समीक्षक: डॉ. दिनेश प्रसाद सिन्हा
श्रीमद् भगवद् गीता भारतीय ज्ञान-परंपरा का ऐसा महान ग्रंथ है, जिसकी प्रासंगिकता किसी एक समय, वर्ग अथवा भूगोल तक सीमित नहीं है। जीवन, कर्म, ज्ञान, भक्ति, आत्मा, प्रकृति, कर्तव्य और मोक्ष जैसे गहन प्रश्नों पर भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद के माध्यम से गीता भारतीय दर्शन की व्यापक जीवन-दृष्टि प्रस्तुत करती है।
संस्कृत में रचित इस महत्त्वपूर्ण ग्रंथ को भोजपुरी में उपलब्ध कराना इसलिए उल्लेखनीय है कि किसी भी ज्ञान-परंपरा का व्यापक लोकचेतना से जुड़ाव तभी मजबूत होता है, जब वह जनसामान्य की अपनी भाषा में आत्मीय रूप से उपलब्ध हो। डॉ. विजय किशोर पाण्डेय का ‘श्रीमद् भगवद् गीता’ का भोजपुरी अनुवाद इसी दृष्टि से एक महत्त्वपूर्ण और साहसिक साहित्यिक प्रयास है।
यह पुस्तक मुझे डॉ. विजय किशोर पाण्डेय जी ने नेपाल भोजपुरी फाउंडेशन के कलैया, नेपाल में आयोजित कार्यक्रम में सादर भेंट की थी। उन्होंने इस पुस्तक की समीक्षा करने का अनुरोध भी किया था। कुछ व्यस्तताओं और परिस्थितिजन्य कारणों से तत्काल इस पर लिखना संभव नहीं हो सका। अब समय निकालकर इस महत्त्वपूर्ण कृति पर अपने विचार प्रस्तुत करने का यह एक छोटा-सा प्रयास है।
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डॉ. विजय किशोर पाण्डेय नेपाल की उस रचनात्मक परंपरा से जुड़े साहित्यकार हैं, जिन्होंने सनातन धर्म और संस्कृति के लिए लेखन, अध्ययन और अनुवाद के माध्यम से अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है।
भोजपुरी में गीता की जरूरत क्यों?
भोजपुरी महज संवाद की भाषा नहीं है। यह व्यापक लोकजीवन की संवेदना, संस्कृति, परंपरा और अनुभवों की भाषा है। इसलिए गीता का भोजपुरी में उपलब्ध होना अपने आप में महत्त्वपूर्ण है। इससे उन पाठकों के लिए गीता के दर्शन तक पहुँच आसान होती है, जिनके लिए भोजपुरी भाव और अनुभूति की सबसे निकट की भाषा है।
मातृभाषा में पढ़ा गया आध्यात्मिक और दार्शनिक विचार केवल सूचना बनकर नहीं रह जाता, बल्कि वह व्यक्ति के अनुभव और संवेदना से जुड़ने लगता है। इस दृष्टि से डॉ. पाण्डेय का प्रयास भोजपुरी समाज के लिए उपयोगी दिखाई देता है।
इस पुस्तक का एक दूसरा महत्त्वपूर्ण पक्ष भारत और नेपाल के भोजपुरी भाषी सांस्कृतिक क्षेत्र से जुड़ता है। नेपाल से जुड़े एक रचनाकार द्वारा गीता जैसे भारतीय दार्शनिक ग्रंथ को भोजपुरी में प्रस्तुत करना भोजपुरी भाषा की व्यापक सांस्कृतिक उपस्थिति और संभावनाओं को भी रेखांकित करता है।
18 अध्यायों को भोजपुरी में प्रस्तुत करने का प्रयास
डॉ. पाण्डेय ने गीता के सभी 18 अध्यायों और उनके श्लोकों को भोजपुरी में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। यह काम केवल संस्कृत के शब्दों को भोजपुरी में बदल देने भर का नहीं है। वास्तविक चुनौती मूल ग्रंथ की दार्शनिक गंभीरता, आध्यात्मिक भाव और काव्यात्मक गरिमा को बचाते हुए उसे भोजपुरी पाठक के लिए सहज बनाना है।
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गीता के 18 अध्यायों को एक साथ देखने पर स्पष्ट होता है कि यह केवल उपदेशों का संग्रह नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर चलने वाले नैतिक, आध्यात्मिक और दार्शनिक द्वंद्व की क्रमिक यात्रा है। अर्जुन के विषाद और कर्तव्य-संकट से शुरू होने वाली यह यात्रा कर्मयोग, ज्ञान, आत्मतत्त्व, भक्ति, ईश्वर, प्रकृति, परम सत्ता, गुण, श्रद्धा, त्याग और मोक्ष जैसे विषयों तक पहुँचती है।
