लोकगीतों को राष्ट्रीय पहचान दिलाने वाली बिहार कोकिला विंध्यवासिनी देवी

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पल्लवी कश्यप की रिपोर्ट

Bhojpuri24.com की ‘भोजपुरी पुरोधा’ श्रृंखला में आज पढ़िए उस महान लोकगायिका, लोकसंस्कृति की साधिका और बिहार की सांस्कृतिक अस्मिता की प्रतीक की कहानी, जिनकी आवाज़ ने भोजपुरी, मैथिली और मगही लोकगीतों को देश-दुनिया में नई पहचान दिलाई। विंध्यवासिनी देवी केवल एक गायिका नहीं थीं, बल्कि बिहार की लोक परंपराओं की जीवित धरोहर थीं। उन्होंने उस दौर में लोकसंगीत को सम्मान दिलाया, जब इसे केवल गांव-घर की परंपरा माना जाता था। आज भी उनके गीत बिहार और पूर्वांचल की सांस्कृतिक स्मृतियों में उसी आत्मीयता के साथ गूंजते हैं।

यदि भोजपुरी लोकनाट्य के शिखर पुरुष भिखारी ठाकुर हैं और पूरबी गायकी के सम्राट महेंद्र मिसिर, तो विंध्यवासिनी देवी को निस्संदेह बिहार के लोकसंगीत की कोकिला और लोकसंस्कृति की सबसे सशक्त महिला प्रतिनिधि कहा जा सकता है। उन्होंने लोकगीतों को केवल संरक्षित ही नहीं किया, बल्कि उन्हें राष्ट्रीय पहचान दिलाने का ऐतिहासिक कार्य किया।

बचपन से ही लोकधुनों से था गहरा लगाव

विंध्यवासिनी देवी का जन्म 5 जनवरी, 1920 को बिहार के मुजफ्फरपुर में हुआ था। उस समय महिलाओं का सार्वजनिक रूप से संगीत प्रस्तुत करना सामाजिक रूप से सहज स्वीकार्य नहीं माना जाता था। लेकिन संगीत उनके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा था। बचपन से ही उन्हें लोकगीतों और पारंपरिक धुनों से विशेष लगाव था। यही लगाव आगे चलकर उन्हें भारतीय लोकसंगीत की सबसे सम्मानित हस्तियों में शामिल करने वाला बना।

उन्होंने यह सिद्ध किया कि लोकगीत किसी समाज की आत्मा होते हैं और उन्हें संरक्षित करना किसी सांस्कृतिक आंदोलन से कम नहीं है।

लोकगीतों को दिलाई नई पहचान

आज जिस भोजपुरी लोकसंगीत को देश-विदेश में सम्मान प्राप्त है, उसमें विंध्यवासिनी देवी का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। उन्होंने उस समय लोकगीतों को मंच तक पहुंचाया, जब इन्हें केवल ग्रामीण आयोजनों तक सीमित समझा जाता था।

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उन्होंने बिहार की अनेक लोकविधाओं को लोकप्रिय बनाया, जिनमें प्रमुख हैं—

  • सोहर
  • बियाह गीत
  • कजरी
  • चैता
  • झूमर
  • देवी गीत
  • संस्कार गीत
  • लोक भक्ति गीत

उनकी गायकी में बिहार के लोकजीवन की सहजता, ग्रामीण संस्कृति की मिठास और सामाजिक भावनाओं की गहरी अभिव्यक्ति दिखाई देती है।

विवाह गीतों की अमर आवाज़

विंध्यवासिनी देवी के विवाह गीत आज भी बिहार और भोजपुरी अंचल के गांवों में गाए जाते हैं। बेटी की विदाई का दर्द, मां की ममता और परिवार की संवेदनाओं को उन्होंने अपनी आवाज़ में ऐसा स्वर दिया, जो पीढ़ियों तक जीवित रहेगा।

उनका लोकप्रिय विवाह गीत “छोटे दुल्हा के…” आज भी लोकसंगीत प्रेमियों के बीच विशेष स्थान रखता है। उनके गीत केवल संगीत नहीं, बल्कि लोकजीवन के सांस्कृतिक दस्तावेज हैं।

भोजपुरी, मैथिली और मगही की सांस्कृतिक दूत

विंध्यवासिनी देवी की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने बिहार की प्रमुख लोकभाषाओं—भोजपुरी, मैथिली और मगही—में समान अधिकार के साथ गायन किया। उनके गीतों में प्रेम, भक्ति, सामाजिक रिश्ते, ग्रामीण जीवन और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों की सुंदर अभिव्यक्ति मिलती है।

उनकी आवाज़ में लोकसंगीत की स्वाभाविक मिठास थी। यही कारण है कि आम लोगों से लेकर संगीत के बड़े विद्वानों तक सभी ने उनके योगदान को सम्मान दिया।

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लोक कला संरक्षण के लिए स्थापित किया विंध्य कला मंदिर

