भोजपुरी को लोकभाषा से अकादमिक भाषा के रूप में स्थापित करने वाले डॉ. उदय नारायण तिवारी

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Bhojpuri24.com के जयंती विशेष में आज आप पढ़ रहे हैं डॉ. उदय नारायण तिवारी बारे में। उनका सबसे बड़ा योगदान यह रहा कि उन्होंने भोजपुरी को लोकभाषा की सीमाओं से निकालकर एक वैज्ञानिक और अकादमिक भाषा के रूप में स्थापित किया। उनका शोध विषय ‘The Origin and Development of Bhojpuri Language’ भोजपुरी अध्ययन के इतिहास में मील का पत्थर साबित हुआ। जन्मतिथि – 2 जुलाई 1903, पुण्यतिथि – 28 जुलाई 1984

भोजपुरी भाषा और साहित्य को वैज्ञानिक आधार पर स्थापित करने वाले, भाषाविज्ञान के महान आचार्य और भारतीय भाषा अध्ययन के शिखर पुरुष डॉ. उदय नारायण तिवारी जी की जयंती (2 जुलाई 1903) पर भावपूर्ण श्रद्धांजलि। उन्होंने भोजपुरी को केवल लोकभाषा नहीं, बल्कि एक सुव्यवस्थित, वैज्ञानिक और शोध-आधारित भाषा के रूप में विश्व पटल पर पहचान दिलाई।

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बलिया के पांडेपुर (ननिआउर) गांव के थे

डॉ. उदय नारायण तिवारी जी का जन्म 2 जुलाई 1903 को उत्तर प्रदेश के बलिया जनपद के पांडेपुर (ननिआउर) गांव में हुआ था। उनका बचपन सामान्य ग्रामीण परिवेश में बीता, लेकिन बचपन से ही उनमें अध्ययन और भाषा के प्रति गहरी रुचि दिखाई देती थी। प्रारंभिक शिक्षा उन्होंने हिंदी माध्यम से प्राप्त की और 1914 से 1918 के बीच मिडिल स्कूल की पढ़ाई पूरी की। 1923 में उन्होंने गवर्नमेंट हाई स्कूल, बलिया से हाई स्कूल परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद वे उच्च शिक्षा के लिए प्रयागराज (इलाहाबाद) पहुंचे, जहाँ उनके जीवन की शैक्षणिक यात्रा ने नई दिशा ली।

भोजपुरी इतिहास में मील का पत्थर है उनका रिसर्च

डॉ. तिवारी की शैक्षणिक यात्रा अत्यंत विस्तृत और बहुआयामी रही। 1925 में उन्होंने कायस्थ पाठशाला, इलाहाबाद से इंटरमीडिएट किया। इसके बाद 1927 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बी.ए. (अंग्रेजी, हिंदी और अर्थशास्त्र) की डिग्री प्राप्त की। 1929 में उन्होंने अर्थशास्त्र में एम.ए. किया।
इसके बाद उन्होंने भाषाओं की गहराई को समझने के लिए आगे अध्ययन जारी रखे और 1932 में हिंदी में एम.ए., 1939 में पाली/संस्कृत अध्ययन, 1941 में तुलनात्मक भाषाविज्ञान (Comparative Philology) और 1946 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से डी.लिट उपाधि प्राप्त की। उनका शोध विषय ‘The Origin and Development of Bhojpuri Language’ भोजपुरी अध्ययन के इतिहास में मील का पत्थर साबित हुआ।
इस शोध में उन्होंने भोजपुरी की उत्पत्ति, विकास, व्याकरण, ध्वनि संरचना, शब्द-संपदा और भाषाई विविधताओं का गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया। यह कृति न केवल भारतीय भाषाविज्ञान के क्षेत्र में मील का पत्थर बनी, बल्कि भोजपुरी को एक स्वतंत्र, समृद्ध और शोधपरक भाषा के रूप में राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

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शैक्षणिक जीवन और मार्गदर्शन

डॉ. तिवारी ने लंबे समय तक अध्यापन कार्य किया और कई विश्वविद्यालयों में अपनी सेवाएँ दीं। वे 1945 से 1961 तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में प्राध्यापक रहे। इसके बाद 1961 से 1971 तक जबलपुर विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रोफेसर रहे। 1972 से 1974 तक वे यूजीसी प्रोफेसर के रूप में पुनः इलाहाबाद विश्वविद्यालय से जुड़े। इसके अलावा वे पटना विश्वविद्यालय में एमेरिटस प्रोफेसर और वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय में अतिथि व्याख्याता भी रहे।
उन्होंने 35 डी.फिल और 9 डी.लिट शोधार्थियों का मार्गदर्शन कर भारतीय भाषाविज्ञान को मजबूत आधार प्रदान किया।

प्रमुख रचनाएँ और साहित्यिक योगदान

डॉ. तिवारी का साहित्यिक योगदान अत्यंत व्यापक और प्रभावशाली है। उनकी प्रमुख कृतियों में वीर काव्य संग्रह (1940), The Origin and Development of Bhojpuri (1946), भोजपुरी भाषा और साहित्य (1954), हिंदी भाषा का उद्गम और विकास (1956), भाषा शास्त्र की रूपरेखा (1964), भाषा विज्ञान का संक्षिप्त इतिहास (1983) और भारतीय आर्य भाषाएँ (1984) शामिल हैं। उन्होंने कुल 82 निबंध लिखे, जिनमें 12 अंग्रेजी में थे। उनकी रचनाओं ने भारतीय भाषाओं के वैज्ञानिक अध्ययन को नई दिशा दी।

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सम्मान और भोजपुरी को अमूल्य योगदान

डॉ. तिवारी को उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए कई सम्मान प्राप्त हुए हैं जैसे देव पुरस्कार (1955–56), बिहार सरकार सम्मान (1959), भोजपुरी अकादमी पटना सम्मान, विश्व हिंदी सम्मेलन दिल्ली सम्मान और उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान से साहित्य भूषण। उनका सबसे बड़ा योगदान यह रहा कि उन्होंने भोजपुरी को लोकभाषा की सीमाओं से निकालकर एक वैज्ञानिक और अकादमिक भाषा के रूप में स्थापित किया। उनके प्रयासों से भोजपुरी भाषा को वैश्विक भाषाविज्ञान में सम्मानजनक स्थान मिला। भोजपुरी भाषा और साहित्य के इस महान शिल्पकार, भाषाविज्ञान के प्रकाश स्तंभ डॉ. उदय नारायण तिवारी जी की जयंती पर Bhojpuri24.com परिवार उन्हें कोटि-कोटि नमन करता है।

बाबा भोजपुरिया
बाबा भोजपुरियाhttp://bhojpuri24.com
पत्रकारिता में करीब 20 वर्षों का अनुभव है। भोजपुरी भाषा और संस्कृति को लेकर बेहद संवेदनशील हैं। भोजपुरी संस्कृति, भाषा, खानपान, पहनावे और लोकगीतों के संरक्षण व संवर्धन के लिए लगातार प्रयासरत रहते हैं।

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