदि भीतर की इस हलचल को पहचान लिया जाए और उसे रचनात्मक दिशा मिल जाए, तो वह कविता बनती है; उपेक्षित रहने पर वही पीड़ा भीतर की चेतना को जलाती रहती है। ‘जीयेला’, ‘अन्हार’ और ‘पावेला’ जैसे अनुभव-स्तर इस यात्रा को संघर्ष, अँधेरे, तलाश और सुख की संभावना से जोड़ते हैं। इस प्रयोग की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि पीड़ा यहाँ विलाप नहीं करती। वह शोर नहीं करती; चुपचाप भीतर बैठकर चुभती रहती है। यही मौन पीड़ा भोजपुरी लोक-संवेदना के निकट पहुँचती है। भोजपुरी लोकजीवन में दुःख का प्रदर्शन हमेशा शब्दों की अधिकता से नहीं होता; वह व्यवहार, स्मृति, प्रतीक और छोटी-सी अभिव्यक्ति में भी प्रकट हो जाता है।
‘तितकी’ शब्द इसी लोक-अनुभव से अपनी शक्ति प्राप्त करता है। यह विरह, स्मृति, अभाव और भीतर की कसक को एक साथ समेटता है। इसीलिए यदि किसी रचना की पूरी शैली शुद्ध भोजपुरी न भी लगे, तब भी ‘तितकी’ जैसा लोक-संवेदी शब्द उसे भोजपुरी भावभूमि से जोड़ देता है।
हाइकू : प्रयोग की शक्ति और भाषा का प्रश्न
हाइकू मूलतः जापानी लघु काव्य-विधा है। इसकी पहचान संक्षिप्तता, संकेतात्मकता और सूक्ष्म अनुभूति से होती है। भोजपुरी काव्य-संग्रह में हाइकू को स्थान देना रचनाकार की प्रयोगशीलता को सामने लाता है। ब्रजभूषण मिश्र की हाइकू-शैली की दस रचनाओं में जीवन-संघर्ष, अधिकार-बोध, सुख-दुःख, पर्यावरण, भीतर की घुटन, मौन, आँसू और माँ के आँचल में मिलने वाले सुकून जैसे विषय आते हैं। ‘आपन हक चाहीं, लड़ के लिहीं’ जैसी पंक्ति सामाजिक चेतना और प्रतिरोध की स्पष्ट भावना को व्यक्त करती है। फूल और काँटे का बिंब जीवन की सुख-दुःखमय विडंबना को संकेतित करता है।
इन रचनाओं की शक्ति कम शब्दों में बड़े भाव को रखने की कोशिश में है। लेकिन यहीं एक आलोचनात्मक प्रश्न भी उठता है। कई हाइकू-रचनाओं की भाषा खड़ी बोली या सरल हिंदी के अधिक निकट दिखाई देती है। ठेठ भोजपुरी की शब्द-संपदा, उसकी ध्वनि, लोकोक्ति और क्रियात्मक प्रवाह अपेक्षाकृत कम दिखाई देता है। इसलिए कुछ रचनाएँ भोजपुरी हाइकू की अपेक्षा हिंदी हाइकू के अधिक निकट प्रतीत होती हैं।
इसका अर्थ यह नहीं कि प्रयोग असफल है। बल्कि यह प्रश्न अधिक महत्वपूर्ण है कि विदेशी काव्य-विधा को अपनाते समय भोजपुरी की अपनी भाषिक अस्मिता किस सीमा तक सुरक्षित रहती है। संरचना जापानी हो सकती है, लेकिन उसमें अनुभव की मिट्टी भोजपुरी होनी चाहिए। इस संग्रह के हाइकू इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण आरंभ प्रस्तुत करते हैं, यद्यपि उनमें और अधिक भोजपुरीपन की संभावना बनी हुई है।
दोहा : सामाजिक यथार्थ का तीखा कथन
