‘बार के दीअरी दहा दिहिला’, भोजपुरी गजल आ गीत में माटी के महक के अनमोल संग्रह

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समीक्षक: राजेश भोजपुरिया

भोजपुरी साहित्य में गजल आ गीत के परंपरा के समृद्ध करे वाला डॉ. उदय प्रताप हयात के पहिला भोजपुरी गजल-गीत संग्रह ‘बार के दीअरी दहा दिहिला’ (प्रकाशक: जिज्ञासा प्रकाशन, गाजियाबाद, प्रथम संस्करण-2024) पाठकन के बीच एगो महत्वपूर्ण कृति के रूप में सामने आइल बा। ई संग्रह भोजपुरी समाज, संस्कृति आ बदलत समय के संवेदनशील अभिव्यक्ति के सशक्त दस्तावेज बा।

जमशेदपुर के प्रतिष्ठित गजलकार डॉ. उदय प्रताप हयात भोजपुरी आ हिन्दी साहित्य के जानल-मानल हस्ताक्षर बानी। साहित्य साधना के क्षेत्र में इहाँ के योगदान बहुआयामी रहल बा। जमशेदपुर के माटी से जुड़ल रह के भोजपुरी आ हिन्दी साहित्य के समृद्ध करे में इहाँ के भूमिका उल्लेखनीय बा। हिन्दी गजल संग्रह ‘तेरे कूचे में हुआ कत्ल’ के सफलता के बाद डॉ. हयात आपन पहिला भोजपुरी गजल-गीत संग्रह ‘बार के दीअरी दहा दिहिला’ के माध्यम से भोजपुरी पाठकन के बीच उपस्थित भइल बानी।

ये भी पढ़ें- भाषा, बाज़ार और अश्लीलता: भोजपुरी ही क्यों गुनहगार?

एह संग्रह में कुल 36 गो गजल आ 23 गो गीत संकलित बाड़े, जे भोजपुरी समाज के जीवन, संस्कृति, प्रेम, पीड़ा, सामाजिक विसंगति आ आधुनिक दौर के चुनौतियन के गहराई से प्रस्तुत करेला।

माटी से जुड़ल संवेदना के स्वर

संग्रह के शीर्षक गजल में रचनाकार के भावनात्मक गहराई साफ दिखाई देला-

“बार के दीअरी दहा दिहिला।
रोसनी के लगन चूमा दिहिला।
ई हिया रोअबे छछनबे करी,
ई कबूतर बझा उड़ा दिहिला।।”

डॉ. उदय प्रताप हयात के रचना संसार केवल प्रेम आ सौंदर्य तक सीमित नइखे। इहाँ के गजल में समय के सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक आ राजनीतिक विसंगतियन पर भी तीखा नजर पड़ेला। आज के दौर में कमजोर पड़त मानवीय संबंधन आ संवेदनहीनता पर रचनाकार समाज के आईना देखावत नजर आवेलन—

“अजीब जुग बा इ, केहू सहाई ना होला।
समय बिगड़ला प हां भाई-भाई ना होला।
जनम जनम के रहल कुछ अ की एगो टोना,
कि जान बुझ के केहू कसाई ना होला।।”

एह पंक्तियन में बदलत पारिवारिक संबंध आ सामाजिक विघटन के मार्मिक चित्रण मिलेला।

आधुनिकता आ भोजपुरी संवेदना के संगम

‘बार के दीअरी दहा दिहिला’ के सबसे बड़ खासियत बा कि एह में परंपरा आ आधुनिकता के सुंदर मेल दिखाई देला। रचनाकार के भाषा पर मजबूत पकड़ हर पन्ना पर महसूस होला। भोजपुरी के सहज मिठास के साथ आधुनिक जीवन के बदलत रूप, शहरीकरण, फ्लैट संस्कृति आ बदलत सामाजिक परिवेश के चित्रण संग्रह के विशेष बनावेला।

उमिर, अनुभव आ समय के बदलाव के एहसास एगो गजल में बहुत प्रभावशाली ढंग से उभर के सामने आवेला—

“जिंदगानी भई पानी-पानी भइल।
देह टाटी निअन आंख छानी भइल।
साठ सालों प बानी स कांसा पितर,
केहू सोना बनल केहू चानी भइल।।”

एह पंक्तियन में जीवन यात्रा, संघर्ष आ समय के परिवर्तन के गहरी अनुभूति बा।

भोजपुरी भाषा के भविष्य पर सकारात्मक सोच

भोजपुरी भाषा के विकास आ भविष्य के लेकर डॉ. उदय प्रताप हयात के सोच व्यापक बा। इहाँ के मानना बा कि भोजपुरी एगो लसगर, आत्मीय आ प्रेम-मनुहार से भरल भाषा ह। जब कवनो भाषा बोलचाल के परंपरा से निकल के लेखन परंपरा में प्रवेश करेला, त ओकर स्वरूप में बदलाव स्वाभाविक होला। ई बदलाव भाषा के अउरी समृद्ध बनावेला।

इहे दृष्टिकोण इहाँ के रचना में भी दिखाई देला-

“पुरान बात बिसार आज सांच बोलीं सभे।
मनुज भइल बा इ काहे लबार पूछीं सभे।
कि जर-जमीन के मसला सफाई से सुलझे,
कि मुंह चिआर के लड़ला से पहिले सोचीं सभे।।”

एह पंक्तियन में समाज के विवेक, संवाद आ शांति के संदेश मिलेला।

मंचीय प्रस्तुति आ शब्द-सौंदर्य

डॉ. उदय प्रताप हयात के गजल के एगो खास पहचान इहाँ के मंचीय प्रस्तुति भी बा। सस्वर पाठ में इहाँ के ऊर्जा, भाव आ शब्द चयन श्रोता के बांधे रखेला। गजल के रवानी आ भावनात्मक प्रभाव पाठक आ श्रोता दुनु के प्रभावित करेला।

संग्रह के एगो गजल में शहरीकरण आ प्रकृति के नुकसान के पीड़ा देखल जा सकेला-

“हरिअर लुभावन झरोखा बिकाता।
बिका तारी माटी आ लोटा बिकाता।
फलैटन में लागी बगइचा के झांकी,
उड़ा के चिरईअन के खोंता बिकाता।।”

एह पंक्तियन में विकास के नाम पर प्रकृति से दूर होत समाज के पीड़ा के बहुत सुंदर ढंग से व्यक्त कइल गइल बा।

‘बार के दीअरी दहा दिहिला’ भोजपुरी गजल आ गीत साहित्य में एगो महत्वपूर्ण उपलब्धि बा। एह संग्रह में भोजपुरी माटी के खुशबू, समाज के सच, समय के सवाल आ मानवीय संवेदना के सुंदर समावेश बा। डॉ. उदय प्रताप हयात एह कृति के माध्यम से भोजपुरी गजल के नया ऊंचाई देवे के काम कइले बानी।

ई संग्रह ना खाली भोजपुरी साहित्य प्रेमियन खातिर महत्वपूर्ण बा, बल्कि युवा रचनाकारन खातिर भी प्रेरणा के स्रोत बा। भोजपुरी भाषा आ साहित्य के समृद्ध करे वाली एह सुंदर कृति खातिर डॉ. उदय प्रताप हयात जी के हार्दिक बधाई आ शुभकामना।

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