भोजपुरी की लड़ाई को सिर्फ सांस्कृतिक आंदोलन नहीं, अब राजनीतिक एजेंडा बनने की जरूरत

Date:

भोजपुरी भाषा को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग आज नई नहीं है। यह मांग छह दशक से अधिक समय से संसद, सड़कों, साहित्यिक मंचों और सामाजिक आंदोलनों में लगातार उठती रही है। लेकिन सवाल यह है कि इतनी बड़ी जनसंख्या, समृद्ध साहित्य, वैश्विक पहचान और विशाल सांस्कृतिक विरासत होने के बावजूद भोजपुरी आज भी संवैधानिक मान्यता से दूर क्यों है?

इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि भोजपुरी का आंदोलन अब तक सांस्कृतिक रहा है, राजनीतिक नहीं। जब तक यह मुद्दा चुनावी राजनीति का हिस्सा नहीं बनेगा, तब तक इसके लक्ष्य तय होना कठिन रहेगा।

ये भी पढ़ें-भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग तेज, 2 अगस्त को जंतर-मंतर पर होगा 28वां शांतिपूर्ण धरना

केवल भावनाओं से नहीं, राजनीतिक इच्छाशक्ति से मिलती है मान्यता

भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में अभी 22 भाषाएं शामिल हैं। इनमें समय-समय पर सिंधी (1967), कोंकणी, नेपाली, मणिपुरी (1992) तथा बोडो, डोगरी, मैथिली और संथाली (2003) जैसी भाषाओं को राजनीतिक सहमति और संसदीय प्रक्रिया के माध्यम से जोड़ा गया।

यानी इतिहास बताता है कि भाषा की संवैधानिक मान्यता केवल भाषाई समृद्धि से नहीं, बल्कि राजनीतिक निर्णय से मिलती है।

30 करोड़ से अधिक लोगों की भाषा, फिर भी प्रतीक्षा

भोजपुरी भारत, नेपाल, मॉरीशस, सूरीनाम, फिजी, त्रिनिदाद एवं टोबैगो, गुयाना और दुनिया के अनेक देशों में बोली जाती है। विभिन्न भाषाई अध्ययनों और प्रवासी समुदायों के आधार पर भोजपुरी बोलने वालों की संख्या लगभग 30 करोड़ तक मानी जाती है। भारत की 2011 की जनगणना में मातृभाषाओं के वर्गीकरण के कारण भोजपुरी भाषियों की वास्तविक संख्या अलग-अलग श्रेणियों में दर्ज हुई, जिससे इसकी जनसंख्या का पूरा चित्र सामने नहीं आ पाया। यही कारण है कि जनगणना में मातृभाषा के सही पंजीकरण का मुद्दा भी लगातार उठता रहा है।

संसद में मांग उठी, लेकिन फैसला नहीं

भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग वर्ष 2000 से पहले भी संसद में उठ चुकी है। इसके बाद अलग-अलग सांसदों ने कई बार यह मुद्दा लोकसभा और राज्यसभा में रखा। सरकार ने भी कई बार स्वीकार किया कि भोजपुरी सहित 38 भाषाओं की मांग विचाराधीन है, लेकिन अब तक कोई अंतिम निर्णय नहीं हुआ।

सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि केंद्र सरकार स्वयं कह चुकी है कि आठवीं अनुसूची में भाषा शामिल करने के लिए कोई निश्चित संवैधानिक मापदंड तय नहीं है। इसलिए अंतिम निर्णय पूरी तरह राजनीतिक और नीतिगत सहमति पर निर्भर करता है।

सबसे बड़ी कमजोरी राजनीतिक दबाव का अभाव

भोजपुरी क्षेत्र से हर चुनाव में बड़ी संख्या में सांसद और विधायक चुनकर संसद तथा विधानसभाओं में पहुंचते हैं। कई बड़े राष्ट्रीय नेता स्वयं भोजपुरी भाषी क्षेत्र से आते हैं।

लेकिन दुर्भाग्य यह है कि किसी बड़े राजनीतिक दल ने भोजपुरी को अपने चुनावी घोषणा-पत्र का स्थायी मुद्दा नहीं बनाया। भोजपुरी मतदाताओं ने भी इस विषय को मतदान का प्रमुख आधार नहीं बनाया। चुनाव जीतने के बाद अधिकांश जनप्रतिनिधियों ने इस मुद्दे पर निरंतर दबाव नहीं बनाया। यही कारण है कि भोजपुरी की मांग अक्सर चुनावी भाषणों तक सीमित रह जाती है।

मैथिली से क्या सीखना चाहिए?

