डॉ. संतोष पटेल
भोजपुरी कथा-साहित्य की परंपरा में नेपाल के तराई (मधेश) क्षेत्र से उभरने वाली कृतियाँ न केवल अपनी भाषाई सोंधापन के लिए जानी जाती हैं, बल्कि वे सीमांत समाज के अनकहे दर्दों को भी अभिव्यक्ति देती हैं। नेपाल के परसा (वीरगंज) से ताल्लुक रखने वाले वरिष्ठ भोजपुरी साहित्यकार गोपाल ‘अश्क’ का उपन्यास ‘फूलवा’ (1998) ऐसा ही एक ऐतिहासिक और सामाजिक दस्तावेज है। यह उपन्यास केवल एक ग्रामीण युवती की त्रासदी नहीं, बल्कि ऐतिहासिक भूलों, सीमांकन की जटिलताओं और काठमांडू की सत्ता द्वारा मधेशी समाज के हाशिएकरण का बेबाक आख्यान है।
ऐतिहासिक और सामाजिक पृष्ठभूमि
‘फूलवा’ के कथानक को समझने के लिए तराई क्षेत्र की भौगोलिक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझना जरूरी है। 1947 का भारत-विभाजन केवल दो देशों के बीच सीमा-निर्धारण नहीं था, बल्कि उसने सामाजिक और सांस्कृतिक संबंधों को भी गहरे प्रभावित किया। नेपाल प्रत्यक्ष रूप से इस राजनीतिक विभाजन का हिस्सा नहीं था, लेकिन उत्तर प्रदेश और बिहार से सटे तराई क्षेत्र में रहने वाले लोगों पर इसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ा। साझा संस्कृति और गंगा-जमुनी तहजीब पर आए संकट ने सीमावर्ती संबंधों को और संवेदनशील बनाया।
इससे पहले ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के गोरखा शासकों के बीच हुई सुगौली संधि (1816) ने तराई क्षेत्र की नियति बदल दी थी। सीमा के पुनर्निर्धारण ने एक ही भाषा, संस्कृति और ‘रोटी-बेटी’ के संबंधों से जुड़े समाज को दो अलग-अलग राष्ट्रों की सीमाओं में बाँट दिया। इसी ऐतिहासिक सीमा का प्रभाव है कि तराई का मधेशी समुदाय आज भी पहचान और नागरिकता जैसे सवालों से जूझता दिखाई देता है।
नागरिकता संकट : उपन्यास का केंद्रीय प्रश्न
नेपाल के तराई क्षेत्र की प्रमुख मानवीय और राजनीतिक समस्याओं में नागरिकता का संकट रहा है। उपन्यास में केंद्रीय सत्ता द्वारा मधेशियों को ‘भारतीय’ या ‘गैर-नेपाली’ दृष्टि से देखे जाने की मानसिकता और उसके दुष्परिणाम सामने आते हैं।
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भारत और नेपाल के बीच सदियों से वैवाहिक संबंध रहे हैं। भारतीय स्त्रियों के नेपाल में विवाह और वहाँ जन्मे बच्चों के लिए नागरिकता प्रमाण-पत्र हासिल करना कई बार कठिन प्रशासनिक प्रक्रिया बन जाता है। नागरिकता के अभाव में संपत्ति खरीदने, सरकारी नौकरी पाने, उच्च शिक्षा और मतदान जैसे अधिकारों तक पहुँच प्रभावित होती है।
इस प्रकार तराई के अनेक लोग अपने ही देश में ‘अदृश्य नागरिक’ बन जाते हैं। ऐसी स्थिति का लाभ भ्रष्ट नौकरशाही और अवसरवादी राजनीति उठाती है। ‘फूलवा’ इसी व्यवस्था के भीतर आम नागरिक की विवशता को मानवीय रूप में सामने लाता है।
कथानक और चरित्र-सृष्टि
‘फूलवा’ का ताना-बाना तराई के ग्रामीण जीवन, गरीबी, उपेक्षा और नागरिकता की जटिलता के इर्द-गिर्द बुना गया है।
फूलवा उपन्यास की केंद्रीय पात्र है—चंचल, स्वाभिमानी और निर्दोष देहाती लड़की। अपने खंसी (बकरे) और बाल-सखा ‘फुलेना’ से उसका गहरा लगाव है। किशोरावस्था से वयस्कता की ओर बढ़ते ही नागरिकता का संकट उसके जीवन का निर्णायक प्रश्न बन जाता है।
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भोला और कलावती ग्रामीण परिवार की विपरीत स्थितियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। भोला गैर-जिम्मेदार और नशाखोर वर्ग का प्रतीक है, जबकि कलावती कठिन मजदूरी के सहारे परिवार को संभालने की कोशिश करती है।
फुलेना फूलवा का निष्कलंक, सच्चा और संवेदनशील प्रेमी तथा मित्र है।
प्रेमचंद सामंती वासना और सामाजिक वर्चस्व का प्रतीक है, जबकि ‘अवसर’ भ्रष्ट और अवसरवादी राजनीतिक जमात का प्रतिनिधि बनकर सामने आता है, जो जनता के हितों की जगह उसके वोटों का सौदा करती है।
समाज और सत्ता के इस अंतर्संबंध में एक ओर राजनीतिक नेता और सामंती शोषक हैं, तो दूसरी ओर भोला-कलावती की गरीबी और फूलवा की नागरिकता-विहीनता। यही असमानता अंततः एक त्रासदीपूर्ण चक्रव्यूह को जन्म देती है—नागरिकता के लिए शहर जाना, यौन उत्पीड़न और सामाजिक शोषण झेलना, उसके विरुद्ध प्रतिरोध करना और अंततः जेल तक पहुँच जाना।
स्त्री-विमर्श और प्रतिरोध
उपन्यास का निर्णायक मोड़ तब आता है, जब फूलवा के भविष्य, शिक्षा और विवाह के लिए नागरिकता प्रमाण-पत्र अनिवार्य हो जाता है। नागरिकता की अंतहीन कागजी प्रक्रिया उसे गाँव से शहर के सरकारी दफ्तरों तक ले जाती है। शहर का भ्रष्ट और वासनांध वातावरण उसकी मासूमियत का शोषण करता है।
नागरिकता की आड़ में उसका यौन उत्पीड़न होता है। लेकिन अश्क की फूलवा मूक पीड़िता नहीं बनती। वह अन्याय का प्रतिरोध करती है। विडंबना यह है कि इसी प्रतिरोध के बाद व्यवस्था उसे ही दोषी ठहराकर जेल भेज देती है।
यहीं उपन्यास का लैंगिक विमर्श सबसे तीखा हो जाता है। फूलवा केवल शोषित स्त्री नहीं, बल्कि प्रतिरोध करने वाली चेतना है। उसके माध्यम से लेखक यह प्रश्न उठाते हैं कि जब कानून और सत्ता स्वयं कमजोर व्यक्ति के विरुद्ध खड़ी हो जाएँ, तब न्याय की वास्तविकता क्या रह जाती है?
