समीक्षक: डॉ. दिनेश प्रसाद सिन्हा
नेपाल प्रवास के दौरान नेपाल के महाकवि गोपाल अश्क जी ने अपनी चार पुस्तकें सप्रेम भेंट की थीं। उनमें बेकहल जिन्दगी भी शामिल थी। वर्ष 2007 में प्रकाशित यह भोजपुरी ग़ज़ल संग्रह अपनी विषय-वस्तु के साथ-साथ शिल्प और छंद-विधान के कारण विशेष महत्त्व रखता है।
बेकहल जिन्दगी सामान्य भोजपुरी कविताओं का संग्रह नहीं है, बल्कि शास्त्रीय बहरों के नियमों में रची गई भोजपुरी ग़ज़लों का संग्रह है। यहाँ ‘शास्त्रीय बहर’ से आशय ग़ज़ल की पारंपरिक छंद-व्यवस्था और लय-विधान से है। मुफ़रद, मुरक्कब तथा मुज़ाहिफ़ बहरों के विभिन्न रूपों का अश्क जी ने जिस दक्षता के साथ प्रयोग किया है, वह इस संग्रह की प्रमुख साहित्यिक उपलब्धि है।
संग्रह में कुल 41 ग़ज़लें हैं और अलग-अलग शास्त्रीय बहरों में इनकी रचना की गई है। इस दृष्टि से बहरों का विविध और संतुलित प्रयोग बेकहल जिन्दगी की सबसे उल्लेखनीय विशेषताओं में सामने आता है।
ये भी पढ़ें- कुछ अश्लील गीत सुनकर भोजपुरी को नहीं जान सकते, उसका साहित्य भी पढ़िए
विविध बहरों का कुशल प्रयोग
संग्रह में मुफ़रद बहर के साथ-साथ बहरे हजज, बहरे रजज, बहरे मुतकारिब, बहरे रमल आदि के विभिन्न रूपों का प्रयोग मिलता है। उदाहरण के लिए-
“जिन्दगी के बहुत हम मनावत रहीं
ऊ लुटावल रहे हम लुकावत रहीं”
इसी प्रकार बहरे हजज मुसम्मन सालिम में-
“करे काहे सड़क के आदमी से आदमी नफरत
सड़क के आदमी से ही बढ़ेला की जिंदगी ससरत”
बहरे रजज मुसम्मन सालिम का उदाहरण है-
“हम गा सकीं ना रो सकीं जिंदगी अब का करीं
जियत रहीं रोवत रहीं जीवन कि हँस के हम मरी”
बहरे मुतकारिब सालिम में-
“बना के बहाना जियल जा रहल बा
फटल जिन्दगी बा सिअल जा रहल बा”
इसी क्रम में बहरे रजज मुरब्बा सालिम-
“देखीं रसाइल ठोर के
देखीं उड़ल अँख फोर के”
तथा बहरे हजज मुरब्बा सालिम-
“बहाना का सुनाईं हम
कथी गाके सुनाई हम”
और बहरे रमल मुरब्बा सालिम में—
“मद भरल बा रात आइल
रस भरल बा रात आइल”
जैसे उदाहरण मिलते हैं।
इसके अतिरिक्त बहरे रमल मुसम्मन, बहरे हजज मुसद्दस, बहरे मुतदारिक, बहरे रमल मुसद्दस और बहरे मुतकारिब की ग़ज़लें भी संग्रह में शामिल हैं।
मुरक्कब बहर के अंतर्गत बहरे बसित, बहरे जदीद, बहरे करीब, बहरे मुदीद और बहरे तबील का संतुलित प्रयोग भी अश्क जी की छंदगत दक्षता को प्रमाणित करता है। विशेष रूप से मुज़ाहिफ़ बहर का व्यापक प्रयोग उल्लेखनीय है। मुज़ाहिफ़ बहर के 22 प्रकारों में से 19 प्रकारों का प्रयोग इस संग्रह में मिलता है। शास्त्रीय बहरों के इतने विविध रूपों में लगातार ग़ज़ल लिखना सहज कार्य नहीं है। इसके लिए निरंतर अभ्यास, छंद का गहरा ज्ञान और भाषा पर असाधारण पकड़ आवश्यक है, जिसे अश्क जी ने सफलतापूर्वक सिद्ध किया है।
जीवन, प्रेम और वेदना के शायर
अश्क जी की ग़ज़लों का संसार केवल छंद और शिल्प तक सीमित नहीं है। इनमें जीवन, प्रेम, विरह, वेदना और संघर्ष के विविध भावों की अभिव्यक्ति दिखाई देती है।
प्रेम की अनुभूति को वे सहज भोजपुरी संवेदना के साथ व्यक्त करते हैं-
“इश्क के जादू चलल मह रहल बा जिन्दगी”
जीवन की विडंबना और मनुष्य की बेचैनी भी उनके यहाँ मुखर है-
“का कहीं हम इहाँ आदमी बा पी रहल जिंदगी भर जहर के”
शायर की रचनात्मक बेचैनी और जीवन के हिसाब-किताब का एक और रूप देखिए-
“रात रात भर इहाँ हो रहल हिसाब बा
के जिती हिसाब से भोर के बताइने”
वहीं अपनी स्थिति और समय की बेचैनी को वे इस प्रकार व्यक्त करते हैं-
“अश्क अब हालत आपन ढो रहल बाटे
हो रहल बा दिन आउर हर रात आपन अब”
