समीक्षा : राजेश भोजपुरिया, जमशेदपुर
भोजपुरी साहित्य की समृद्ध परंपरा में कथा विधा हमेशा से समाज के जीवन, संघर्ष, संस्कार और संवेदनाओं का सजीव दस्तावेज रही है। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए चर्चित महिला कवयित्री और साहित्यकार डॉ. संध्या सिन्हा का नया भोजपुरी कहानी संग्रह “जिनगी के धाह, जीये के चाह” भोजपुरी कथा साहित्य में एक महत्वपूर्ण कृति के रूप में सामने आया है। भोजपुरी प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित यह संग्रह नारी जीवन के संघर्ष, सामाजिक विसंगतियों और मानवीय संवेदनाओं को बेहद प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करता है।
डॉ. संध्या सिन्हा भोजपुरी साहित्य जगत की एक प्रतिष्ठित रचनाकार हैं। उनकी रचनाओं में नारी विमर्श, सामाजिक सरोकार और आम जनजीवन की वास्तविक तस्वीर प्रमुखता से दिखाई देती है। प्रस्तुत कहानी संग्रह में लेखिका ने समाज के उन पक्षों को स्वर दिया है, जो अक्सर मुख्यधारा की चर्चा से दूर रह जाते हैं।
मातृभाषा भोजपुरी के प्रति समर्पित रचना
‘जिनगी के धाह, जीये के चाह’ केवल कहानियों का संग्रह नहीं है, बल्कि भोजपुरी भाषा और संस्कृति के प्रति लेखिका के प्रेम और समर्पण का प्रमाण भी है। डॉ. संध्या सिन्हा के अनुसार, यह कहानी संग्रह लगभग आठ वर्ष पहले ही प्रकाशित हो सकता था, क्योंकि इसमें शामिल अधिकांश कहानियां पहले ही लिखी जा चुकी थीं और देश की विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित भी हुई थीं।
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बाद में इन कहानियों को संग्रह के रूप में पाठकों तक पहुंचाया गया। लेखिका ने इस पुस्तक को अपनी ‘माई भाषा’ यानी मातृभाषा भोजपुरी को समर्पित किया है। यह समर्पण भोजपुरी भाषा के प्रति उनके गहरे लगाव और साहित्यिक प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
विद्वत भूमिका से बढ़ा साहित्यिक महत्व
इस कहानी संग्रह की भूमिका भोजपुरी के प्रसिद्ध विद्वान और साहित्यकार डॉ. ब्रजभूषण मिश्र ने लिखी है। डॉ. मिश्र भोजपुरी भाषा-साहित्य के क्षेत्र में अपने महत्वपूर्ण योगदान के लिए जाने जाते हैं। उनकी भूमिका ने इस पुस्तक के साहित्यिक महत्व को और अधिक बढ़ा दिया है।
दस कहानियों में समाज और जीवन का यथार्थ
इस संग्रह में कुल दस कहानियां शामिल हैं, जो समाज, परिवार और विशेष रूप से नारी जीवन के संघर्षों एवं संवेदनाओं को केंद्र में रखती हैं। संग्रह की प्रमुख कहानियां हैं- जिजीविषा, आग, दिदीया, गुलाबो, ठाढ़ रह गइनी, मान बढ़वल, हमार लड़ाई, काहे जनमल?, चाची और आपन स्वायल सांग हमारे।
इन सभी कहानियों में जीवन की वास्तविक परिस्थितियां, सामाजिक चुनौतियां और मानवीय भावनाएं गहराई से दिखाई देती हैं। कहानी के पात्र समाज के बीच से उठाए गए प्रतीत होते हैं, जिससे पाठक उनसे आसानी से जुड़ जाता है।
नारी विमर्श का सशक्त स्वर
इस संग्रह का मुख्य विषय नारी विमर्श है। डॉ. संध्या सिन्हा ने महिलाओं के जीवन संघर्ष, उनकी अस्मिता, आत्मसम्मान और सामाजिक चुनौतियों को संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया है।
संग्रह का शीर्षक ‘जिनगी के धाह, जीये के चाह’ जीवन के संघर्ष और उम्मीद का प्रतीक है। एक ओर जीवन की कठिनाइयों की तपिश है, तो दूसरी ओर हर परिस्थिति में आगे बढ़ने की इच्छा और जिजीविषा है। यही भाव संग्रह की अधिकांश कहानियों में दिखाई देता है।
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किन्नर समाज का संवेदनशील चित्रण
इस पुस्तक की एक विशेष उपलब्धि यह है कि इसमें समाज के उपेक्षित वर्ग किन्नर समुदाय (थर्ड जेंडर) के जीवन को भी संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया गया है। ‘ठाढ़ रह गइनी’ और ‘काहे जनमल?’ जैसी कहानियां किन्नर समाज की पीड़ा, संघर्ष, पहचान और सामाजिक स्वीकार्यता के सवालों को उठाती हैं। भोजपुरी कथा साहित्य में इस विषय पर संवेदनशील लेखन के दृष्टिकोण से यह संग्रह महत्वपूर्ण माना जा सकता है।
सहज भाषा और प्रभावशाली शैली
डॉ. संध्या सिन्हा की भाषा शैली इस संग्रह की बड़ी विशेषता है। सहज भोजपुरी, लोक जीवन से जुड़े शब्द और स्वाभाविक संवाद कहानियों को जीवंत बना देते हैं। पाठक को ऐसा अनुभव होता है कि वह केवल कहानी नहीं पढ़ रहा, बल्कि समाज के वास्तविक जीवन को करीब से देख रहा है। लेखिका की भाषा में भोजपुरी मिट्टी की खुशबू और लोक संस्कृति की आत्मीयता स्पष्ट दिखाई देती है।
अंत में कहना चाहूंगा कि “जिनगी के धाह, जीये के चाह” केवल एक कहानी संग्रह नहीं, बल्कि समाज का आईना है। इसमें नारी जीवन की पीड़ा, संघर्ष, आत्मसम्मान और उम्मीद के साथ-साथ समाज के कई अनदेखे पहलुओं को भी आवाज मिली है।
डॉ. संध्या सिन्हा ने इस कृति के माध्यम से साबित किया है कि भोजपुरी भाषा केवल लोक अभिव्यक्ति की भाषा नहीं, बल्कि आधुनिक सामाजिक विमर्श, गंभीर चिंतन और मानवीय संवेदनाओं को प्रभावी ढंग से व्यक्त करने में भी सक्षम है।
निश्चित रूप से “जिनगी के धाह, जीये के चाह” भोजपुरी कथा साहित्य की एक महत्वपूर्ण और संग्रहणीय कृति है, जो पाठकों के मन पर गहरी छाप छोड़ेगी।


बहुत आभार बन्धुवर। साहित्य पढ़ना अच्छी परम्परा है … उससे भी अच्छी परम्परा है साहित्य पर लिखना और अभिप्रेरित करना…!!