गोपाल ‘अश्क’ का रचनात्मक मंतव्य
उपन्यास की भूमिका ‘फूलवा का वारे में’ में गोपाल ‘अश्क’ अपने लेखकीय दृष्टिकोण को स्पष्ट करते हैं। वे स्वीकार करते हैं कि फूलवा, भोला और फुलेना जैसे पात्र काल्पनिक हैं, लेकिन तराई समाज की जिन समस्याओं से वे गुजरते हैं, उनका यथार्थ वास्तविक है।
अश्क ने फूलवा को असहाय और बेबस ‘अबला’ के रूप में नहीं गढ़ा। अपनी ‘कल्पना की बेटी’ को उन्होंने जुझारू और प्रतिकार करने वाली वीरांगना बनाया है।
लेखक ‘खून का बदला खून’ जैसी अमानवीय प्रवृत्ति का समर्थन नहीं करते और फूलवा को कानून के सामने ले जाते हैं। लेकिन इसी प्रक्रिया में वे यह भी उजागर करते हैं कि गरीबों और मधेशियों के लिए कानून और अदालतें कई बार न्याय की जगह जेल का रास्ता खोल देती हैं।
‘अवसर’ जैसे राजनीतिक पात्रों के माध्यम से लेखक यह भी दिखाते हैं कि मधेशी अधिकारों की राजनीति करने वाले कुछ नेता स्वयं मधेशियों के शोषण में भागीदार बन जाते हैं।
भाषा, शैली और शिल्प
भोजपुरी भाषा की सहजता, प्रामाणिकता और लोक-मुहावरों का जीवंत प्रयोग ‘फूलवा’ की प्रमुख विशेषता है। तराई क्षेत्र के ठेठ भोजपुरी शब्द पाठक को सीधे कथा के परिवेश से जोड़ते हैं।
उपन्यास की शैली यथार्थवादी है, जिसमें नाटकीयता और संवेदनात्मकता का संतुलित मेल दिखाई देता है। संवाद छोटे, प्रभावशाली और पात्रों के सामाजिक स्तर के अनुरूप हैं। ग्रामीण जीवन के दृश्यों का वर्णन इतना सजीव है कि पाठक तराई के खेतों, गलियों और प्रशासनिक दफ्तरों के वातावरण को महसूस कर सकता है।
मूल्यांकन
गोपाल ‘अश्क’ का ‘फूलवा’ केवल भोजपुरी साहित्य की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि नहीं, बल्कि दक्षिण एशियाई सीमांत समाज, नागरिकता और सामाजिक असमानता को समझने का महत्त्वपूर्ण साहित्यिक दस्तावेज भी है। सुगौली संधि (1816) की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से लेकर मधेशी समाज की पहचान और नागरिकता की लड़ाई तक, उपन्यास अनेक स्तरों पर सवाल उठाता है।
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‘फूलवा’ हमें सोचने के लिए विवश करती है कि जब सीमांत क्षेत्रों के लोगों की अस्मिता और अधिकार कागज के एक टुकड़े—नागरिकता—से तय होने लगें और सत्ता उस अधिकार का सौदा करने लगे, तो लोकतंत्र का दावा कितना सार्थक रह जाता है।
साहित्यिक दृष्टि से ‘फूलवा’ भोजपुरी कथा-साहित्य की परिपक्वता, सामाजिक सरोकार और प्रतिरोधी चेतना का सशक्त प्रमाण है। इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि फूलवा की व्यक्तिगत त्रासदी के माध्यम से गोपाल ‘अश्क’ पूरे मधेशी समाज की सामूहिक पीड़ा, स्त्री की अस्मिता और नागरिकता के संकट को एक साथ सामने लाते हैं।
पुस्तक परिचय
पुस्तक का नाम: फूलवा
विधा: उपन्यास (भोजपुरी)
लेखक: गोपाल ‘अश्क’
प्रकाशन वर्ष: वि. सं. 2055 (ई. 1998)
परिवेश: वीरगंज, नेपाल (तराई/मधेश क्षेत्र)

