मां की दीवारों से शुरू हुआ सपना, जिसने भोजपुरी लोककला ‘पिड़िया’ को दिलाई वैश्विक पहचान

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Bhojpuri24.com की विशेष ‘भोजपुरी धुरंधर’ श्रृंखला में आज पढ़िए पिड़िया लेखन की प्रतिष्ठित लोकचित्रकार विनीता कुमारी की प्रेरक कहानी। हाल ही में भोजपुर की पारंपरिक पिड़िया पेंटिंग (पिड़िया लेखन) को भौगोलिक संकेतक (GI) टैग मिलने के बाद विनीता कुमारी ने इसे पूरे भोजपुरी समाज के लिए गर्व और सम्मान का क्षण बताया है।

पटना/नई दिल्ली: भोजपुरी अंचल के गांवों में कार्तिक महीने की शामें कभी केवल त्योहार नहीं होती थीं। वे संस्कृति, संवेदना और परंपरा की जीवंत पाठशाला होती थीं। मिट्टी के आंगन में जलते दीये, घर की दीवारों पर उकेरे जाते लोकचित्र, पिड़िया के गीत गाती महिलाओं की टोलियां और वातावरण में घुली लोकजीवन की मिठास-यही वह संसार था, जहां एक छोटी-सी बच्ची अपनी मां को घंटों निहारती रहती थी।

मां दीवारों पर रंगों से आकृतियां बनाती थीं और साथ-साथ पिड़िया के गीत गाती थीं। बच्ची उन रेखाओं को समझ नहीं पाती थी, लेकिन उनमें छिपे भाव उसे आकर्षित करते थे। उसे क्या पता था कि दीवारों पर उभरने वाली वही आकृतियां एक दिन उसकी पहचान बन जाएंगी और वह स्वयं उस कला की सबसे बड़ी प्रतिनिधियों में गिनी जाएगी। यह कहानी है बिहार के रोहतास जिले की बेटी विनीता कुमारी की, जिन्होंने भोजपुरी लोककला पिड़िया लेखन को गांव की दीवारों से निकालकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया।

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मां की उंगलियों से मिली संस्कृति की विरासत

विनीता कुमारी का बचपन लोकपरंपराओं के बीच बीता। कार्तिक मास में गांव की महिलाएं पिड़िया पर्व के दौरान घर की दीवारों पर विशेष चित्र बनाती थीं। यह केवल चित्रकला नहीं थी, बल्कि भाई-बहन के प्रेम, लोकआस्था और सामाजिक संबंधों का उत्सव था। विनीता बताती हैं कि उनकी मां जब पिड़िया लेखन करती थीं, तो वे उनके पास बैठकर ध्यान से देखा करती थीं। धीरे-धीरे उन्होंने भी दीवारों पर रेखाएं खींचनी शुरू कीं। अनजाने में ही कला और संस्कृति के वे बीज उनके मन में बो दिए गए, जो आगे चलकर जीवन का उद्देश्य बन गए। आज भी जब वे पिड़िया बनाती हैं तो उन्हें अपनी मां की वही उंगलियां याद आती हैं, जिन्होंने पहली बार उन्हें लोककला का अर्थ समझाया था।

जब मिट्टी की दीवारें गायब होने लगीं

समय बदल रहा था। गांवों के कच्चे घर पक्के मकानों में बदल रहे थे। मिट्टी की दीवारों की जगह सीमेंट और पेंट ने ले ली। आधुनिकता की दौड़ में लोकपरंपराएं धीरे-धीरे पीछे छूटने लगीं। विनीता कुमारी को यह बदलाव भीतर तक बेचैन करता था। उन्हें लगने लगा कि अगर कुछ नहीं किया गया तो आने वाली पीढ़ियां पिड़िया को केवल किताबों में पढ़ेंगी, उसे जी नहीं पाएंगी। यहीं से एक कलाकार का नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक योद्धा का जन्म हुआ।

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दिल्ली आईं, लेकिन गांव को दिल में बसाए रखा

