जब भोजपुरी भाषा का अपमान हो रहा था, तब आप कहाँ थे?

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कुमार अजय सिंह, गीतकार / कहानीकार, आरा (बिहार)

भोजपुरी सिर्फ एक भाषा नहीं है। यह करोड़ों लोगों की पहचान, संस्कृति, संवेदना और आत्मा की आवाज है। यह भाषा मां की लोरी में बसती है, खेत-खलिहान की मिट्टी में महकती है और गांव-समाज की आत्मीयता को जीवित रखती है। भोजपुरी में लोकजीवन की मिठास है, रिश्तों की गर्माहट है और भारतीय संस्कृति की गहरी जड़ें हैं।

लेकिन आज बहुत दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि कुछ लोगों ने इस पवित्र भाषा को सस्ते मनोरंजन का माध्यम बना दिया है। गीत के नाम पर गाली, मनोरंजन के नाम पर अश्लीलता और संस्कृति के नाम पर फूहड़पन परोसा जा रहा है। सबसे दुखद बात यह है कि इसे ही भोजपुरी की आधुनिक कला और लोकप्रियता बताया जा रहा है।

सवाल यह है कि क्या यही भोजपुरी की असली पहचान है? क्या वह भाषा, जिसने भिखारी ठाकुर, महेंद्र मिश्र और लोकसंस्कृति की महान परंपरा दी, आज केवल अश्लील गीतों तक सीमित रह जाएगी?

असल कलाकार वह होता है जो समाज को दिशा दे, संस्कार दे और आने वाली पीढ़ियों को बेहतर सोच दे। कलाकार समाज का दर्पण होता है। लेकिन आज कुछ लोग थोड़े से पैसे, लोकप्रियता और सोशल मीडिया के व्यूज के लिए अपनी ही भाषा और संस्कृति को नीलाम करने में लगे हैं। दुख तब और बढ़ जाता है जब समाज का एक वर्ग ऐसे कलाकारों को मंच देता है, उन्हें बुलाकर गांव-गांव, दुआर-दलान में कार्यक्रम करवाता है और इस फूहड़ता को मनोरंजन समझकर तालियां बजाता है।

यह विरोध किसी व्यक्ति विशेष से नहीं, बल्कि उस सोच से है जिसने भोजपुरी को बाजारू बना दिया है। अगर सुनने वाले अश्लीलता को स्वीकार करेंगे, तो गाने वाले भी वैसा ही परोसेंगे। इसलिए जिम्मेदारी केवल कलाकारों की नहीं, समाज की भी है।

आज भोजपुरी समाज को आत्ममंथन करने की जरूरत है। हमें तय करना होगा कि आने वाली पीढ़ी को कैसी भोजपुरी देनी है, संस्कारों वाली या अश्लीलता वाली? हमें यह समझना होगा कि भाषा का पतन केवल शब्दों का पतन नहीं होता, बल्कि संस्कृति और समाज के चरित्र का भी पतन होता है।

कुमार अजय सिंह अपनी पीड़ा को बेहद तीखे लेकिन सच्चे शब्दों में व्यक्त करते हैं-
“जइसन व्यास भड़ुआ बा, ओइसने सुनवइया बा,
दोष खाली ओकरे नइखे, कुकर्मी बोलवइया बा।”

इन पंक्तियों में समाज की सच्चाई छिपी है। अगर समाज गलत को बढ़ावा देगा, तो गलत करने वालों का साहस बढ़ेगा ही।

आज समय आ गया है कि भोजपुरी समाज जागे। साफ-सुथरे, पारिवारिक और सांस्कृतिक भोजपुरी गीत-संगीत को समर्थन दिया जाए। अश्लीलता फैलाने वालों का सामाजिक बहिष्कार हो। उन कलाकारों को सम्मान मिले जो भोजपुरी की गरिमा बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं।

भोजपुरी केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि हमारी विरासत है। यह हमारी मातृभाषा है, हमारी पहचान है। अगर आज भी हम चुप रहे, तो आने वाला इतिहास हमसे जरूर पूछेगा-
“जब भाषा का अपमान हो रहा था, तब आप कहाँ थे?”

अब समय बदलने का है।
आवाज उठाने का है।
भोजपुरी की अस्मिता बचाने का है।

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