संग्रह के दोहों में सामाजिक व्यंग्य, लोक-संवेदना और समकालीन जीवन की विसंगतियाँ प्रमुख हैं। दोहा अपने सीमित आकार में व्यापक कथ्य को समेटने की क्षमता रखता है और कवि ने इस गुण का उपयोग सामाजिक विषयों के लिए किया है। ‘औरत’ में महाभारत के सांस्कृतिक संदर्भों के माध्यम से स्त्री-समस्या की ओर संकेत किया गया है। ‘राजनीति’ में राजनेताओं के क्रिया-कलापों का व्यंग्यपूर्ण चित्र सामने आता है। ‘भ्रष्टाचार’ में व्यवस्था की जटिलता और उसके बढ़ते प्रभाव को लेकर चिंता दिखाई देती है। ‘उग्रवाद–आतंकवाद’ शीर्षक कुछ असहज करता है, क्योंकि दोनों शब्द अर्थ की दृष्टि से काफी निकट हैं। यहाँ शीर्षक-निर्धारण में अधिक सजगता अपेक्षित थी।
‘गाँव’, ‘बाढ़’, ‘सूखा’, ‘खेती’ और ‘किसान’ जैसे विषयों में ग्रामीण जीवन की वास्तविक समस्याएँ उभरती हैं। रोजगार, पलायन, खेती की कठिनाई और किसान की विवशता केवल आर्थिक विषय नहीं रह जाते; वे गाँव के बदलते सामाजिक ढाँचे से जुड़ जाते हैं।
इन दोहों का व्यंग्य कई जगह बहुत तीखा है। यही तीखापन इनकी शक्ति है। लेकिन कुछ स्थानों पर कथन संकेतात्मकता पर भारी पड़ता है। यदि वहाँ सीधे कथन के स्थान पर संकेत और बिंब का सहारा लिया जाता, तो प्रभाव और गहरा हो सकता था।
भाषा, वर्तनी, व्याकरण और विराम-चिह्न
भाषा पर रचनाकार की पकड़ सामान्यतः मजबूत है, लेकिन कुछ स्थानों पर क्रिया-रूपों की एकरूपता और लय पर अधिक ध्यान अपेक्षित है। ‘बाटे’, ‘बाट’ और ‘बा’ जैसे भोजपुरी क्रिया-रूप अपने-अपने संदर्भ में स्वाभाविक हैं, किंतु एक ही रचना में इनके अनावश्यक परिवर्तन से प्रवाह प्रभावित होता है।
उदाहरण के लिए-
‘खेलत-खेलत बाटे हमनी के जान से,
घूमत बाटे शान से ना।’
यहाँ क्रिया-प्रयोग को और संतुलित किया जा सकता है। इसी तरह ‘सजी सुखावा लूटे राजधानी’ जैसी पंक्ति में लय और अर्थ-स्पष्टता को और कसने की आवश्यकता है। ‘जकरा का गोली-गंज आकर त बाट बा’ में ‘आकर’ शब्द अर्थगत भ्रम पैदा करता है। इसे ‘जकरा का गोली-गंज में ठिकाना बाट बा’ जैसे स्पष्ट रूप में लिखा जा सकता था।
इसी प्रकार- ‘कहत बाटे ज्ञानी दुखिया लोग काहे रोवे’ में विराम-चिह्नों के प्रयोग से अर्थ अधिक प्रभावी हो सकता है- ‘कहत बाटे ज्ञानी, दुखिया लोग काहे रोवे?’ ये त्रुटियाँ गंभीर व्याकरणिक दोष नहीं हैं। मुख्य समस्या लय, क्रिया-रूपों की एकरूपता और कहीं-कहीं अर्थ-स्पष्टता से संबंधित है। सजग संपादन से इन रचनाओं की प्रभावशीलता और बढ़ सकती है।
गीत, नवगीत और जनगीत
गीत, नवगीत और जनगीत संग्रह की लोकधर्मी चेतना को व्यापक बनाते हैं। गीतों में भाव और संवेदना का स्वर प्रमुख है। नवगीत में समकालीन जीवन, बदलते संबंध और सामाजिक यथार्थ का प्रभाव दिखाई देता है, जबकि जनगीत में सामूहिक चेतना और सामाजिक सरोकार अधिक मुखर होते हैं। इन रचनाओं का महत्त्व इस बात में है कि लोक यहाँ केवल पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि संवेदना का आधार है। गाँव, श्रम, मनुष्य और समय गीतात्मक रूप में अभिव्यक्त होते हैं। कहीं-कहीं कथ्य की प्रत्यक्षता गीतात्मकता पर भारी पड़ती है, फिर भी इन रचनाओं में लोकधुन और समकालीन चेतना का संबंध संग्रह को व्यापक बनाता है।