शादी के बाद विनीता कुमारी दिल्ली आ गईं। महानगर की तेज रफ्तार जिंदगी में अक्सर लोग अपनी जड़ों से दूर हो जाते हैं, लेकिन विनीता के साथ ऐसा नहीं हुआ। दिल्ली में रहकर उन्हें अपने गांव की मिट्टी और ज्यादा याद आने लगी। इस सफर में उनके पति भुनेश्वर भास्कर सबसे बड़े सहयोगी बने। लोकसंस्कृति पर गहरी पकड़ रखने वाले भुनेश्वर भास्कर जी की पुस्तक ‘लोक संस्कृति एवं परंपराएं’ सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा प्रकाशित हो चुकी है। इस पुस्तक में गोधन और पिड़िया पर उनके शोधपरक लेख भी शामिल हैं। पति के प्रोत्साहन ने विनीता को एक नया रास्ता दिखाया, पिड़िया को दीवारों से निकालकर कागज और कैनवास पर लाने का। लेकिन यह काम उतना आसान नहीं था जितना सुनने में लगता है।

दीवार से कैनवास तक का कठिन सफर

पिड़िया लेखन सदियों से दीवारों पर बनाया जाता रहा है। उसकी अपनी तकनीक है, अपनी संरचना है और अपनी आत्मा है। भोजपुरी24 से बातचीत में विनीता जी बताती हैं कि पिड़िया कला में ‘डबल लाइन’ का विशेष महत्व होता है। इसकी रेखाएं केवल डिजाइन नहीं होतीं, बल्कि पूरी कलाकृति की पहचान होती हैं। दीवार पर बनने वाली कला को कागज और कैनवास पर उसी भाव और तकनीक के साथ उतारना उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती थी। कई बार चित्र बिगड़े। कई प्रयोग असफल हुए। कई लोगों ने कहा कि यह कला आधुनिक समय में नहीं चल पाएगी। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।

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जब लोगों ने पूछा-यह आखिर है क्या?

आज पिड़िया कला को GI टैग मिल चुका है, लेकिन एक समय ऐसा भी था जब कला प्रदर्शनियों में लोग उनसे पूछते थे कि ‘यह कौन-सी पेंटिंग है?’ उन्हें हर बार समझाना पड़ता था कि यह केवल सजावटी कला नहीं, बल्कि भोजपुरी समाज की सांस्कृतिक स्मृति है। कई बार उपेक्षा मिली। कई बार मंच छोटे मिले। लेकिन विनीता ने हर अस्वीकार को अपनी ताकत बनाया। वे लगातार प्रदर्शनियों में जाती रहीं, लोगों को पिड़िया की कहानी सुनाती रहीं और भोजपुरी संस्कृति का परिचय कराती रहीं।

पिड़िया लेखन में आजकल काफी मिलावट देखने को मिल रही है। कुछ लोग इसमें रासायनिक (केमिकल) रंगों और यहां तक कि नीले रंग का भी प्रयोग कर रहे हैं, जबकि पारंपरिक पिड़िया लेखन में केवल प्राकृतिक रंगों का ही इस्तेमाल होता है। इसमें सफेद रंग के लिए चावल, हरे रंग के लिए सेम की पत्तियां तथा लाल रंग के लिए सिंदूर और घी का प्रयोग किया जाता है।

2019 : जब पहली बार राष्ट्रीय मंच पर गूंजी पिड़िया की पहचान

वर्ष 2019 उनके जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। दिल्ली में संगीत नाटक अकादमी के योग पर्व में पहली बार उनकी पिड़िया कला की प्रदर्शनी लगी। यह केवल एक प्रदर्शनी नहीं थी, बल्कि वर्षों के संघर्ष की पहली बड़ी स्वीकृति थी। इसी दौरान सांसद विनोद नारायण झा और अकादमी के अधिकारियों ने उनकी कला की सराहना की। उसी वर्ष उन्हें बिहार सरकार के उपेन्द्र महारथी शिल्प अनुसंधान संस्थान के सहयोग से राजगीर स्थित नवोदय विद्यालय की बाहरी दीवार पर बुद्ध के स्वरूप में अपनी कलाकृति बनाने का अवसर मिला।

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राष्ट्रीय सम्मान और बढ़ती पहचान

वर्ष 2019 में ही हंसराज कॉलेज की प्राचार्य डॉ. रमा, मैथिली-भोजपुरी अकादमी के उपाध्यक्ष अजीत दुबे और प्रसिद्ध साहित्यकार निलय उपाध्याय के हाथों उन्हें गेस्ट ऑफ ऑनर सम्मान प्राप्त हुआ। बिहार ललित कला अकादमी में आयोजित राष्ट्रीय प्रदर्शनी में उनकी कलाकृतियों ने दर्शकों का ध्यान खींचा। इसी दौरान उनकी मुलाकात तत्कालीन केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी से हुई, जिन्होंने उनकी कला के बारे में विस्तार से जानकारी ली।

