नबीन कुमार
एक हाली रउवा अपना छाती (करेजा/दिल) प हाथ ध के आंख मुदि के सोची कि आज ग्रियर्सन जदि रहिते आ भोजपुरी भाषा वाला समाज के देखिते त का उहे बात कहिते जवन उ ओह घरी (1880-90 के आसपास) कहले रहले?
सोच लेहनी? अच्छा ग्रियर्सन के बात मालूम नइखे?
ग्रियर्सन तब कहले रहले कि Bhojpuri is the practical language of an energetic race. यानि कि भोजपुरी, एगो उर्जावान समूह/जाति के व्यवहारिक भाषा ह जिअतार भाषा ह.
उ आगे कहले रहले कि ‘जब हम भोजपुरिया क्षेत्र में गइनी आ ओजुगा के लोगन के देखनी त हमरा इ बुझाइल कि बिना कवनो ठोस आ गोट साहित्य के संरक्षण के इ भाषा अपना के जिअतार रखले बिआ। एगो अइसन भाषा जवना के राजकीय सहजोग नइखे, क्षेत्र के प्रबुद्ध वर्ग के समर्थन नइखे बावजूद एकरा, लोकभाषा के हर गुण धर्म के अपना भीतरी समेटले बिआ । इहे ना बिहारी भाषा में कम लिखित साहित्य भइला के बादो एह भाषा के बिकास सबसे बेसी भइल बा।’
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अब एक हाली सोची कि ग्रियर्सन, भोजपुरी भाषा आ भोजपुरिया लोगन खातिर आज से 150 साल के आसपास जवन बात कहले रहले, उ बात आज कतना सांच बा ? एक हाली फेरु से आंखि मुदि के आ करेजा प तरहथी के साट के अपना दिल के धड़कन के महसूसियावत सोची कि, वर्तमान समय में भोजपुरी भाषा आ एह भाषा वाला लोग, एह भाषा के बारे में का सोचत बा ?
घबड़ाई जनि, गोड़ के चई, जमीनिये प सटल रही, धंसी – भंसी ना ।
असल में पिछला 20-21 बरिस से भोजपुरिया समाज के लोग भोजपुरी भाषा के ले के बस एकही चीज सोचेला उ ह, भोजपुरी के संवैधानिक मान्यता। अइसन नइखे कि एह से पहिले भोजपुरिया समाज के लोग, संवैधानिक मान्यता के बात ना करत रहे, बाकिर अब लेखा ना।

आखिर इ ‘अब लेखा ना’ के माने का हो गइल ?
असल में अब का होता कि, ना भोजपुरी में बोले के बा, ना भोजपुरी में आपन दैनिक बात-बतकही लिखे के बा, ना भोजपुरी के किताबिन के पढे के बा, बाकिर इ मय लो भोजपुरी के संवैधानिक मान्यता जोहता ।
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एक हाली फेरु अपना तरहथी के करेजा से साटि के बिना आंखि मुदले देखे के कोशिश करीं कि जवना भाषा में ना रउवा लिखब, ना रउवा पढब, ना रउवा बोलब ओह भाषा के संवैधानिक मान्यता रउवा काहें जोहत बानी?
पहिले लोग संविधानिक आ साहित्यिक (साहित्य अकादमी) के मान्यता जोहत रहे काहें कि जवन भोजपुरी में लिखा पढा रहल बा ओह के संरक्षण मिले, ओह के बढावा मिले , ओह लिखलका पढलका के देस दुनिया सराहे, बड़ाई करे भा ओकर आलोचना करे । यानि कि जवन लिखात पढात बा उ सभका सोझा जाई तबे नू ओह में नीमन बाउर के बात होई ? त ओह घरी कुछुवे लोग रहे बाकिर एह दिसाई उ लोग लागल रहे । इहो बात बा कि उहे लोग भोजपुरी के संवैधानिक आ साहित्यिक मान्यता के बात करत रहे।
अब, साहित्य अकादमी से नॉन-संवैधानिक भाषा सभ के जब से साहित्य अकादमी चुने लागल त भोजपुरी ओह में शामिल हो गइल, एह से एह में केहू के कवनो प्रयास नइखे, इ शुद्ध रुप से ओह घरी के सरकार के फैसला रहे, बाकिर रउवा यानि कि भोजपुरिया लो का करत बा?
