‘भोजपुरी के मान्यता देईं, ए सरकार’ : भाषा-अस्मिता, लोकचेतना और जनआंदोलन का काव्यात्मक दस्तावेज

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समीक्षक : डॉ. दिनेश प्रसाद सिन्हा

भोजपुरी की मान्यता की मांग को कविता का जनस्वर बनाता संग्रह

भोजपुरी भाषा की संवैधानिक मान्यता का सवाल केवल भाषा का प्रश्न नहीं, बल्कि अस्मिता, संस्कृति, लोकजीवन और सामाजिक पहचान से भी जुड़ा हुआ है। रामबहादुर राय का काव्य-संग्रह ‘भोजपुरी के मान्यता देईं, ए सरकार!’ इसी सवाल को कविता के माध्यम से जनचेतना तक पहुंचाने का प्रयास करता है। 2022 में प्रकाशित इस संग्रह में कुल 58 रचनाएँ हैं। संग्रह के शीर्षक से लेकर अनेक कविताओं तक भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किए जाने की मांग प्रमुख स्वर के रूप में सामने आती है।

इस संग्रह को केवल कविताओं की किताब के रूप में पढ़ना पर्याप्त नहीं होगा। यह भोजपुरी भाषा के अधिकार और सम्मान की मांग को लोकभाषा में व्यक्त करने वाला भाषाई-सांस्कृतिक दस्तावेज भी है। कवि कविता को केवल निजी भावाभिव्यक्ति या मनोरंजन का माध्यम नहीं बनाते, बल्कि उसे जनजागरण और भाषा-अधिकार की आवाज बनाते हैं।

शीर्षक में ही पूरी किताब का केंद्रीय स्वर

‘भोजपुरी के मान्यता देईं, ए सरकार!’ शीर्षक पुस्तक की पूरी वैचारिक दिशा को स्पष्ट कर देता है। ‘ए सरकार!’ का संबोधन सीधे संवाद और आग्रह का भाव पैदा करता है, जबकि ‘भोजपुरी के मान्यता देईं’ मांग को बिल्कुल स्पष्ट रूप में सामने रखता है।

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शीर्षक में कोई जटिल प्रतीक या रहस्य नहीं है। इसकी शक्ति ही इसकी सीधी और सहज अभिव्यक्ति में है। पाठक किताब हाथ में लेते ही उसके मूल सरोकार से परिचित हो जाता है।

भाषा-प्रेम से आंदोलन की चेतना तक

संग्रह की रचनाएँ भोजपुरी के प्रति प्रेम से शुरू होकर जागरण, एकता और आंदोलन की भावना तक पहुंचती हैं। ‘हम भोजपुरी हईं! मान्यता दिहीं ए सरकार!’, ‘हमके चाहीं भोजपुरी’, ‘हे भोजपुरिया!! अबे से जाग जा!!’, ‘भोजपुरी खातिर त एक हो जाईं’ और ‘भोजपुरी खातिर आंदोलन करहीं के परी’ जैसे शीर्षक कवि की प्राथमिकता को साफ करते हैं।

कवि के लिए भोजपुरी केवल बोलचाल की भाषा नहीं है। वह इसे सामाजिक पहचान, संस्कार, संस्कृति और सामूहिक अस्तित्व से जोड़ते हैं। इसीलिए भाषा-प्रेम उनकी कविताओं में निष्क्रिय भावुकता नहीं रहता, बल्कि सक्रिय सामाजिक चेतना का रूप ले लेता है।

‘भोजपुरी अपनावे के ही परी’ जैसे भावों के जरिए कवि यह संदेश देते हैं कि भाषा की प्रतिष्ठा केवल सरकार से मांग करने से नहीं, बल्कि समाज के अपने व्यवहार से भी तय होगी।

भोजपुरी के साथ जुड़ा पूरा लोकजीवन

इस संग्रह की एक बड़ी ताकत इसका लोकजीवन से जुड़ाव है। कवि भोजपुरी भाषा के साथ उस जीवन-संसार को भी सामने लाते हैं, जिसमें खेत, किसान, वर्षा, धान, पोखर, पेड़-पौधे, गाँव, परिवार और बचपन की स्मृतियां शामिल हैं। ‘भोजपुरिया जीवन’ में ग्रामीण परिवेश का यह चित्र विशेष रूप से दिखाई देता है।

