लेखक: संगीत सुभाष
लइकी अनमुनाहे मोबाइल टावर पर चढ़ि गइलि। किरिन उगला पर लोग देखल। बात एक मुँह से हजारन मुँह होखे लागल- ‘फलनवाँ के बेटी टावर पर चढ़ल बिया।’
गाँव के केहू अगल-बगल से लोग ई तमाशा देखे खातिर जुटे लागल। तरह-तरह के बात होखे लागल। केहू कहे- “पगला गइल बिया।” त केहू कहे- “ईहो कवनो से बियाह करे खातिर नाटक धरले बिया।”
एक्के बेर सैकड़न लोग पूछे लागल- “काहें टावर पर चढ़ल बाड़े?” केहू मनावे लागल- “उतरि आ बबुनी, जवन चाहत बाड़े तवने होई।”
बाकिर लइकी चुप रहे। कुछ बोलबे ना करे।
लइकी के बाप जब ई बात सुनलें त दउरल अइलें। अपनी लइकी के टावर पर चढ़ल देख के ऊ भाँप लिहलें कि ईहो नया जुग के चपेटा में आ गइलि बिया। “ई सब सोशल मीडिया के असर हऽ,” ऊ मन में सोचलें।
तब्बो लइकी से पूछलें-
“काहें टावर पर चढ़ल बाड़े? उतरु नीचे। तें त हमार बनल-बनावल इज्जत माटी में मिला दिहले बाड़ू।”
लइकी अब बोललि-
“हमार बियाह टेघरा से करावे के कहऽ त नीचे आइबि, ना त ना आइबि। हम उनसे बहुत प्यार करिले।”
लइकी के बाप पूछलें-
“त तें टेघरा से बियाह करबे आ हम करा देब?”
लइकी बोली-
“हँ।”
ई सुनते लइकी के बाप रिस से काँपे लगलें। तमाशा देखत लोग से कहलें-
“भाई लोग, अपना-अपना घरे जा लोग। मन करे त ढेला-पत्थर चला के एकर कपार फोर दऽ लोग। हम ना एकर बियाह टेघरा से कराएबि, ना ई उतरी टावर पर से। एकरा मुअला-जियला के जिम्मेदारी हम लेत बानीं। ई मरि जाई त हम सजाइयो काटि लेब। ओइसन पियक्कड़, लफंगा आ कामचोर से हम एकर बियाह कराएबि? ससुरा एकरा के भरमा लिहले बा।”
फेर ऊ लइकी के ओर देख के कहलें-
“आ देखु, लइकी, तोरा मुए के मन बा त सवख से मरु। मन करे त उहाँ से कुदिए जो। हमरा कवनो हरख-बिखाद नइखे। बाकिर तोहरा दबाव में हम कबो ना आईब।”
एतना कहि के लइकी के बाप अपना घरे चल गइलें।
एकट्ठा भइल लोग कुछ देर तक ठाढ़ रहल। धीरे-धीरे सभे लवटि गइल।
गदबेर से राति होखे लागल। टावर के नीचे केहू ना रहे।
लइकी के बुझा गइल कि अब केहू मनावे ना आई। धीरे-धीरे ऊ टावर पर से उतरलि आ घरे चलि गइलि।
घरे पहुँचते ऊ अपना बाप के गोड़ पर गिरि के रोवे लागलि-
“हमके माफ क दऽ बाबूजी, बड़ी भारी गलती हो गइल बा।”

