डॉ. संतोष पटेल
पेशा से पत्रकार आ हृदय से लेखक भाई रितेश त्रिपाठी के निबंध संग्रह ‘माटी-पानी’ भोजपुरी वाङ्मय के एगो अनमोल धरोहर बा। ई पुस्तक मात्र 22 गो निबंधन के संकलन ना, बलुक ई नेपाल आ भारत के मधेश क्षेत्र में बसल भोजपुरी समाज के धड़कन, श्रम, संघर्ष आ ओकर लोक-संस्कृति के जीवंत दस्तावेज ह। लेखक रितेश त्रिपाठी आपन मातृभाषा के प्रति जवन अनुराग आ हीन भावना के विरुद्ध जवन भाषाई चेतना के दीप जलवले बाड़न, ओकर लौ एह पुस्तक के हर पन्ना पर लउकेला। ई संग्रह एगो अइसन समय में आइल बा, जब वैश्वीकरण के दौर में लोग अपनी जड़न के ओर लौटे खातिर व्याकुल बा।
भाषाई अस्मिता आ आत्मबोध
रितेश त्रिपाठी के ‘लेखकीय के टूम’ से ई स्पष्ट हो जाला कि भाषिक अस्मिता के लड़ाई कतना गहीर बा। ऊ अपनी प्राथमिक शिक्षा के संस्मरण साझा करत बतावत बाड़न कि कइसे स्कूल में नेपाली माध्यम से पढ़ला के कारण उनकरा भीतर ई बोध भइल कि नेपाली एगो विशिष्ट भाषा ह। ‘पढ़ल-लिखल’ गिनाए खातिर दोसर भाषा के सहारा लेवे के जवन दर्द ऊ व्यक्त कइले बाड़न, ऊ आजुओ बहुभाषी समाज के कड़वा सच ह। बाकिर ‘माटी-पानी’ ई साबित करेला कि भोजपुरी सिर्फ बोलनिहारन के संख्या में ही ना, बलुक शब्द, भाव आ लोक-ज्ञान के अभिव्यक्ति में अंग्रेजी आ नेपाली जइसन भाषा से कवनो मायने में कम नईखे। वरिष्ठ पत्रकार चन्द्रकिशोर जी के सलाह—“आपन भाषा में लिखे के कोशिश करऽ”—लेखक खातिर मील के पत्थर साबित भइल।
प्राकृतिक संसाधन आ लोक-चेतना
संग्रह के शीर्षक ‘माटी-पानी’ प्रकृति के सबसे महत्वपूर्ण संसाधनन के प्रति लेखक के संवेदनशीलता के दर्शावेला। ‘माटी आ पानी: जीवन के आधार’ निबंध में ऊ बहुत पते के बात कहले बाड़न कि पानी बिना माटी के कवनो उपयोगिता नईखे। आज के ‘ग्लोबल वार्मिंग’ आ पर्यावरण विनाश के दौर में ई निबंध हमनी के सचेत करेला कि अगर हमनी अपनी माटी आ पानी के संरक्षण ना कइनी, त भविष्य में मानव जाति पर संकट तय बा।
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भोजपुरी समाज, जवन ‘माटी-पानी’ से जुड़ल सभ्यता ह, ओकर श्रम आ पसीना के गाथा लेखक ने बहुत सुंदर ढंग से लिखले बाड़न। ऊ लिखत बाड़न कि इहाँ के लोग आपन पसीना से पहिले माटी के सिंचित करेला, तब पानी के सहारा लेला। नदी के किनारे आ पानी के आसपास सभ्यता के विकास के बात करत लेखक ने चुरे क्षेत्र के मरुस्थलीकरण आ जलस्तर के गिरावट जइसन गम्भीर मुद्दा पर भी रोशनी डलले बाड़न।
लेखक के दृष्टि भौतिक सुख-सुविधा से आगे निकल के मानवीय सम्बन्धन के गहिराई तक पहुँचेला। ‘घर’ निबंध में ऊ स्पष्ट कहले बाड़न कि घर सिर्फ ईंट-पत्थर के ढाँचा ना, बल्कि परिवार के सदस्यन के ‘त्याग’ आ ‘सहिष्णुता’ से बनल एगो संस्था ह। गृहिणी के भोजन में अपना बेरा तरकारी खतम भइला पर चुप रहल, चाहे बाबूजी के आपन सुख त्याग के लइकन खातिर कपड़ा ले आवल—एह छोट-छोट त्यागों से ही घर टिकल रहेला।
वहीं दोसरी ओर, ‘समाज में जाति व्यवस्था के प्रभाव’ में लेखक के विद्रोही आ तार्किक स्वर सुनाई देला। ऊ सवाल उठावत बाड़न कि अगर वर्ण व्यवस्था काम पर आधारित रहे, त आज ई ऊँच-नीच के जहर काहे बन गइल बा? सिराहा जिला के डोम परिवार के घर ढहावे जइसन घटना पर उनकर कलम कबीर नियन खरी-खरी सुनावेले। लेखक के अनुसार, न्याय के बोध ही शिक्षित आ आधुनिक होखे के प्रारंभिक बिंदु ह।
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भोजपुरी संस्कृति के ‘पर्व-माला’—दशहरा, सोहरैया (दीपावली) आ छठ के लेखक ने सावा महीना के उत्सव के रूप में चित्रित कइले बाड़न। ‘लोक महापर्व: छठ’ में लेखक ने बतावल बा कि ई सिर्फ पूजा ना, बल्कि प्रकृति आ पुरुष के आराधना के कठिन तपस्या ह। एही तरे ‘महाशिवरात्री’ आ ‘फगुवा’ (होली) के दार्शनिक आ प्राकृतिक पक्षन पर गहीर चर्चा भइल बा।