गीतात्मकता, भोजपुरीपन और गीत-शिल्प
संग्रह में गीत, नवगीत और जनगीत की रचनाएँ विशेष रूप से ध्यान आकर्षित करती हैं। इन रचनाओं को केवल कविता के रूप में नहीं, बल्कि भोजपुरी गीत की समृद्ध लोकपरंपरा के संदर्भ में देखना अधिक उपयुक्त होगा। पंक्तियों की सहजता, दोहराव की प्रवृत्ति, कथ्य की श्रवणीयता और अंतरों में आने वाला लयात्मक ठहराव इन्हें गीत के अधिक निकट ले जाता है। ‘उहे सब गीतिया हमार बा’ जैसी पंक्ति रचना के गीतात्मक आत्मबोध को व्यक्त करती है।
इन गीतों की सबसे बड़ी शक्ति उनकी लोकभाषा है। ‘बा’, ‘गइल’, ‘लागल’, ‘बड़ाइल’, ‘पगलाईल’, ‘ढहल’, ‘टपकल’ जैसे क्रिया-रूप भोजपुरी के स्वाभाविक लोक-स्वर को बनाए रखते हैं। ‘आपन ई जीवन कइसन बा’ जैसी प्रश्न-रचना भी भोजपुरी के सहज वाक्य-विन्यास का उदाहरण है। भाषा यहाँ कृत्रिम नहीं, बल्कि जनजीवन के निकट है। यही सहजता गीतों को श्रोता के कान तक सीधे पहुँचाती है।
भोजपुरी गीत की परंपरा में तुकांतता से अधिक ध्वनि-साम्य, पुनरावृत्ति और लय का महत्त्व रहा है। इस दृष्टि से संग्रह की कई रचनाओं में भावात्मक पुनरावृत्ति प्रभावी बनती है। ‘पगलाईल पंछी आ मौसम बड़ाइल बा’ जैसे पद का लौटकर आना भाव को स्थायित्व देता है और लोकधुन जैसा प्रभाव उत्पन्न करता है। यह पुनरावृत्ति अनावश्यक दोहराव न होकर गीत की संरचनात्मक आवश्यकता के रूप में भी काम करती है।
इन गीतों का कथ्य आधुनिक भोजपुरी गीत की व्यापक परंपरा से जुड़ता है। यहाँ प्रेम और श्रृंगार के साथ सामाजिक पीड़ा, असंतोष, प्रकृति, मौसम, श्रम, पलायन, टूटन और बदलते जीवन-संबंध उपस्थित हैं। ‘छत टपकल, दीवार ढहल बा’ जैसी पंक्ति गरीबी, असुरक्षा और टूटते जीवन का सघन लोक-बिंब प्रस्तुत करती है। इसी प्रकार मौसम, पंछी, गाँव और प्रकृति के अन्य प्रतीक केवल दृश्य नहीं रहते, बल्कि समकालीन सामाजिक असंतुलन और मनुष्य की मनःस्थिति के संकेत बन जाते हैं।
‘मौसम’ जैसे शब्दों का प्रयोग भोजपुरीपन को नष्ट नहीं करता। आधुनिक भोजपुरी अपनी लोक-संपदा को बनाए रखते हुए समय के साथ हिंदी और अन्य भाषिक स्रोतों से शब्द ग्रहण करती रही है। इसलिए किसी शब्द का संस्कृतनिष्ठ या हिंदी-प्रभावित होना अपने-आप में भाषिक दोष नहीं माना जा सकता। प्रश्न यह है कि वह शब्द संदर्भ, लय और भाव के साथ कितना स्वाभाविक बैठता है। हाँ, ‘पीत पखावज कहाँ बा’ जैसे प्रयोगों में ‘पीत’ शब्द अपेक्षाकृत संस्कृत-छाया लिए हुए प्रतीत होता है, जिससे कुछ क्षणों के लिए लोकभाषा की सहज ध्वनि कम होती है।
भोजपुरी व्याकरण की दृष्टि से संग्रह की अधिकांश रचनाओं में कोई गंभीर दोष दिखाई नहीं देता। ‘धधक रहल गाँव’ जैसे प्रयोगों में क्रिया-रूप स्वाभाविक हैं। जहाँ समस्या दिखाई देती है, वहाँ वह प्रायः गंभीर व्याकरणिक त्रुटि के बजाय क्रिया-रूप की एकरूपता, पंक्ति-संतुलन अथवा अर्थ-स्पष्टता से संबंधित है। अतः ऐसे प्रयोगों को भाषिक असफलता के बजाय संपादकीय परिष्कार की आवश्यकता के रूप में देखना अधिक उचित होगा।