‘भोजपुरी मर्द! भोजपुरी भाषा’ में गाँव-गंवई मिट्टी के साथ जौ, मकई की रोटी, सतुआ, चटनी और देशी प्याज जैसे खाद्य-सांस्कृतिक संदर्भ आते हैं। दूसरी ओर पिज्जा, बर्गर, मैगी और नूडल्स जैसे आधुनिक खाद्य पदार्थ बदलती जीवनशैली की ओर संकेत करते हैं। इस तरह भोजन भी यहां सांस्कृतिक स्मृति और बदलते समाज के बीच संवाद का माध्यम बन जाता है।

प्रवासी भोजपुरी समाज की स्मृतियां

भोजपुरी समाज के बड़े हिस्से का जीवन पलायन और प्रवास से जुड़ा रहा है। संग्रह में गाँव, परिवार और मातृभाषा की स्मृतियां प्रवासी जीवन के संदर्भ में भी सामने आती हैं। भोजपुरी यहां केवल संवाद की भाषा नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़े रहने का माध्यम बनती है।

भोजपुरी को ‘माई’ मानने की भावभूमि

संग्रह में भोजपुरी को बार-बार मां के रूप में देखने की प्रवृत्ति दिखाई देती है। ‘भोजपुरी के माई-भोजपुरी’ और ‘भोजपुरी के सेवा कइल जाव’ जैसी रचनाएं इसी भावधारा को आगे बढ़ाती हैं।

‘भोजपुरी के सेवा कइल जाव’ में मां द्वारा बच्चे के पालन-पोषण और मातृभाषा के प्रति मनुष्य के दायित्व को समान भावभूमि पर रखा गया है। इससे भाषा का प्रश्न संवैधानिक या राजनीतिक बहस से निकलकर निजी और पारिवारिक संवेदना से जुड़ जाता है।

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हालांकि भोजपुरी को मां के रूपक से जोड़ना साहित्य में नया प्रयोग नहीं है, लेकिन कवि इसके जरिए पाठक की भावनाओं तक सहज पहुंच बनाने में सफल होते हैं।

सामाजिक सरोकार और आत्मालोचन

कवि भाषा की मान्यता के सवाल को किसान, मजदूर, परिवार, पलायन और सामाजिक एकता जैसे मुद्दों से भी जोड़ते हैं। जाति और धर्म के विभाजन तथा सामाजिक दूरी के विरुद्ध स्वर भी संग्रह में दिखाई देता है।

संग्रह की एक महत्वपूर्ण विशेषता इसका आत्मालोचनात्मक पक्ष भी है। कवि केवल सरकार या दूसरी भाषाओं को जिम्मेदार नहीं ठहराते, बल्कि भोजपुरी समाज को भी अपनी भाषा की स्थिति के लिए जिम्मेदार मानते हैं। भाषा की प्रतिष्ठा के लिए समाज को स्वयं आगे आना होगा—यह विचार संग्रह को केवल शिकायत का दस्तावेज बनने से बचाता है।

सहज और लोकाभिमुख भाषा

रामबहादुर राय की भाषा इस संग्रह की प्रमुख उपलब्धियों में है। उन्होंने अत्यधिक संस्कृतनिष्ठ या कठिन भाषा के बजाय बोलचाल की भोजपुरी को अपनाया है।

‘माई-बाबू’, ‘खेत-खरिहान’, ‘धोती-कुरता’, ‘लाठी-गमछा’, ‘सतुआ’, ‘चटनी’, ‘गुरही’, ‘जलेबी’ और ‘गाँव-गँवई माटी’ जैसे शब्द रचनाओं को भोजपुरी जीवन की वास्तविक जमीन से जोड़ते हैं।

भाषा विद्वत्ता दिखाने के बजाय पाठक से सीधे संवाद करती है। इसी कारण संग्रह की कई रचनाएं मंचीय पाठ और सामूहिक गायन के लिए भी अनुकूल प्रतीत होती हैं।

कविता और नारे के बीच

संग्रह की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक उसका आंदोलनधर्मी स्वर है। ‘ए सरकार!’, ‘हे भोजपुरिया!’, ‘उठ’, ‘जाग’ और ‘एक हो जाईं’ जैसे संबोधन कविता को जनसभा और आंदोलन के करीब ले जाते हैं।