लेखक ने ‘आम’ आ ‘बाँस’ जइसन वनस्पति के माध्यम से भोजपुरी जीवन के हर पहलू के उकेरल बा। आम जहाँ ‘सतुआन’ से लेके मृत्यु के अंत्येष्टि तक साथ देला, वहीं बाँस बियाह के माड़ो से लेके अरथी तक हमनी के संगी ह। बाँस के ‘हरा सोना’ कह के ओकर आर्थिक आ सांस्कृतिक उपयोगिता के लेखक ने बखूबी दर्शावल बा।
‘आइसपाइस’ (ढीपलीस) आ ‘घुर’ जइसन निबंध हमनी के बचपन के सुनहरी यादों में ले जाला। ‘घुर’ सिर्फ जाड़ा भगावे के आगि ना, बल्कि ऊ एगो अइसन ‘लाइव टेलीकास्ट’ के केंद्र रहे, जहाँ गाँव के रेडियो बाजेला, इराक-कुवैत के युद्ध के चर्चा होला आ आलू-कोन सेंक के खाए के मजा लेहल जाला। ई ‘घुर’ आपसी संवाद के सबसे बड़ केंद्र ह।
रितेश जी के दृष्टि आधुनिक बदलावो पर बा। ‘ब्रांड जब नाम बन जाला’ निबंध में ऊ बहुत रोचक ढंग से उपभोक्ता मनोविज्ञान के विश्लेषण कइले बाड़न। कइसे ‘जीप’, ‘डाल्डा’, ‘सर्फ’ आ ‘गूगल’ जइसन ब्रांड आज वस्तु के पर्याय बन गइल बा, एकरा पीछे के बाजारशास्त्र के लेखक ने बखूबी समझवले बाड़न।
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उहें ‘ललीपॉप लागेलू’ के माध्यम से ऊ भोजपुरी संगीत के वैश्विक पहुँच के साथ-साथ ओकरा पर लागल फूहड़ता के आरोपन पर भी गम्भीर चर्चा कइले बाड़न। ‘नेपाल में गणतंत्र’ निबंध में लेखक ने नेपाल के राजनीतिक परिवर्तन, गणतंत्र के प्राप्ति आ समावेशिता के चुनौती पर विस्तृत प्रकाश डलले बाड़न।
ऋतु विचार आ प्रकृति के संगीत
लेखक ने भोजपुरी लोक-जीवन में ऋतुअन के प्रभाव के गहिराई से महसूस कइले बाड़न। बसंत के नवसृजन से लेके शिशिर के भीषण जाड़ा तक के वर्णन पाठक के प्रकृति के साथे जोड़ देला। ग्रीष्म ऋतु में माटी के सोंध सुगंध, वर्षा में किसानन के व्यस्तता आ शरद में हिमालय के सुंदरता—सब कुछ अपनी आँखन के सामने सजीव हो जाला। लेखक के अनुसार, ऋतुअन के बदलाव के समझना ही प्रकृति के साथे सामंजस्य बिठावल ह।
व्यक्तित्व- प्रेरणा के पुंज
संग्रह के ‘व्यक्तित्व’ खंड में लेखक ने भोजपुरी आ भारतीय उपमहाद्वीप के महान विभूतियन के नमन कइले बाड़न।
- सन्त कबीर: 15वीं शताब्दी के कबीर के विद्रोह आ मानवीय चेतना के लेखक ने आज के समय में भी सान्दर्भिक बतवले बाड़न।
- संतकवि भिनकराम: नेपाल के सर्लाही में जन्मल एह निर्गुण संतकवि के रचना आ प्रभाव के लेखक ने बखूबी रेखांकित कइले बाड़न।
- शारदा सिन्हा: छठ के गीतन के पर्यायवाची बनल शारदा जी के निधन के समय छठ के धुन के साथ उनकर बिदाई के दृश्य मन के भावुक कर देला।
- पण्डित दीपनारायण मिश्र: नेपालीय भोजपुरी के ‘भीष्मपितामह’ कहल जाए वाला मिश्र जी के भाषाई संरक्षण खातिर कइल गइल आजीवन संघर्ष के लेखक ने नमन कइले बाड़न।
- उमाशंकर द्विवेदी ‘दधीचि’: नेपालीय भोजपुरी साहित्य के ‘बरियार खंभा’ मानल जाए वाला द्विवेदी जी के आख्यान साहित्य आ ठेंठ भोजपुरी शैली के लेखक ने अमूल्य धरोहर बतवले बाड़न।
रितेश त्रिपाठी जी के ई कृति ‘माटी-पानी’ मात्र निबंधन के संग्रह ना, बल्कि ई भोजपुरी अस्मिता के तलाश ह। लेखक के भाषा सहज बा, बाकिर ओकर अर्थ गहीर बा। ई किताब पाठक के अपनी माटी से जोड़े खातिर मजबूर कर दी।
एगो सजग साहित्यकार के रूप में रितेश जी ने अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभवले बाड़न। ई पुस्तक भोजपुरी साहित्य जगत में एगो मील के पत्थर साबित होई, अइसन हमार पूर्ण विश्वास बा। ‘माटी-पानी’ के पन्ना दर पन्ना भोजपुरी समाज के ‘सांस्कृतिक एटलस’ (सांस्कृतिक मानचित्र) के रूप में हमनी के सोझा बा, जवन भविष्य के पीढ़ी खातिर एगो अनिवार्य मार्गदर्शक बन जाई। मंगलकामना बा। जय भोजपुरी।
– डॉ. संतोष पटेल, भोजपुरी अध्येता आ सहायक कुलसचिव, दिल्ली कौशल एवं उद्यमिता विश्वविद्यालय, नई दिल्ली