गीतों की एक सीमा पंक्ति-लंबाई और लय के असमान भार में दिखाई देती है। कुछ पंक्तियाँ धुन पर सहज बैठ सकती हैं, जबकि कुछ अपेक्षाकृत अधिक सघन हैं। यदि इन्हें गायन के लिए तैयार किया जाए तो मात्रात्मक संतुलन और पंक्ति-विन्यास पर थोड़ा और ध्यान देने से गेयता बढ़ सकती है। इसी प्रकार कुछ स्थानों पर भाव आगे बढ़ने के बजाय उसी अर्थ की पुनरावृत्ति करता है; वहाँ संक्षेप गीत को और प्रभावशाली बना सकता है।
लोकगीत की एक महत्वपूर्ण विशेषता उसका दृश्यात्मक संसार भी है। संग्रह में गाँव, खेत, दीवार, छत, पंछी और मौसम आदि के माध्यम से लोक-चित्र उपस्थित हैं, लेकिन कुछ रचनाओं में दृश्य-बिंब को थोड़ा और विस्तार दिया जाता तो उनकी प्रभावक्षमता बढ़ती। भोजपुरी गीत जब किसी विचार को सीधे समझाने के बजाय उसे खेत, घर, मौसम, श्रम या लोकजीवन के किसी दृश्य में बदल देता है, तब उसका प्रभाव अधिक स्थायी होता है।
विराम-चिह्नों के स्तर पर भी कुछ संपादकीय सुधार की गुंजाइश है। प्रश्नवाचक और विस्मयबोधक चिह्न भावानुकूल हैं, लेकिन कई जगह अल्पविराम अथवा यति के अभाव में पंक्तियों का स्वाभाविक ठहराव स्पष्ट नहीं हो पाता। गीत में विराम केवल व्याकरण का चिह्न नहीं, बल्कि साँस और लय का भी संकेत होता है। इसलिए अंतिम प्रकाशन से पहले विराम-चिह्नों और पंक्ति-विभाजन का एकरूप संपादन उपयोगी होगा।
समग्रतः संग्रह के गीतों में भोजपुरी की लोक-आत्मा, समकालीन कथ्य और गीतात्मक प्रवाह विद्यमान है। इनकी कुछ सीमाएँ लय-संतुलन, पंक्ति-संयोजन, दृश्यात्मकता और विराम-चिह्नों से संबंधित हैं, लेकिन इन्हें गंभीर भाषिक दोष कहना उचित नहीं होगा। ये रचनाएँ शुद्धतावादी व्याकरण की अपेक्षा लोकस्वीकृति, गेयता और जन-संवेदना को अधिक महत्त्व देती हैं। यही कारण है कि संग्रह के गीत भोजपुरी साहित्य की गंभीर और विकसित होती गीतधारा में अपनी पहचान बनाने की क्षमता रखते हैं।
सनेर्यू : संक्षिप्त रूप में भाव-संकेन्द्रण
सनेर्यू का समावेश भी संग्रह की प्रयोगशील प्रकृति को रेखांकित करता है। कवि लघु काव्य-रूपों के माध्यम से कम शब्दों में अनुभूति को केंद्रित करने की कोशिश करता है। ऐसे प्रयोग में सबसे महत्वपूर्ण बात यह होती है कि बाहरी संरचना के भीतर स्थानीय जीवनानुभव कितनी गहराई से प्रवेश करता है। ‘तितकी’, हाइकू और सनेर्यू जैसे रूपों को एक साथ देखने पर कवि की यह प्रवृत्ति स्पष्ट होती है कि वह संक्षिप्त काव्य-रूपों के माध्यम से अनुभूति को अधिक सघन बनाना चाहता है। यह प्रयोग भोजपुरी कविता के लिए संभावनाओं का नया क्षेत्र खोलता है।
गाँव, किसान और श्रम
संग्रह की मूल ज़मीन गाँव और श्रम है। किसान यहाँ दया का पात्र नहीं, बल्कि श्रम और जीवन की केंद्रीय शक्ति है। मिट्टी, खेत, फसल, धूप और पसीना कवि के लिए केवल प्राकृतिक या ग्रामीण दृश्य नहीं हैं; वे जीवन की मूल संरचना हैं।