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लेकिन यही इसकी साहित्यिक सीमा भी बनती है। कई जगह कविता का प्रत्यक्ष संदेश काव्यात्मक व्यंजना पर भारी पड़ता है। ‘उठ!! जाग!! आगे बढ़’ जैसे आह्वान आंदोलन के लिए प्रभावी हैं, लेकिन कविता की दृष्टि से इनमें बिंब और बहुस्तरीय अर्थ की अपेक्षा सीधा आदेश अधिक दिखाई देता है। इसलिए संग्रह को उद्देश्यपरक जनकाव्य के रूप में देखना अधिक उचित होगा।

गीतात्मकता और लोकलय

संग्रह की अनेक रचनाओं में छोटी पंक्तियां, पुनरावृत्ति, तुक और संबोधन उन्हें गेय बनाते हैं। ‘सावन के बदरिया’ में प्रकृति, वर्षा, धान और ग्रामीण जीवन का संयोजन अपेक्षाकृत अधिक स्वाभाविक काव्य-सौंदर्य पैदा करता है।

हालांकि अधिकांश रचनाएं किसी कठोर पारंपरिक छंद की मात्रा-व्यवस्था में बंधी हुई नहीं हैं। इसलिए इन्हें कठोर छंदबद्ध कविता की बजाय लोकधर्मी, जनगीतात्मक और मुक्त-लय वाली रचनाएं कहना अधिक उपयुक्त होगा।

पुनरावृत्ति : ताकत भी, कमजोरी भी

संग्रह की सबसे उल्लेखनीय शिल्पगत विशेषताओं में पुनरावृत्ति शामिल है। ‘भोजपुरी’, ‘मान्यता’, ‘सरकार’, ‘भोजपुरिया’, ‘आंदोलन’, ‘एक हो’, ‘अधिकार’ जैसे शब्द और भाव बार-बार आते हैं।

आंदोलन और मंच के संदर्भ में यह पुनरावृत्ति सामूहिक ऊर्जा पैदा कर सकती है। लेकिन 58 रचनाओं को लगातार पढ़ते समय यही पुनरावृत्ति कहीं-कहीं एकरसता पैदा करती है। समान भावभूमि वाली कई रचनाओं के कारण उनकी स्वतंत्र पहचान कुछ कम होती दिखाई देती है।

संपादन की गुंजाइश

पुस्तक की एक प्रमुख सुधार-संभावना संपादन से जुड़ी है। समान भावभूमि वाली रचनाओं का अधिक चयनात्मक संयोजन, दोहराव में कमी, वाक्य-विन्यास की पुनः जांच, वर्तनी का एकरूप मानक, विराम-चिह्नों का व्यवस्थित प्रयोग और गीतों की लय-तुक की संपादकीय समीक्षा पुस्तक को और कसावदार बना सकती थी।

हालांकि इसका अर्थ कवि की मूल आवाज को बदलना नहीं है। बेहतर संपादन उसी लोकभाषिक और आंदोलनधर्मी आवाज को अधिक प्रभावी साहित्यिक रूप दे सकता है।

आधुनिकता, अंग्रेजी और भोजपुरी

संग्रह में अंग्रेजी और आधुनिक जीवन से जुड़े शब्द भी बड़ी संख्या में आते हैं। पिज्जा, बर्गर, ऑफिस, हेलो, टाटा-बाय-बाय, यूएस, कम्प्यूटर, सूट, पैंट-शर्ट और टी-शर्ट जैसे शब्द बदलते समाज और आधुनिक जीवनशैली की ओर संकेत करते हैं।

अंग्रेजी शब्दों की मौजूदगी को अपने आप में दोष नहीं माना जा सकता। आधुनिक भारतीय समाज बहुभाषिक है। भोजपुरी की प्रतिष्ठा अंग्रेजी को अस्वीकार करने से अधिक इस बात से मजबूत होगी कि भोजपुरी आधुनिक शिक्षा, तकनीक, डिजिटल माध्यम, प्रशासन, विज्ञान और रोजगार जैसे क्षेत्रों में भी प्रभावी ढंग से इस्तेमाल हो।

इस दृष्टि से कवि की चिंता महत्वपूर्ण है, लेकिन आधुनिकता और भोजपुरी को हमेशा आमने-सामने खड़ा करने के बजाय दोनों के सह-अस्तित्व की संभावनाओं पर भी अधिक विचार किया जा सकता था।

