‘बिगुल’ का पराग पर एकाग्र विशेषांक, भोजपुरी साहित्य के एक मनीषी का सार्थक पुनर्पाठ

Date:

समीक्षक : डॉ. सुनील कुमार पाठक

साहित्यिक पत्रिकाओं के लगातार बंद होते दौर में किसी पुरानी पत्रिका का पुनर्प्रकाशन भोजपुरी साहित्य-जगत के लिए निश्चय ही एक सुखद और उम्मीद जगाने वाली घटना है। ‘बिगुल’ के पुनर्प्रकाशन की शुरुआत इसके आद्य संपादक सूर्यदेव पाठक ‘पराग’ पर केंद्रित विशेषांक से हुई है। यह पहल भोजपुरी के साहित्यिक-सांस्कृतिक संसार के लिए एक सुभग संकेत है।

‘बिगुल’ से मेरा व्यक्तिगत जुड़ाव भी रहा है। इसी पत्रिका में मेरे हाइकु पहली बार प्रकाशित हुए थे। इसलिए इस पत्रिका के प्रति मेरा विशेष अनुराग स्वाभाविक है। अपने सीमित आकार के बावजूद ‘बिगुल’ ने पराग जी के कुशल संपादन में श्रेष्ठ रचनाओं को स्थान देते हुए स्वस्थ साहित्यिक और सांस्कृतिक वातावरण निर्मित किया। साथ ही भोजपुरी की संवैधानिक मान्यता के लिए चल रहे प्रयासों को भी वैचारिक ऊर्जा प्रदान की।

ये भी पढ़ें-भाषा, बाज़ार और अश्लीलता: भोजपुरी ही क्यों गुनहगार?

नया अंक सुभाष राय के संपादन में प्रकाशित हुआ है और पूरी तरह सूर्यदेव पाठक ‘पराग’ के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर केंद्रित है। विशेषांक में पराग जी के साहित्यिक अवदान पर अनेक प्रतिष्ठित लेखकों के आलेख संकलित हैं। जानकीवल्लभ शास्त्री, नंदकिशोर नवल, बच्चन पाठक ‘सलिल’, पांडेय कपिल, अर्जुन तिवारी, अक्षयवर दीक्षित, केदारनाथ पांडेय, जितेन्द्र कुमार, प्रो. ब्रजकिशोर, भगवती प्रसाद द्विवेदी, जगन्नाथ, स्वर्णकिरण, आद्या प्रसाद द्विवेदी, रामदेव शुक्ल, अनिरुद्ध सिन्हा, रसिक बिहारी ओझा ‘निर्भीक’, महामाया प्रसाद ‘विनोद’, जीतेन्द्र वर्मा आदि के लेख पराग जी की रचनाधर्मिता, साहित्यिक सौष्ठव और विपुल अवदान को समझने में महत्वपूर्ण हैं।

विशेषांक की एक उल्लेखनीय विशेषता इसमें शामिल पराग जी के साक्षात्कार और उनके स्वयं के आलेख हैं। हरेराम पाठक, दिलीप कुमार आदि के साथ हुए संवाद उनके व्यक्तित्व और विचार-संसार को समझने में उपयोगी हैं। वहीं उनके आलेख पाठकों को उनकी वैचारिक दृष्टि से सीधे परिचित कराते हैं।

साहित्यकारों पर प्रकाशित अभिनंदन ग्रंथों में अक्सर प्रशस्ति और स्वस्तिवाचन अधिक दिखाई देता है, लेकिन ‘बिगुल’ का यह विशेषांक उस परंपरा से अलग दिखाई देता है। इसमें पूर्वप्रकाशित महत्वपूर्ण आलेखों को भी शामिल किया गया है, जो पराग जी के रचना-संसार से परिचित कराने के साथ-साथ उनके साहित्य के आस्वादन की दृष्टि भी प्रदान करते हैं। विशेषांक में मेरे दो आलेख भी शामिल हैं।

ये भी पढ़ें-‘भोजपुरिया बवाल’ और भोजपुरी की छवि, नाम-भाषा और पहचान पर उठे सवाल

इस अंक में पराग जी की प्रमुख कृतियों ‘पराग सतसई’, ‘निबंध विविधा’, ‘सूर्यदेव पाठक ‘पराग’ संकलन’ और ‘बेच रहा ईमान’ का उल्लेख भी अपेक्षित था। पराग जी संस्कृत, हिंदी और भोजपुरी में निरंतर लेखन करते रहे हैं और उनका व्यापक साहित्यिक अवदान भोजपुरी जगत के लिए महत्वपूर्ण धरोहर है।

पुनर्प्रकाशन के साथ ‘बिगुल’ के संस्थापक-संपादक का नाम प्रारंभिक पृष्ठों पर प्रमुखता से दर्ज रहना पत्रिका की ऐतिहासिक निरंतरता और गरिमा को और बढ़ा सकता है। आगामी अंकों के लिए भाषा-विज्ञान और समाजशास्त्रीय मूल्यांकन से संबंधित आलेख आमंत्रित करने का संपादकीय निर्णय भी सराहनीय है।

कुल मिलाकर, ‘बिगुल’ का यह पराग विशेषांक केवल श्रद्धांजलि या अभिनंदन नहीं, बल्कि सूर्यदेव पाठक ‘पराग’ के साहित्यिक अवदान का गंभीर पुनर्पाठ है। उम्मीद की जानी चाहिए कि पराग जी के सपनों के अनुरूप ‘बिगुल’ भोजपुरी समाज, संस्कृति और साहित्य के विकास की अपनी भूमिका को निरंतर आगे बढ़ाएगा।

पत्रिका : ‘बिगुल’ (जुलाई-दिसंबर 2026)
संपादक : सुभाष राय
प्रकाशक : साहित्य कला मंच, रोशन नगर, भट्ठी, सीवान–841226 (बिहार)
कुल पृष्ठ : 304
मूल्य : ₹200

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Share post:

spot_imgspot_img

Popular

More like this
Related

‘गंगा रतन बिदेसी’ भोजपुरी उपन्यास में प्रवासी जीवन की पीड़ा

समीक्षक: प्रकाश प्रियांशु भोजपुरी साहित्य धारा में उपन्यास विधा अपेक्षाकृत...

भोजपुरी में पढ़ाई जाएंगी कबीर की उलटबांसियां, नए सिलेबस में कबीर से पत्रकारिता तक

पटना। बिहार के विश्वविद्यालयों में भोजपुरी से स्नातक करने...

भोजपुरी बोलना शर्म नहीं, गर्व की बात है

भाषा सिर्फ बातचीत का माध्यम नहीं होती, वह किसी...