डॉ. पाण्डेय ने इस व्यापक दार्शनिक यात्रा को भोजपुरी में सामने रखने का संतुलित प्रयास किया है।
अनुवादक के सामने सबसे बड़ी चुनौती
गीता के अनुवाद की कठिनाई केवल भाषा की नहीं, बल्कि दर्शन की है। ‘कर्म’, ‘धर्म’, ‘योग’, ‘आत्मा’, ‘ब्रह्म’, ‘प्रकृति’, ‘पुरुष’, ‘गुण’, ‘त्याग’ और ‘मोक्ष’ जैसे शब्द अपने भीतर भारतीय दर्शन की लंबी परंपरा समेटे हुए हैं। इसलिए इनका दूसरी भाषा में रूपांतरण करते समय केवल शब्दार्थ देना पर्याप्त नहीं होता; भावार्थ और संदर्भ को भी सुरक्षित रखना पड़ता है।
अनुवादक के सामने दोहरी चुनौती रहती है। एक तरफ मूल संस्कृत की अर्थ-गहनता और गरिमा बचानी होती है, दूसरी तरफ भोजपुरी की स्वाभाविकता और प्रवाह को बनाए रखना होता है। यदि भाषा अत्यधिक संस्कृतनिष्ठ हो जाए तो भोजपुरी की सहजता प्रभावित हो सकती है और यदि उसे अत्यधिक बोलचाल का बना दिया जाए तो मूल ग्रंथ की दार्शनिक गंभीरता कमजोर पड़ सकती है। डॉ. पाण्डेय ने इस संतुलन को काफी हद तक साधने का प्रयास किया है।
भाषा की सहजता और कुछ कमियाँ
पुस्तक की बड़ी उपलब्धि इसकी भाषा है। अनुवाद को भोजपुरी में रखने का गंभीर प्रयास किया गया है और अनावश्यक हिंदी शब्दों से बचने की कोशिश दिखाई देती है। इससे पुस्तक भोजपुरी पाठक के लिए अधिक आत्मीय बनती है।
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हालाँकि, यहीं एक कमी भी महसूस होती है। संस्कृत और दार्शनिक शब्दों के अर्थ को कुछ स्थानों पर और विस्तार से समझाया जा सकता था। कहीं-कहीं कठिन शब्दों का अर्थ दिया गया है, लेकिन ऐसे अनेक शब्द भी हैं जिनका अर्थ सामान्य पाठक के लिए स्पष्ट नहीं हो सकता।
इसी तरह भोजपुरी के मुहावरों का अपेक्षाकृत कम प्रयोग खटकता है। यदि उपयुक्त स्थानों पर लोकभाषा के मुहावरों और लोकोक्तियों का सहारा लिया जाता, तो पुस्तक का भोजपुरीपन और अधिक प्रभावशाली हो सकता था तथा पाठक और श्रोता दोनों इससे अधिक आत्मीयता से जुड़ सकते थे।
फिर भी, मूल गीता की भावना और दार्शनिक स्वर को भोजपुरी में जीवित रखने का प्रयास पुस्तक की उल्लेखनीय उपलब्धि है।
श्लोकों की प्रस्तुति और व्याख्या
गीता के श्लोकों का अनुवाद करते समय केवल शब्दों का अर्थ देना पर्याप्त नहीं होता। कई श्लोकों के पीछे दर्शन की पूरी अवधारणा जुड़ी हुई है। इसलिए कुछ स्थानों पर अर्थ को और विस्तार से समझाया जाता तो पाठक के लिए विषय अधिक स्पष्ट हो सकता था।
उदाहरण के लिए, पृष्ठ 59 के श्लोक 19 में ‘यथा दीपो… योगमात्मनः’ के संदर्भ में ‘चित’ शब्द के साथ कोष्ठक में ‘मन’ का अर्थ दिया गया है। यह उपयोगी प्रयास है, लेकिन पुस्तक में ऐसे कई गंभीर अथवा कम प्रचलित शब्द हैं, जिनके अर्थ भी इसी तरह दिए जाते तो सामान्य पाठक के लिए सुविधा होती।
इसी प्रकार पृष्ठ 124 के श्लोक 26 में वर्णित तीनों गुणों और ब्रह्मभाव की प्राप्ति के संबंध को उदाहरण सहित थोड़ा विस्तार दिया जाता तो इसका प्रभाव और गहरा हो सकता था।
इन बिंदुओं को पुस्तक की मूल भावना पर प्रश्न के रूप में नहीं, बल्कि अगले संस्करण को और बेहतर बनाने के सुझाव के रूप में देखा जाना चाहिए।
अनुवाद या भावानुवाद?