‘खरकत जमीन’ का अर्थ इसी संदर्भ में और गहरा हो जाता है। जमीन का गतिशील होना, श्रम से जुड़ना और उससे जीवन का निर्माण होना-ये सभी अर्थ शीर्षक और संग्रह की अनेक रचनाओं को एक सूत्र में बाँधते हैं। गाँव के बदलते स्वरूप को कवि केवल विकास-विरोधी दृष्टि से नहीं देखता। वह यह देखता है कि भौतिक बदलाव के साथ मनुष्य का भीतर भी बदल रहा है। ‘रास्ता चौड़ा भइल, मन अउरी सँकर’ इसी परिवर्तन का सटीक प्रतीक है।
प्रकृति और लोक-स्मृति
धरती, आसमान, बदरिया, धूप, सूरज, चाँद, लहर, मछरी और खेत जैसे तत्व संग्रह में बार-बार आते हैं। लेकिन वे केवल दृश्य-सज्जा नहीं हैं। उनके माध्यम से कवि मनुष्य के भीतर के संसार को समझता है। सूरज आशा और चेतना बन जाता है। चाँद स्मृति और लोक-कल्पना से जुड़ता है। लहर परिवर्तन और गति का संकेत देती है। मछरी जीवन और संघर्ष की ओर संकेत करती है। खटिया स्मृति और पीढ़ियों के संबंध की प्रतीक बनती है। इस प्रकार प्रकृति और लोक-वस्तुएँ कवि के यहाँ अर्थ-विस्तार प्राप्त करती हैं।
भाषा, लोक और भोजपुरी अस्मिता
संग्रह की अधिकांश रचनाओं में भाषा सहज, बोलचाल की और भोजपुरी जीवन के निकट है। कवि ने भाषा को अनावश्यक रूप से भारी नहीं बनाया। यही सहजता उसके कथ्य को पाठक तक सीधे पहुँचाती है।
लेकिन प्रयोगधर्मी काव्य-रूपों में भाषा का प्रश्न अलग तरह से सामने आता है। विशेषकर हाइकू में हिंदी का प्रभाव यह प्रश्न उठाता है कि भोजपुरी में लिखना और भोजपुरी की आत्मा में लिखना क्या एक ही बात है। केवल भोजपुरी शब्दों का प्रयोग पर्याप्त नहीं; भोजपुरी की अपनी लय, वाक्य-विन्यास, मुहावरा, लोक-स्मृति और सांस्कृतिक बोध भी रचना में उपस्थित होना चाहिए। ‘तितकी’ जैसे शब्द इस दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। वे रचना को लोक-स्मृति से जोड़ते हैं और यह प्रमाणित करते हैं कि किसी आधुनिक या विदेशी काव्य-रूप को अपनाते हुए भी भोजपुरी अनुभव को भीतर रखा जा सकता है।
शिल्पगत उपलब्धियाँ और सीमाएँ
संग्रह की सबसे बड़ी शिल्पगत उपलब्धि विविधता है। कवि एक ही रूप पर निर्भर नहीं रहता। वह अपनी अनुभूति के अनुसार अलग-अलग काव्य-रूपों का चुनाव करता है। मुक्तछंद में विस्तार और आंतरिक लय है, दोहे में संक्षिप्त व्यंग्य है, हाइकू में संकेत है, तितकी में अंतर्मुखी पीड़ा है और गीतात्मक रचनाओं में सामूहिकता तथा लोकधर्मिता है।
इसके साथ कुछ सीमाएँ भी हैं। कुछ रचनाओं में भाव-विस्तार अधिक हो जाता है, कहीं-कहीं बिंबों की पुनरावृत्ति महसूस होती है और कुछ जगह पंक्ति-विन्यास को और कसने की आवश्यकता है। हाइकू में भाषिक भोजपुरीपन अपेक्षाकृत कम है। दोहों में कहीं-कहीं क्रिया-रूप और लय को अधिक सुसंगत किया जा सकता है।
लेकिन इन सीमाओं को रचनात्मक यात्रा की स्वाभाविक अवस्थाओं के रूप में देखना अधिक उचित होगा। इनमें से अधिकांश समस्याएँ संपादन और पुनर्संयोजन से सुधारी जा सकती हैं।