जब प्रेम पीड़ा में बदलता है तो वही पीड़ा ‘अश्क’ बनकर कविता में उतरती है-
“जिंदगी के बहुत हम मानवत रहीं
ऊ लुटावत रहें हम लुकावत रहीं”
इस प्रकार संग्रह में प्रेम केवल रोमानी अनुभूति नहीं, बल्कि जीवन के सुख-दुःख और संघर्ष से जुड़ा व्यापक भाव बन जाता है।
सामाजिक चेतना का स्वर
बेकहल जिन्दगी की एक महत्वपूर्ण विशेषता इसका सामाजिक सरोकार है। अश्क जी केवल प्रेम और व्यक्तिगत वेदना के शायर नहीं हैं। उनकी ग़ज़लों में समकालीन समाज की वास्तविकताएँ भी स्पष्ट दिखाई देती हैं।
आदमी-आदमी के बीच बढ़ती दूरी, जीवन-संघर्ष, गरीबी, सामाजिक विसंगतियाँ और आम आदमी की पीड़ा उनके शेरों में जगह पाती है। वे सामाजिक व्यवस्था पर प्रश्न उठाते हैं और अपने समय की बेचैनी को भोजपुरी भाषा में स्वर देते हैं।
यही सामाजिक चेतना संग्रह को केवल भावप्रधान ग़ज़लों का संकलन बनने से रोकती है और उसे अपने समय के सामाजिक यथार्थ से जोड़ती है।
शिल्प, भाषा और व्याकरण
ग़ज़ल के शेर, मिसरा-ए-ऊला, मिसरा-ए-सानी, क़ाफ़िया और रदीफ़ पर अश्क जी की अच्छी पकड़ दिखाई देती है। प्रत्येक शेर को स्वतंत्र अर्थ देने की ग़ज़ल की परंपरा का उन्होंने पर्याप्त निर्वाह किया है।
हालाँकि कुछ ग़ज़लकार मतला, मक़ता और तख़ल्लुस के प्रयोग के माध्यम से अपनी विशिष्ट शैली निर्मित करते हैं, लेकिन बेकहल जिन्दगी में यह प्रवृत्ति प्रमुख रूप से दिखाई नहीं देती। कुछ पाठकों को यह बात खटक सकती है।
विषय और भाव की स्पष्टता संग्रह की शक्ति है। दूसरी ओर, कुछ विषयों की पुनरावृत्ति इसकी कमजोरी कही जा सकती है। इसी प्रकार कुछ स्थानों पर वर्तनी और नुक्तों के प्रयोग को प्रकाशन स्तर पर अधिक सावधानी से सुधारा जा सकता था।
खाँटी भोजपुरी शब्द-संपदा की विशेषता
बेकहल जिन्दगी की सबसे विशिष्ट उपलब्धियों में से एक है-भोजपुरी के खाँटी शब्दों और मुहावरों का व्यापक प्रयोग।
ग़ज़ल लिखते समय शायर प्रायः हिंदी और उर्दू के शब्दों का सहारा लेते हैं, ताकि भाव, तुक और लय को सहजता मिले। भोजपुरी ग़ज़ल में भी यह प्रवृत्ति आम है। लेकिन अश्क जी ने भोजपुरी की अपनी लोक-संपदा, मुहावरों और खाँटी शब्दावली के सहारे शास्त्रीय बहरों में ग़ज़लें रचकर यह प्रमाणित किया है कि भोजपुरी अपनी मौलिक शब्द-संपदा के बल पर भी ग़ज़ल की कठिन शिल्प-परंपरा को सफलतापूर्वक निभा सकती है।
यही प्रयोग इस संग्रह को विशिष्ट बनाता है। भाषा की लोक-गंध और शास्त्रीय छंद का यह मेल बेकहल जिन्दगी को भोजपुरी ग़ज़ल की परंपरा में अलग पहचान देता है।
बेकहल जिन्दगी भोजपुरी ग़ज़ल की शास्त्रीय परंपरा और लोकभाषिक संवेदना का सशक्त संगम है। गोपाल अश्क ने विभिन्न बहरों का जिस कुशलता से प्रयोग किया है, वह उनके छंदज्ञान और निरंतर साधना का प्रमाण है।
जीवन, प्रेम, वेदना, संघर्ष और सामाजिक यथार्थ के विविध रंग इस संग्रह को प्रभावशाली बनाते हैं। विशेष रूप से भोजपुरी के खाँटी शब्दों और मुहावरों को शास्त्रीय बहरों में ढालना इसकी उल्लेखनीय उपलब्धि है।
कुछ विषयों की पुनरावृत्ति तथा वर्तनी-संबंधी कमियों के बावजूद बेकहल जिन्दगी भोजपुरी ग़ज़ल के विकास और उसकी साहित्यिक समृद्धि में महत्त्वपूर्ण योगदान देने वाला संग्रह है। यह पुस्तक इस बात का प्रमाण है कि भोजपुरी केवल लोकगीतों और सहज कविता की भाषा नहीं, बल्कि शास्त्रीय ग़ज़ल जैसी अनुशासित साहित्यिक विधा को भी अपनी मौलिक भाषा-संवेदना के साथ समृद्ध कर सकती है।
पुस्तक: बेकहल जिन्दगी
विधा: भोजपुरी ग़ज़ल संग्रह
शायर: श्री गोपाल अश्क
प्रकाशक: अनाम मण्डली