शोध और साधना का सम्मान

पिड़िया कला पर उनके गंभीर कार्य को देखते हुए CCRT (Centre for Cultural Resources and Training) ने उन्हें पिड़िया लेखन के शोध के लिए फेलोशिप प्रदान की। यह केवल एक सम्मान नहीं था, बल्कि इस बात की मान्यता थी कि विनीता केवल कलाकार नहीं, बल्कि लोकसंस्कृति की शोधकर्ता और संरक्षक भी हैं।

शिल्प संग्रहालय से अंतरराष्ट्रीय मंच तक

नई दिल्ली के राष्ट्रीय शिल्प संग्रहालय में आयोजित भारतीय हस्तशिल्प मेले में भागीदारी ने उनकी कला को नई ऊंचाई दी। वर्ष 2022 में अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनी के दौरान उन्हें लोक कला सृजन सम्मान से सम्मानित किया गया। वर्ष 2023 में संगीत नाटक अकादमी की चेयरपर्सन संध्या पुरेचा को अपनी पिड़िया कलाकृति भेंट करना उनके लिए विशेष उपलब्धि रही। इसके बाद राष्ट्रीय शिल्प संग्रहालय की बाहरी दीवार पर उनकी विशाल पिड़िया कलाकृति ने हजारों लोगों का ध्यान आकर्षित किया और भोजपुरी कला को नई दृश्यता प्रदान की।

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जब भोजपुर की पिड़िया पेंटिंग को GI टैग मिला, तो विनीता कुमारी की आंखें नम हो गईं। उनके लिए यह केवल एक प्रशासनिक उपलब्धि नहीं थी। यह उनकी मां जैसी लाखों ग्रामीण महिलाओं की जीत थी, जिन्होंने सदियों से इस परंपरा को जीवित रखा। भोजपुरी24 से बात करते हुए वे कहती हैं, ‘यह सम्मान किसी एक कलाकार का नहीं, पूरे भोजपुरी समाज का है।’

आने वाली पीढ़ियों के लिए एक संदेश

विनीता कुमारी आज भी लोगों को बताती हैं कि पिड़िया में सीमित रंगों का प्रयोग होता है। मिट्टी से प्राकृतिक रंग, सेम के पत्तों से हरा रंग, चावल से सफेद और सिंदूर से लाल रंग तैयार किया जाता है। यही इसकी मौलिकता और सुंदरता है। उनका सपना है कि जिस तरह मधुबनी पेंटिंग दुनिया भर में प्रसिद्ध हुई, उसी तरह पिड़िया लेखन भी वैश्विक मंच पर भोजपुरी संस्कृति की पहचान बने।

भोजपुरी के धुरंधर है विनीता जी

विनीता कुमारी की कहानी केवल एक कलाकार की कहानी नहीं है। यह उस बेटी की कहानी है जिसने अपनी मां की उंगलियों से सीखी कला को दुनिया के सामने स्थापित किया। यह उस स्त्री की कहानी है जिसने सीमित संसाधनों के बावजूद अपनी लोकसंस्कृति को बचाने का संकल्प लिया। और यह उस कलाकार की कहानी है जिसने गांव की मिट्टी से निकले रंगों को दुनिया के कैनवास तक पहुंचा दिया। आज जब पिड़िया लेखन की चर्चा होती है, तो उसके रंगों में केवल कला नहीं दिखाई देती, बल्कि एक स्त्री का संघर्ष, उसका समर्पण, उसकी जिद और अपनी मिट्टी के प्रति उसका अथाह प्रेम भी दिखाई देता है। विनीता कुमारी सचमुच भोजपुरी समाज की वह धुरंधर हस्ती हैं, जिन्होंने रंगों और रेखाओं के माध्यम से पूरी दुनिया को यह बताया कि भोजपुरी संस्कृति केवल भाषा नहीं, बल्कि एक जीवंत सभ्यता है।

बाबा भोजपुरिया
बाबा भोजपुरियाhttp://bhojpuri24.com
पत्रकारिता में करीब 20 वर्षों का अनुभव है। भोजपुरी भाषा और संस्कृति को लेकर बेहद संवेदनशील हैं। भोजपुरी संस्कृति, भाषा, खानपान, पहनावे और लोकगीतों के संरक्षण व संवर्धन के लिए लगातार प्रयासरत रहते हैं।

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