मैथिली को वर्ष 2003 में आठवीं अनुसूची में स्थान मिला। इसके पीछे केवल साहित्यिक परंपरा नहीं थी, बल्कि दशकों तक चलने वाला संगठित सामाजिक, राजनीतिक और बौद्धिक आंदोलन भी था। क्षेत्रीय नेतृत्व, शिक्षाविदों, सांसदों और सामाजिक संगठनों ने मिलकर इसे राष्ट्रीय विमर्श बनाया। भोजपुरी आंदोलन को भी अब इसी प्रकार की रणनीतिक एकजुटता की आवश्यकता है।

राजनीतिक एजेंडा कैसे बने?

यदि वास्तव में भोजपुरी को संवैधानिक मान्यता दिलानी है तो आंदोलन को नई दिशा देनी होगी-

हर लोकसभा और विधानसभा क्षेत्र में उम्मीदवारों से सार्वजनिक घोषणा कराई जाए।
चुनावी घोषणापत्र में भोजपुरी को शामिल करने की मांग हो।
सभी दलों के भोजपुरी भाषी सांसदों का साझा संसदीय मंच बने।
विश्वविद्यालयों, शिक्षकों, साहित्यकारों, कलाकारों और उद्योग जगत को एक साझा अभियान में जोड़ा जाए।
जनगणना में प्रत्येक भोजपुरी भाषी अपनी मातृभाषा स्पष्ट रूप से भोजपुरी दर्ज कराए।
डिजिटल मीडिया, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), शिक्षा और प्रशासन में भोजपुरी के उपयोग को बढ़ाया जाए।

ये भी पढ़ें-भोजपुरी की अस्मिता पर सवाल उठाने वालों, पहले उसका इतिहास पढ़िए

केवल आठवीं अनुसूची नहीं, भाषा का आधुनिक विकास भी जरूरी

आज दुनिया भाषा को केवल साहित्य से नहीं, बल्कि तकनीक से भी पहचानती है। हाल के वर्षों में भोजपुरी के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्पीच रिकग्निशन और मशीन ट्रांसलेशन पर शोध तेज हुए हैं। भारतीय और अंतरराष्ट्रीय शोध संस्थान भोजपुरी जैसी लो-रिसोर्स भाषाओं के लिए डिजिटल संसाधन विकसित कर रहे हैं। इसलिए भोजपुरी आंदोलन का अगला चरण केवल संवैधानिक मान्यता नहीं बल्कि डिजिटल सशक्तिकरण भी होना चाहिए।

अंतिम बात, भोजपुरी का संघर्ष अब केवल भाषा का संघर्ष नहीं रहा। यह पहचान, शिक्षा, संस्कृति, रोजगार, तकनीक और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का प्रश्न बन चुका है। इतिहास गवाह है कि भारत में किसी भी भाषा को संवैधानिक सम्मान तभी मिला, जब उसके पीछे मजबूत राजनीतिक इच्छा शक्ति और व्यापक जनदबाव खड़ा हुआ। भोजपुरी के पास साहित्य है, संस्कृति है, करोड़ों बोलने वाले लोग हैं और वैश्विक पहचान भी है। अब आवश्यकता केवल एक चीज की है राजनीतिक प्राथमिकता की। जिस दिन भोजपुरी समाज यह तय कर लेगा कि भाषा भी उसका चुनावी मुद्दा है, उसी दिन आठवीं अनुसूची की मंजिल पहले से कहीं अधिक निकट दिखाई देगी।

बाबा भोजपुरिया
बाबा भोजपुरियाhttp://bhojpuri24.com
पत्रकारिता में करीब 20 वर्षों का अनुभव है। भोजपुरी भाषा और संस्कृति को लेकर बेहद संवेदनशील हैं। भोजपुरी संस्कृति, भाषा, खानपान, पहनावे और लोकगीतों के संरक्षण व संवर्धन के लिए लगातार प्रयासरत रहते हैं।

1 COMMENT

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Share post:

spot_imgspot_img

Popular

More like this
Related

लोकगीतों को राष्ट्रीय पहचान दिलाने वाली बिहार कोकिला विंध्यवासिनी देवी

पल्लवी कश्यप की रिपोर्ट Bhojpuri24.com की ‘भोजपुरी पुरोधा’ श्रृंखला...

डॉ. सुनील कुमार पाठक: भोजपुरी साहित्य को वैचारिक ऊंचाई देने वाले साहित्य साधक

Bhojpuri24.com की विशेष श्रृंखला 'भोजपुरी धुरंधर' में आज परिचय...