शीर्षक की सार्थकता
‘खरकत जमीन बरकत आसमान’ संग्रह का केवल आकर्षक नाम नहीं है; यह पूरे काव्य-संसार की केंद्रीय अवधारणा है। ज़मीन श्रम की है और आसमान संभावना का। ज़मीन पर किसान खड़ा है और ऊपर आसमान से बरसने वाली प्रकृति की कृपा की प्रतीक्षा करता है। लेकिन कवि का विश्वास केवल आसमान पर नहीं है। उसके लिए बरकत की पहली शर्त ज़मीन की सक्रियता है।
यही विचार संग्रह की कविता को एक वैचारिक आधार देता है। मनुष्य अपने श्रम से ज़मीन को गतिशील करता है और फिर आसमान की ओर आशा से देखता है। इसीलिए शीर्षक में ‘खरकत’ और ‘बरकत’ का संबंध अत्यंत अर्थपूर्ण है। एक ओर श्रम और गति है, दूसरी ओर उसके परिणाम की संभावना।
आलोचनात्मक मूल्यांकन
‘खरकत ज़मीन, बजरत आसमान’ को केवल भोजपुरी कविताओं का संग्रह कहना इसके महत्त्व को सीमित करना होगा। यह एक ऐसे रचनाकार की रचनात्मक यात्रा का दस्तावेज है, जो लोकजीवन से जुड़ा रहते हुए आधुनिक काव्य-रूपों के साथ संवाद करना चाहता है। इस संग्रह की कविताएँ गाँव को रोमानी स्मृति बनाकर नहीं रखतीं। वहाँ किसान है, श्रम है, पलायन है, बदलते रिश्ते हैं, भय है, अवसाद है और सामाजिक विसंगतियाँ हैं। साथ ही वहाँ सूरज की तलाश भी है, चाँद की स्मृति भी है और जीवन को बचाए रखने वाली उम्मीद भी। कवि की सबसे बड़ी शक्ति उसकी जमीन से जुड़ी दृष्टि है। वह आसमान की ओर देखता है, लेकिन ज़मीन को नहीं छोड़ता। उसकी प्रयोगशीलता का महत्त्व भी इसी में है कि वह नई विधाओं को अपनाते हुए अपने अनुभव-संसार को उनसे जोड़ने का प्रयास करता है।
जहाँ प्रयोग सफल हैं, वहाँ संग्रह की रचनात्मक ऊर्जा दिखाई देती है; जहाँ भाषा या शिल्प कुछ कमजोर पड़ता है, वहाँ आगे की रचनात्मक यात्रा के लिए संभावनाएँ दिखाई देती हैं। इस अर्थ में संग्रह अपनी उपलब्धियों के साथ अपनी बहसें भी सामने रखता है। ‘खरकत जमीन बजरत आसमान’ भोजपुरी कविता का एक संवेदनशील, प्रयोगशील और लोकधर्मी काव्य-संग्रह है। इसमें मिट्टी की गंध है, श्रम का ताप है, गाँव की स्मृति है, बदलते समय की बेचैनी है और भविष्य की ओर देखने वाली आशा भी है।
डॉ० ब्रजभूषण मिश्र की कविता की सार्थकता इस बात में है कि वे जीवन को केवल देखते नहीं, उसके भीतर उतरकर उसकी छोटी-छोटी हलचलों को शब्द देते हैं। अंततः, ‘खरकत ज़मीन, बजरत आसमान’ अपनी उपलब्धियों और सीमाओं दोनों के साथ भोजपुरी कविता में प्रयोग और संवेदना के नए रास्ते खोलने वाला संग्रह है। यह संग्रह न केवल भोजपुरी के वर्तमान काव्य-संसार को समझने का अवसर देता है, बल्कि उसके भविष्य की संभावनाओं पर भी विचार करने के लिए प्रेरित करता है। डॉ० ब्रजभूषण मिश्र की यह कृति इसी अर्थ में भोजपुरी कविता की निरंतर गतिशील होती यात्रा में एक उल्लेखनीय पड़ाव है।


‘बरकत आसमान’ नहीं होगा, ‘बजरत आसमान’ होगा। कृपया सुधारें।