डॉ. मुक्तेश्वर तिवारी ‘बेसुध’ जयंती विशेष- 1 जुलाई 1927
भोजपुरी भाषा और साहित्य के इतिहास में डॉ. मुक्तेश्वर तिवारी ‘बेसुध’ का नाम अत्यंत सम्मान और आदर के साथ लिया जाता है। उन्होंने न केवल भोजपुरी साहित्य को समृद्ध किया, बल्कि हास्य-व्यंग्य की ऐसी परंपरा स्थापित की, जिसने आम जनमानस तक भोजपुरी की सहजता, संवेदनशीलता और सामाजिक चेतना को पहुंचाया। ‘चतुरी चाचा’ के नाम से लोकप्रिय डॉ. तिवारी ने लगभग 25 वर्षों तक अपने व्यंग्य लेखन से समाज की विसंगतियों पर करारी चोट की और भोजपुरी साहित्य को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।
उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के चितबड़ागांव स्थित आशापुर गांव में 1 जुलाई 1927 को जन्मे डॉ. मुक्तेश्वर तिवारी बचपन से ही साहित्यिक अभिरुचि रखते थे। प्रारंभिक शिक्षा अपने क्षेत्र में प्राप्त करने के बाद उन्होंने हिंदी साहित्य में एम.ए., एम.कॉम., साहित्यरत्न, एल.टी. तथा पीएच.डी. की उपाधियां अर्जित कीं। उनका शोध कार्य ‘सूफी अध्यात्म दर्शन का मध्यकालीन हिंदी संत साहित्य पर प्रभाव’ तथा ‘भोजपुरी लोकोक्तियाँ और मुहावरे’ जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर आधारित था, जो आज भी शोधार्थियों के लिए उपयोगी माने जाते हैं।
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शिक्षक, शोधकर्ता और साहित्यकार का अद्भुत संगम
डॉ. तिवारी ने अपने जीवन की शुरुआत शिक्षक के रूप में की और बाद में चितबड़ागांव इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्य बने। शिक्षा के साथ-साथ साहित्य उनका जीवनधर्म था। उन्होंने नाटक, एकांकी, कविता, लोकगीत, कहानी और हास्य-व्यंग्य जैसी विभिन्न विधाओं में लेखन किया। उनकी भाषा सरल, लोकजीवन से जुड़ी और जनमानस की संवेदनाओं को अभिव्यक्त करने वाली थी।
‘चतुरी चाचा की चिट्ठियाँ’ ने दिलाई अमर पहचान
डॉ. मुक्तेश्वर तिवारी की सबसे बड़ी पहचान ‘आज’ समाचार पत्र में प्रकाशित होने वाला उनका लोकप्रिय स्तंभ ‘चतुरी चाचा की चिट्ठियाँ’ बना। लगभग 25 वर्षों तक नियमित प्रकाशित इस व्यंग्य स्तंभ ने भोजपुरी पाठकों के बीच अभूतपूर्व लोकप्रियता हासिल की। सामाजिक कुरीतियों, राजनीतिक विसंगतियों और बदलते ग्रामीण जीवन पर उनके तीखे लेकिन सहज व्यंग्य ने उन्हें घर-घर में प्रसिद्ध कर दिया।
उनकी यही लोकप्रियता आगे चलकर आकाशवाणी इलाहाबाद के चर्चित धारावाहिक ‘समझावन शुक्ल के परिवार’ तक पहुंची। इलाहाबाद और गोरखपुर आकाशवाणी से उनके भोजपुरी नाटकों का नियमित प्रसारण हुआ, जिसने उनकी रचनाओं को व्यापक जनस्वीकृति दिलाई।
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भोजपुरी लोकभाषा के गंभीर शोधकर्ता
डॉ. तिवारी केवल रचनाकार ही नहीं थे, बल्कि भोजपुरी भाषा के गंभीर शोधकर्ता भी थे। उनकी पुस्तक ‘भोजपुरी लोकोक्तियाँ और मुहावरे’ इस क्षेत्र का महत्वपूर्ण शोधग्रंथ मानी जाती है। इस पुस्तक में उन्होंने भोजपुरी लोकजीवन, संस्कृति, व्यवहार और सामाजिक चेतना को भाषा के माध्यम से वैज्ञानिक ढंग से प्रस्तुत किया। आज भी भोजपुरी भाषा पर शोध करने वाले विद्वानों के लिए यह एक महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ है।
समृद्ध साहित्यिक विरासत
डॉ. मुक्तेश्वर तिवारी ने हिंदी और भोजपुरी दोनों भाषाओं में महत्वपूर्ण साहित्य रचा। उनकी प्रमुख प्रकाशित कृतियां हैं—
- चतुरी चाचा की चिट्ठियाँ (दो भाग) – भोजपुरी हास्य-व्यंग्य
- मेघमाला – हिंदी कविता संग्रह
- गुलछर्रे – हिंदी हास्य-व्यंग्य
- हिमालय ना झुकी कबहूँ – भोजपुरी कविता एवं गीत संग्रह
- भोजपुरी लोकोक्तियाँ और मुहावरे – शोधग्रंथ
- भइंसि का दूध – भोजपुरी कहानी संग्रह
इनमें विशेष रूप से ‘भइंसि का दूध’ और ‘भोजपुरी लोकोक्तियाँ और मुहावरे’ भोजपुरी साहित्य की अमूल्य धरोहर मानी जाती हैं।
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सम्मान और अविस्मरणीय योगदान
डॉ. मुक्तेश्वर तिवारी ‘बेसुध’ ने ‘आज’, ‘दैनिक हिंदुस्तान’, ‘धर्मयुग’ सहित अनेक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेखन किया। वे रेलवे सलाहकार समिति के सदस्य भी रहे। शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार सहित अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित किया गया।
24 जुलाई 1987 को हृदयाघात के कारण उनका निधन हो गया, लेकिन उनकी रचनाएं आज भी भोजपुरी समाज की सांस्कृतिक चेतना को जीवित रखे हुए हैं।
आज भी प्रासंगिक हैं ‘चतुरी चाचा’
डॉ. मुक्तेश्वर तिवारी ‘बेसुध’ का साहित्य केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं था, बल्कि समाज को आईना दिखाने वाला सशक्त दस्तावेज भी था। उन्होंने लोकभाषा को सम्मान दिलाया, भोजपुरी साहित्य को शोध की गंभीर दिशा दी और हास्य-व्यंग्य को सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बनाया। उनकी रचनाएं आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं, जितनी अपने समय में थीं।
उनकी जयंती पर उन्हें स्मरण करना केवल एक साहित्यकार को श्रद्धांजलि देना नहीं, बल्कि भोजपुरी भाषा, लोकसंस्कृति और भारतीय भाषाई विरासत के प्रति सम्मान प्रकट करना भी है। डॉ. मुक्तेश्वर तिवारी ‘बेसुध’ आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणा स्रोत बने रहेंगे।