भोजपुरी की सांस्कृतिक गरिमा का सवाल

संग्रह के अंतिम हिस्से में भोजपुरी गीतों में बढ़ती अश्लीलता के विरुद्ध कवि का स्पष्ट स्वर दिखाई देता है। यह पक्ष इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भोजपुरी भाषा और भोजपुरी के नाम पर प्रस्तुत हर सामग्री को एक ही नजर से देखना भाषा की सांस्कृतिक पहचान के साथ न्याय नहीं होगा।

कवि साफ-सुथरे भोजपुरी गीतों और सांस्कृतिक गरिमा की आवश्यकता पर बल देते हैं। इस तरह संग्रह का सरोकार संवैधानिक मान्यता से आगे बढ़कर भोजपुरी के रचनात्मक और सांस्कृतिक उपयोग तक पहुंचता है।

संग्रह की प्रमुख उपलब्धियां

  • भोजपुरी भाषा के प्रति स्पष्ट और ईमानदार प्रतिबद्धता।
  • भोजपुरी की संवैधानिक मान्यता को साहित्यिक विषय बनाना।
  • भोजपुरी समाज में भाषाई आत्मसम्मान जगाने का प्रयास।
  • गाँव और लोकजीवन का जीवंत चित्रण।
  • मातृभाषा को मातृ-संवेदना से जोड़ना।
  • किसान, मजदूर, परिवार, पलायन और सामाजिक एकता जैसे प्रश्नों को स्थान देना।
  • जनगीतात्मक और मंचीय संप्रेषण की क्षमता।
  • भोजपुरी के नाम पर बढ़ती अश्लीलता के विरुद्ध सांस्कृतिक चेतना।
  • भोजपुरी समाज को संगठित और सक्रिय करने का आग्रह।
  • लोकप्रचलित भोजपुरी को काव्यभाषा के रूप में अपनाना।

प्रमुख सीमाएं

  • केंद्रीय कथ्य की अत्यधिक पुनरावृत्ति।
  • समान भावभूमि वाली रचनाओं के कारण एकरसता।
  • कई स्थानों पर कविता का नारे या भाषण में बदल जाना।
  • प्रत्यक्ष कथन की अधिकता और व्यंजना की कमी।
  • शिल्पगत विविधता का अपेक्षाकृत अभाव।
  • छंद और मात्रा का समान अनुशासन न होना।
  • कहीं-कहीं तुक के दबाव में पंक्ति-विन्यास का कमजोर होना।
  • वाक्य-विन्यास और व्याकरण में सर्वत्र समान कसाव का अभाव।
  • विराम-चिह्न और संपादन में अधिक एकरूपता की आवश्यकता।
  • अंग्रेजी और आधुनिकता के प्रश्न को कुछ स्थानों पर अत्यधिक सरल द्वंद्व में देखना।

आंदोलन की आवाज के रूप में महत्वपूर्ण कृति

समग्र रूप से ‘भोजपुरी के मान्यता देईं, ए सरकार!’ शिल्प-चमत्कार की अपेक्षा भाषाई प्रतिबद्धता, लोकचेतना और जनसंवाद को प्राथमिकता देने वाला कथ्यप्रधान, संप्रेषणप्रधान, लोकधर्मी और आंदोलनधर्मी काव्य-संग्रह है।

इसकी सबसे बड़ी शक्ति इसकी स्पष्टता, लोकभाषिक सहजता और जनपक्षधरता है। वहीं इसकी प्रमुख सीमाएं पुनरावृत्ति, प्रत्यक्षता और शिल्पगत एकरूपता हैं। साहित्यिक दृष्टि से संग्रह की श्रेष्ठ रचनाएं वे हैं, जहां भाषा-अधिकार के विचार के साथ लोकजीवन, स्मृति, दृश्य और भावनात्मक अनुभव जुड़ते हैं।

भोजपुरी की संवैधानिक मान्यता के सवाल को कविता के माध्यम से आम पाठक तक पहुंचाने के कारण यह संग्रह भोजपुरी भाषा और उसके सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलन के संदर्भ में महत्वपूर्ण है। इसकी असली पहचान एक ऐसी कविता की है जो पाठक से केवल सहमति नहीं चाहती, बल्कि उसे अपनी भाषा के प्रति जागरूक और सक्रिय होने का आह्वान करती है।

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