भोजपुरी को कटघरे में खड़ा करने वाले अश्लीलता भाषा में है या नजर में?

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प्रभात जी का यह कोई नया कथन नहीं है। अपनी बज्जिका का भाग्य जगाने के चक्कर में वे भोजपुरी को अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानते हैं। उन पर कुपित होना ठीक नहीं। वे हमारी हेतुकी प्रीति के परमाधिकारी हैं! देश के सिरमौर विश्वविद्यालय दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रकांड विद्वान प्राध्यापक हैं। वे जहाँ हैं, वहाँ एजेंडा सेट कर ही बतकही होती है।

उनको जेएनयू वाले सागर नहीं दिखेंगे, चंदन चंचल दिख जाएंगे। उनको किसी दूसरी भाषा में अश्लीलता नहीं दिखती, सिर्फ भोजपुरी में दिखती है। आप तो हिंदी को ‘हारिल की लकड़ी’ बनाए फिरते हैं। आपकी नजर इन पंक्तियों पर तो गई ही होगी-

 [1]
“निरजन उरज हेरत कत बेरि।
बिहुँसए अपन पयोधर हेरि॥
पहिलें बदरि सम पुन नवरंग।
दिन-दिन अनंग अगोरल अंग॥

कुच-जुग अंकुर उतपति भेल।
चरन-चपल-गति लोचन लेल॥
अब सब खन रह आँचर हाथ।
लाजे सखीजन न पुछए बात॥”

— विद्यापति

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[2]
“हिया थार, कुच कंचन लारू।
कनक कचौर उठे जनु चारू॥
कुंदन बेल साजि जनु कूँदे।
अमृत रतन मोन दुइ मूँदे॥

बेधे भौंर कंट केतकी।
चाहहिं बेध कीन्ह कंचुकी॥
जोबन बान लेहिं नहिं बागा।
चाहहिं हुलसि हिये हठ लागा॥

अगिनि-बान दुइ जानौं साधे।
जग बेधहिं जौं होहिं न बाँधे॥
उतँग जँभीर होइ रखवारी।
छुइ को सकै राजा कै बारी॥

दारउँ दाख फरे अनचाखे।
अस नारँग दहुँ का कहँ राखे॥

राजा बहुत मुए तपि लाइ-लाइ भुइँ माथ।
काहू छुवै न पाए, गए मरोरत हाथ॥”

— जायसी

[3]
“नीवी ललित गही जदुराई।
कर सरोज तें श्रीफल परसत, तब जसुमति गईं आई॥”

— सूरदास

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[4]
“केलि करि प्यारी-पिय, पौढ़े चारु-चाँदनी में,
नेह सौं लिपट गए जोबन के जोस में।

अंगिया दरक गई मानों प्रात देखिबे कों,
चोंच काढ़ि चक्रवाक काम-तर रोस में॥

आरस सों मोर बाँह दोऊ कुच गहे पिय,
रति के खिलौना मनों ढाँप दिए ओस में।

रूप के सरोवर में नंददास देखे आली,
चकई के छौना बँधे कंचन के कोस में॥”

— नंददास

[5]
“कनक छार सी कामिनी, काहे कों कटि छीन?”

— आलम

[6]
“कटि को कंचन काटि विधि, कुचन मध्य धरि दीन।”

— शेख

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[7]
“दो दिन में हम कैसे समेटेंगे
सारा वसंत, सारा आषाढ़।
दो दिन तो तुम्हारे दो स्तन ही ले लेंगे।”

— कुशाग्र अद्वैत

हिंदी कविता के अकविता काल में तो ऐसे अनगिनत उदाहरण मिल जाएंगे। आज भी जिस युवा कवि कुशाग्र अद्वैत की कविता की गंध ‘हिन्दवी’ (रेख्ता) वाले रणबाँकुरा मचाए अलावे फिर रहे हैं, उन्हें आपने भी गले से लगाया ही होगा!

क्या ही मजे के निष्कर्ष हैं आपके-वहाँ है तो काव्य-सौंदर्य बनकर और भोजपुरी में है तो अश्लीलता? यहाँ तो पहले से ही खारिज कर रखा है।

आपने जिस कवि का नाम लेकर पंक्तियों को उद्धृत किया है, सच मानिए उनका नाम भी कभी नहीं सुना हमने। दरअसल, आप जैसे लोगों से अपना नाम उच्चरवाने की फिराक में ही वे ऐसी हरकतें करते हैं। लेकिन इससे भोजपुरी का कुछ भी नहीं बिगड़ने वाला।

हर भाषा की तरह भोजपुरी में भी लुगदी साहित्य है, जो समय के साथ स्वयं खारिज हो जाएगा। हाँ, आप जैसे लोगों के लिए अपना हिडन एजेंडा चलाने में ये जरूर उपयोगी हैं।

आप अपनी बज्जिका या हिंदी की तकदीर ही सजाइए-संवारिए। भोजपुरी को लेकर चिंतित मत होइए। अकारण स्वास्थ्य खराब हो जाएगा।

भोजपुरी वाले दूसरे का खेत नहीं चरते। उनके अघाने के लिए अपनी जायदाद ही काफी है। खूब पढ़िए-लिखिए, पचाइए भी। अजीर्णता का शिकार मत बनिए।

मजे से रहिए।

भोजपुरी में एक कहावत है-
“नाँवे नाँव ना तऽ अकरवले नाँव।”

इसे चरितार्थ मत कीजिए।

आपके सार्थक लेखन को हम बहुत प्यार करते हैं। वही कीजिए। भोजपुरी की चिंता में दुबले-पतले होने की जरूरत नहीं है। उसके लिए बहुतेरे काबिज हैं।

आप हिंदी में ही सही ढंग से तरोताजा बने रहिए, वहाँ रोज-रोज वालों के लिए स्कोप ज्यादा हैं।

शुभकामनाओं सहित,
आपका ही, आपके सच्चे रचे का एक,
सुधीर पाठक।

3 COMMENTS

  1. पिन पयोधर जब भयो लग न जाए कहीं दीठ
    चतुरानन याहि लिए श्याम कियो मुख नीठ

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