डॉ. पाण्डेय का उद्देश्य संस्कृत के प्रत्येक शब्द का यांत्रिक रूपांतरण करना नहीं दिखाई देता। उनका मूल उद्देश्य गीता के दर्शन और भाव को भोजपुरी पाठक तक पहुँचाना है।
जहाँ कहीं उन्होंने शब्दशः अनुवाद से हटकर भाव को अधिक स्पष्ट किया है, उसे अनुवाद की कमजोरी मानना उचित नहीं होगा। यह भावानुवाद की स्वाभाविक रणनीति है, बशर्ते मूल आशय सुरक्षित रहे। इस दृष्टि से पुस्तक में किया गया प्रयास उल्लेखनीय है।
नेपाल, भोजपुरी और भारतीय संस्कृति का सांस्कृतिक सेतु
इस पुस्तक की विशेषता केवल इसके भाषाई पक्ष में नहीं है। यह नेपाल, भोजपुरी और भारतीय संस्कृति के बीच एक सांस्कृतिक सेतु के रूप में भी देखी जा सकती है।
नेपाल से जुड़े रचनाकार द्वारा भारतीय दर्शन के मूल ग्रंथ को भोजपुरी में प्रस्तुत करना दोनों देशों के भोजपुरी भाषी समाज के लिए महत्त्वपूर्ण है। भोजपुरी की सांस्कृतिक सीमा राजनीतिक सीमाओं से कहीं व्यापक है। ऐसे प्रयास इस भाषा को केवल मनोरंजन या लोकबोली के दायरे से बाहर निकालकर ज्ञान, दर्शन और गंभीर साहित्य की भाषा के रूप में स्थापित करने में योगदान दे सकते हैं।
वर्तनी, व्याकरण और संपादन की गुंजाइश
पुस्तक में कहीं-कहीं एकवचन-बहुवचन के स्तर पर व्याकरण संबंधी असंगतियाँ दिखाई देती हैं। कुछ वर्तनी संबंधी त्रुटियाँ और विराम-चिह्नों के प्रयोग में भी सुधार की आवश्यकता महसूस होती है।
ऐसी त्रुटियाँ किसी बड़े अनुवाद-प्रयास की महत्ता को कम नहीं करतीं, लेकिन दूसरे संस्करण में इनका सावधानीपूर्वक प्रूफरीडिंग और संपादन किया जाना आवश्यक होगा। इससे पुस्तक की विश्वसनीयता और प्रस्तुति दोनों बेहतर होंगी।
शीर्षक को लेकर एक जरूरी बात
पुस्तक का शीर्षक ‘श्रीमद् भगवद् गीता’ रखा गया है। इसे लेकर कुछ पाठकों को आश्चर्य हो सकता है, क्योंकि आम बोलचाल में कहीं-कहीं ‘श्रीमद् भागवत गीता’ भी लिखा जाता है। यहाँ समीक्षक के अनुसार पुस्तक में प्रयुक्त शीर्षक को उसी रूप में रखा गया है। अतः पुस्तक की समीक्षा में भी पुस्तक पर अंकित मूल शीर्षक ‘श्रीमद् भगवद् गीता’ का ही प्रयोग किया गया है।
कुल मिलाकर डॉ. विजय किशोर पाण्डेय की ‘श्रीमद् भगवद् गीता’ भोजपुरी संस्कृत के एक महान धार्मिक-दर्शनिक ग्रंथ को लोकभाषा में पहुँचाने का साहसिक और महत्त्वपूर्ण प्रयास है। इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि गीता के दर्शन को भोजपुरी पाठक के निकट लाने की कोशिश की गई है।
पुस्तक में भाषा, व्याख्या, मुहावरों, वर्तनी और संपादन के स्तर पर कुछ सुधार की गुंजाइश अवश्य है। अगले संस्करण में कठिन दार्शनिक शब्दों की व्याख्या, उदाहरणों और भोजपुरी के लोक मुहावरों का अधिक प्रभावी प्रयोग इसे और समृद्ध बना सकता है।
फिर भी, इन सीमाओं के बावजूद यह कृति भोजपुरी पाठकों के लिए श्रीमद् भगवद् गीता के दर्शन, उसके सूत्रों और जीवन-दृष्टि को अपनी भाषा में समझने की दिशा में एक गौरवपूर्ण उपहार है।
यह केवल एक धार्मिक ग्रंथ का भाषांतरण नहीं, बल्कि ज्ञान को लोकभाषा में पुनःसंवाद कराने का साहित्यिक प्रयास है। इसी कारण डॉ. विजय किशोर पाण्डेय का यह कार्य भोजपुरी साहित्य और भारतीय ज्ञान-परंपरा—दोनों के संदर्भ में उल्लेखनीय बन जाता है।
पुस्तक: श्रीमद् भगवद् गीता
अनुवादक: डॉ. विजय किशोर पाण्डेय
प्रकाशक: भुँडी पुराण प्रकाशन, काठमांडू
मूल्य: 300 नेपाली रुपये / ₹200
ISBN: 978-9937-380072


भोजपुरी भासा में गीता क अनुसार लीखल बहुत बड़वार योगदान बा,सब केहू पढ़िए सकेला,पाण्डेय जी के कीर्ति हमेशा फैली।