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रउवा भोजपुरी के नाव प जतना संगठन बाड़न स, प्रकाशन (किताब / पत्रिका प्रकाशित करे वाला संस्था) वाला से ले के साहित्य आ भोजपुरी संस्कृति के नाव प बनल संस्था, इ कुल्ह मय के मय लो भोजपुरी के संवैधानिक मान्यता के बात करेला। प्रकाशन वाला लो त भोजपुरी में किताबियो प्रकाशित करेला। बाकिर ओह किताबिन के प्रचार (जवन भोजपुरी में लिखाइल बिआ), हिंदी में करेला। आखिर भोजपुरी में लिखाइल किताब के प्रचार हिंदी में काहें?
एहि तरे भोजपुरी में बेहतर गीत गावे के दावा करे वाला लोग जब ओह गीत के सोसल मिडिया प डालेला त ओह के प्रचार प्रसार खातिर भोजपुरी छोड़ के दुनिया के मय भाषा के प्रयोग करेला। अइसन काहें ? रउवा भोजपुरी के अधिकतर गायक गायिका के देख लिहीं उ लो अपना भोजपुरी गीतन के बारे में भोजपुरी में लिखत – बोलत ना लउकी ।
भोजपुरी में बी ए एम ए ओ मे कइल अनेकन लोग बा, दिन रात उ सोसल मिडिया प लिखत पढत बा, उ लो कतना भोजपुरी में लिखेला पढेला ? रउवा खुद देखीं कि भोजपुरी के कवनो पोस्ट / लेख प भा विडियो आदि प रउवा जवन कमेंट करेनी का उ भोजपुरी में रहेला ??
असल में हकीकत त इहे नू बा कि हम भोजपुरी में बोलब ना, हम भोजपुरी में पढब ना, हम भोजपुरी में लिखब ना, हम भोजपुरी में रोज के लिखित-मौखिक बतकही ना करब….. बाकिर हम चाहत बानी कि भोजपुरी के संवैधानिक मान्यता मिल जाउ ? आखिर काहें आ कइसे ?

भोजपुरी के संवैधानिक मान्यता काहें खातिर मिलो ?
जब रउवा पढे लिखे बोले बतियावे के नइखे त फेरु काहें खातिर संविधान-संविधान चिचिलात बानी। संवैधानिक मान्यता कवनो समुंदर मंथन से निकलल अमरित ना ह कि भाषा सभ के चटा दिहल जाई त भाषा कुल्ह अमर हो जइहन स । संवैधानिक मान्यता त बस ओह भाषाई आगि वाला चुल्हा के जरा के राखेले जवना के जरा के राखे वाला लोग लवना-लकड़ी के जोगाड़ खुद करेला। सैंवधानिक मान्यता आ साहित्यिक मान्यता मात्र सहयोगी के भुमिका निभावे-निबाहे ले मुख्य भूमिका ना।
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रउवा अपना भाषा में रुचि बढाइब तबे संवैधानिक मान्यता आ साहित्यिक मान्यता के आनंद उठा सकेनी। भारत में अइसन 12-14 गो भाषा बाड़ी स जवनन के साहित्यिक आ संवैधानिक मान्यता मिलल बा, बाकिर ओह भाषा वाला लो के कम रुचि के वजह से उ भाषा कुल्ह सुस्त पड़ल बाड़ी स, परुआइल बाड़ी स। ओकनी के नावो चर्चा नइखे खास क के साहित्य आ संस्कृति के ले के। एह से रउवा तय करीं कि संवैधानिक मान्यता त सरकार के ओर से मिले वाला बा, रउवा अपना ओर से अपना मातृभाषा भोजपुरी खातिर का करत बानी?
इ हम जानत बानी आ देखत बानी कि कुछ लोग, मात्र कुछ लोग बा जे लगातार भोजपुरी में लिखि पढ रहल बा, कोशिश क रहल बा, आपन खुन पसेना एक कइले बा, बाकिर एगो भाषा जवना जनसंख्या 14 करोड़ से बेसी बा, जवन भाषा 8-10 देसन में फइलल – पसरल बिआ, का ओह भाषा में कुछ लो के लिखला, पढला से हो जाई ?
बात नकारात्मक भइला के नइखे, बात के चिंतन करे सोचे गुने बुझे के जरुरत बा, आ सांच कहीं त भोजपुरी में लगातार लिखे पढे बोले के जरुरत बा । ध्यान रहे, हम जब लिखे के कहत बानी त, साहित्य लिखे के नइखे कहत, रोज के बात, जवन रउवा लिखत बानी दोसरा भाषा में ओह के भोजपुरी में लिखे के कहत बानी। हमनी के अपना मातृभाषा भोजपुरी में लिखे-पढे – बोले के चाहीं। एकरा खातिर ना दिन वार देखे के जरुरत बा ना कवनो ग्रह नछतर!

