भोजपुरी धुरंधर: अश्लीलता के दौर में लोकसंस्कृति की मशाल बनीं मनीषा श्रीवास्तव, ‘उस्ताद बिस्मिल्लाह खां युवा पुरस्कार-2025’ से सम्मानित किए जाने की घोषणा की गई है।
पटना/रोहतास। भोजपुरी मनोरंजन जगत में जब भी अश्लीलता और दोअर्थी गीतों की चर्चा होती है, तब एक नाम उम्मीद की तरह सामने आता है मनीषा श्रीवास्तव। वह गायिका, जिसने बाजार की मांग के आगे झुकने से इनकार कर दिया, जिसने लोकसंस्कृति को अपना धर्म माना और जिसने साबित कर दिया कि भोजपुरी में बिना अश्लीलता के भी लोकप्रियता हासिल की जा सकती है।
आज इसी लोकसंस्कृति के प्रति समर्पण के लिए बिहार की अंतरराष्ट्रीय लोकगायिका मनीषा श्रीवास्तव को संगीत नाटक अकादमी, भारत सरकार द्वारा प्रतिष्ठित ‘उस्ताद बिस्मिल्लाह खां युवा पुरस्कार-2025’ से सम्मानित किए जाने की घोषणा की गई है। इस उपलब्धि से बिहार के कला एवं सांस्कृतिक जगत में हर्ष का माहौल है। इसे प्रदेश की लोक परंपराओं और लोकसंगीत के लिए एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। 
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जब रिश्तेदार बोले-‘बेटी के पढ़ावल और बढ़ावल ठीक ना होला’
रोहतास के एक साधारण परिवार से आने वाली मनीषा का सफर आसान नहीं था। जब उनके पिता ने उन्हें शास्त्रीय संगीत सीखने के लिए प्रयागराज भेजने का फैसला किया, तब कई रिश्तेदारों ने विरोध किया। लोगों ने यहां तक कहा-
‘श्रीवास्तव जी, बेटी के पढ़ावल और बेटी के बढ़ावल ठीक ना होला। गाना-बजाना से लड़की खराब हो जाली।’
Bhojpuri24.com से बातचीत में मनीषा बताती हैं कि उनके पिता ने समाज की नहीं, बल्कि बेटी की प्रतिभा पर भरोसा किया। कई बार ऐसा लगा कि उनकी पढ़ाई और संगीत दोनों छूट जाएंगे। छुट्टियों में गांव आने पर मन में डर रहता था कि पता नहीं दोबारा प्रयागराज लौटने का मौका मिलेगा या नहीं। लेकिन परिवार के विश्वास ने उनका हौसला बनाए रखा।
दादाजी बने पहले गुरु, पहला मंच भी उन्हीं ने दिया
मनीषा के संगीत की शुरुआत घर के आंगन से हुई। मां, दादी और चाची को लोकगीत गाते सुनकर उनके भीतर संगीत के बीज अंकुरित हुए। उनके दादाजी स्कूल के प्रिंसिपल थे। उन्होंने सबसे पहले उनकी प्रतिभा को पहचाना। गांव में कोई कार्यक्रम होता, कोई अधिकारी या जनप्रतिनिधि आता, तो स्वागत गीत गाने के लिए मनीषा को मंच पर खड़ा कर दिया जाता। दादाजी ही उनके पहले श्रोता, पहले समीक्षक और पहले प्रेरक बने।
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पिता ने रखी शर्त, तब खुला संगीत का रास्ता
मनीषा बताती हैं कि दसवीं की परीक्षा के दौरान उनके पिता ने साफ कह दिया था- ‘गाना बाद में, पहले पढ़ाई। 80 प्रतिशत नंबर लाओ, तब संगीत सीखने जाओ।’
मनीषा ने चुनौती स्वीकार कर ली। गांव में कभी बिजली तो कभी लालटेन की रोशनी में रात-रात भर पढ़ाई की। परीक्षा में 78 प्रतिशत अंक आए। शर्त से सिर्फ दो प्रतिशत कम, लेकिन पिता उनकी मेहनत और लगन से इतने प्रभावित हुए कि दोबारा प्रयागराज भेज दिया। वहीं से उन्होंने शास्त्रीय संगीत की शिक्षा प्राप्त की और आगे चलकर ‘संगीत प्रभाकर’ की उपाधि हासिल की।
कंपनियों ने कहा-‘मसाला लाओ’, मनीषा ने कहा- ‘संस्कार गाऊंगी’
जब संगीत की पढ़ाई पूरी हुई और उन्होंने एल्बम बनाने की कोशिश की, तब भोजपुरी संगीत उद्योग का दूसरा चेहरा सामने आया। रिकॉर्डिंग कंपनियों ने कहा- ‘कुछ मसाला लाओ, हीरोइन को कम कपड़ों में नचाओ। भोजपुरी में यही बिकता है।’ लेकिन मनीषा ने साफ इनकार कर दिया। उनका मानना था कि संगीत उनकी साधना है और साधना के साथ समझौता नहीं किया जा सकता। उन्होंने तय कर लिया कि चाहे घर की चारदीवारी में ही गाना पड़े, लेकिन अश्लील गीत कभी नहीं गाएंगी।
चैता से सोहर तक, लोकधुनों को बनाया पहचान
मनीषा ने भोजपुरी की पारंपरिक लोकविधाओं को अपना माध्यम बनाया। उन्होंने चैता, कजरी, संझा, पराती, बिरहा, निर्गुण, होरी, झूमर और सोहर जैसे लोकगीतों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का बीड़ा उठाया। जब भोजपुरी इंडस्ट्री देवर-भाभी और दोअर्थी गीतों के सहारे लोकप्रियता तलाश रही थी, तब मनीषा गांव की मिट्टी की खुशबू, लोकसंस्कारों और परंपराओं को अपने गीतों में सहेज रही थीं। वह कहती हैं-‘लोग अच्छे गीत सुनना चाहते हैं, बस सुनाने वालों की कमी है।’ उनका मानना है कि यह कहना गलत है कि भोजपुरी श्रोता केवल अश्लील गीत सुनना चाहते हैं।