विंध्यवासिनी देवी केवल लोकगायिका ही नहीं थीं, बल्कि लोककलाओं की संरक्षक भी थीं। उन्होंने यह महसूस किया कि बदलते समय के साथ बिहार की अनेक लोकधुनें और लोकगीत लुप्त होते जा रहे हैं। इन्हें बचाने के उद्देश्य से उन्होंने अपने पति एवं प्रथम संगीत गुरु सहदेवेश्वर चंद्र प्रसाद वर्मा के सहयोग से वर्ष 1949 में पटना में ‘विंध्य कला मंदिर’ की स्थापना की।

यह संस्था आज भी बिहार की लोकसांस्कृतिक चेतना का एक महत्वपूर्ण केंद्र मानी जाती है। इसके माध्यम से उन्होंने—

  • लोक संगीत के कलाकारों को प्रशिक्षण दिया।
  • युवा पीढ़ी को लोकसंस्कृति से जोड़ा।
  • महिलाओं को संगीत शिक्षा के अवसर प्रदान किए।
  • लोकनृत्य, लोकनाट्य और लोकगीतों को मंच उपलब्ध कराया।
  • बिहार की सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करने का अभियान चलाया।

लोकसंगीत को दिलाया राष्ट्रीय सम्मान

विंध्यवासिनी देवी उन चुनिंदा कलाकारों में थीं, जिन्होंने लोकसंगीत को राष्ट्रीय सांस्कृतिक विमर्श का हिस्सा बनाया। उन्होंने यह स्थापित किया कि लोकगीत केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं हैं, बल्कि वे किसी समाज की ऐतिहासिक स्मृति और सांस्कृतिक पहचान के वाहक हैं।

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उनकी प्रस्तुतियों ने यह साबित किया कि लोकभाषाओं में भी उतनी ही साहित्यिक और सांगीतिक समृद्धि है, जितनी किसी अन्य प्रतिष्ठित भाषा और संगीत परंपरा में।

भोजपुरी समाज के लिए उनका योगदान

विंध्यवासिनी देवी का योगदान बहुआयामी रहा। उन्होंने—

  • भोजपुरी, मैथिली और मगही लोकगीतों को संरक्षित किया।
  • लोक संगीत को गांव से राष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया।
  • नई पीढ़ी के कलाकारों को प्रशिक्षित किया।
  • महिलाओं की सांस्कृतिक भागीदारी को बढ़ावा दिया।
  • लोक परंपराओं के संरक्षण के लिए संस्थागत प्रयास किए।
  • बिहार की सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित किया।
  • लोकसंगीत को सम्मानजनक सांस्कृतिक स्थान दिलाया।
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मिले कई प्रतिष्ठित सम्मान

भारतीय लोक संगीत के क्षेत्र में उनके अमूल्य योगदान के लिए उन्हें अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित किया गया।

  • पद्मश्री (1974)
  • संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1991)
  • अहिल्याबाई सम्मान (1998)
  • संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप

ये सम्मान केवल उनकी व्यक्तिगत उपलब्धियां नहीं, बल्कि बिहार की लोकसंस्कृति को मिला राष्ट्रीय सम्मान थे।

बिहार की सांस्कृतिक चेतना का अमर स्वर

18 अप्रैल, 2006 को विंध्यवासिनी देवी का निधन हो गया, लेकिन उनकी आवाज़ आज भी बिहार की सांस्कृतिक स्मृतियों में जीवित है। उन्होंने यह साबित किया कि लोकगीत केवल धुनें नहीं होते, बल्कि वे समाज की सामूहिक चेतना, इतिहास और भावनाओं के संवाहक होते हैं।

आज जब भोजपुरी संगीत बाज़ारवाद और तात्कालिक लोकप्रियता की चुनौतियों से जूझ रहा है, तब विंध्यवासिनी देवी का जीवन और उनका संगीत हमें यह सिखाता है कि लोकसंगीत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी सांस्कृतिक गरिमा और संवेदनशीलता में निहित होती है।

भोजपुरी समाज के लिए विंध्यवासिनी देवी की विरासत

विंध्यवासिनी देवी केवल एक लोकगायिका नहीं, बल्कि बिहार की सांस्कृतिक आत्मा की प्रतिनिधि थीं। वे लोक और शास्त्र के बीच सेतु थीं। वे परंपरा और आधुनिकता के बीच संवाद थीं। उन्होंने अपने जीवन के माध्यम से यह संदेश दिया कि यदि किसी समाज को उसकी जड़ों से जोड़े रखना है, तो उसकी लोकभाषा, लोककला और लोकगीतों को जीवित रखना होगा।

आज भी जब किसी गांव में सोहर गूंजता है, जब विवाह में पारंपरिक गीत गाए जाते हैं, जब कोई शोधार्थी बिहार के लोकसंगीत पर काम करता है या जब कोई युवा अपनी सांस्कृतिक पहचान की तलाश करता है, तब कहीं न कहीं विंध्यवासिनी देवी की परंपरा जीवित दिखाई देती है।

इसीलिए विंध्यवासिनी देवी केवल इतिहास की एक महान लोकगायिका नहीं, बल्कि भोजपुरी समाज की सांस्कृतिक चेतना, लोकस्मृति और लोकगौरव की अमर प्रतीक हैं। उनकी आवाज़ आने वाली पीढ़ियों के लिए यह संदेश है कि अपनी भाषा और संस्कृति से जुड़ाव ही किसी समाज की सबसे बड़ी शक्ति होती है।

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