मैंने कभी मॉडल का सहारा नहीं लिया
मनीषा कहती हैं,’मैंने कभी मॉडल का सहारा नहीं लिया। साड़ी में गाया। फिर भी सोशल मीडिया पर लाखों लोग जुड़े। किसी ने मुझसे अश्लील गीत की मांग नहीं की।’ उनके अनुसार कलाकार का काम केवल मनोरंजन करना नहीं, बल्कि समाज को दिशा देना भी है। यदि कलाकार अच्छी सामग्री प्रस्तुत करे तो श्रोता उसे अवश्य स्वीकार करते हैं।
गाना सुनकर पसंद किया, फिर जीवनसाथी बन गए
वर्ष 2016 में पटना के एक कार्यक्रम में एक युवक ने उनका गायन सुना और खूब सराहना की। वह युवक थे सुमित श्रीवास्तव। बाद में परिवार की सहमति से दोनों की शादी हुई। शादी के समय मनीषा को डर था कि कहीं उनका करियर रुक न जाए, लेकिन हुआ इसका ठीक उल्टा। सुमित और परिवार के सहयोग से उनका सफर और आगे बढ़ता गया। मंच बड़े होते गए, श्रोता बढ़ते गए और पहचान राष्ट्रीय स्तर तक पहुंच गई।
बिस्मिल्लाह खां युवा पुरस्कार: भोजपुरी की जीत
आज जब संगीत नाटक अकादमी ने मनीषा श्रीवास्तव को उस्ताद बिस्मिल्लाह खां युवा पुरस्कार-2025 के लिए चुना है, तब यह सम्मान केवल उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है। यह उस बेटी की जीत है, जिसे कभी आगे बढ़ाने पर सवाल उठाए गए थे। यह उस पिता की जीत है, जिसने समाज की परवाह किए बिना बेटी के सपनों पर भरोसा किया। और सबसे बढ़कर यह भोजपुरी लोकसंस्कृति की जीत है, जो तमाम चुनौतियों के बावजूद अपनी अस्मिता और पहचान को बचाए हुए है। ये भी पढ़ें-भोजपुरी सिनेमा के ‘अमरीश पुरी’ के बारे में आप कितना जानते हैं?

परिवार के भरोसे से बनीं लोकसंस्कृति की आवाज़
बिहार के रोहतास जिले के एक साधारण परिवार में जन्मीं मनीषा बचपन से ही लोकगीतों और संगीत के माहौल में पली-बढ़ीं। उनकी मां, दादी और चाची पारंपरिक गीत गाती थीं, जिससे संगीत के प्रति उनका लगाव बढ़ता गया।
उनके दादाजी ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और मंच तक पहुंचाया, जबकि पिता ने समाज के विरोध के बावजूद उन्हें प्रयागराज भेजकर संगीत शिक्षा दिलाई। वर्ष 2016 में सुमित श्रीवास्तव से विवाह के बाद भी उन्हें परिवार का पूरा सहयोग मिला, जिसने उनके कलात्मक सफर को नई उड़ान दी।
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भोजपुरी लोकसंगीत की नई पहचान
मनीषा श्रीवास्तव ने शास्त्रीय संगीत की शिक्षा प्राप्त करने के बाद भोजपुरी लोकसंगीत को अपना जीवन मिशन बनाया। उन्होंने प्रयाग संगीत समिति, प्रयागराज से ‘संगीत प्रभाकर’ की उपाधि हासिल की और चैता, कजरी, सोहर, बिरहा, निर्गुण, झूमर, होरी सहित कई पारंपरिक लोकविधाओं को मंच और डिजिटल माध्यमों तक पहुंचाया।
जब भोजपुरी संगीत उद्योग में अश्लील और द्विअर्थी गीतों का प्रभाव बढ़ रहा था, तब मनीषा ने संस्कार आधारित और साफ-सुथरे गीतों को अपनी पहचान बनाया। उनके लोकगीत और सांस्कृतिक प्रस्तुतियां युवाओं के बीच भी लोकप्रिय हुईं। सोशल मीडिया पर उनके लाखों प्रशंसक हैं, जो उनके गीतों के माध्यम से भोजपुरी संस्कृति और अपनी जड़ों से जुड़ाव महसूस करते हैं। मनीषा श्रीवास्तव ने साबित कर दिया है कि भोजपुरी की असली ताकत अश्लीलता नहीं, बल्कि उसकी लोक परंपरा, संस्कृति, संस्कार और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत है।


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