विद्या निवास पांडेय बताते हैं कि कजरी के तीन रूप हैं शास्त्रीय, लोक और मॉर्डर्न
वाराणसी : भोजपुरी लोकसंगीत की समृद्ध परंपरा में कजरी एक ऐसा गीत-रूप है, जो सावन-भादो की फुहारों के साथ जनमानस की भावनाओं को शब्द और स्वर देता है। बारिश की रिमझिम, मिट्टी की सोंधी खुशबू और विरह-प्रेम की गहराई इन सबका सुंदर संगम है कजरी। विद्या निवास पांडेय द्वारा प्रस्तुत कजरी के तीन रूप इस लोकधारा की विविधता और गहराई को बेहद सहज ढंग से सामने लाता है।
राग और अनुशासन की गरिमा है शास्त्रीय कजरी
कजरी का पहला रूप शास्त्रीयता से जुड़ा है, जिसमें संगीत का गहन व्याकरण और रागों की मर्यादा दिखाई देती है। बनारस और मिर्जापुर की धरती पर विकसित इस शैली में ठुमरी और दादरा की छाया स्पष्ट नजर आती है। इस प्रकार की कजरी में गायन केवल भाव नहीं, बल्कि साधना भी है। स्वर, लय और ताल का संतुलन इसे उच्च कोटि का संगीत बनाता है। यहां कजरी सिर्फ लोकगीत नहीं, बल्कि मंचीय प्रस्तुति बन जाती है, जो श्रोताओं को गहरे संगीत अनुभव से जोड़ती है।
गांव की मिट्टी से जुड़ी संवेदनाएं लोक कजरी
दूसरा रूप है लोक कजरी, जो सीधे गांव-देहात की जीवनशैली से निकलकर आता है। इसमें न तो जटिल रागों का बंधन होता है और न ही किसी औपचारिकता का दबाव। यह कजरी खेत-खलिहानों, आंगन और चौपाल में गूंजती है। इसमें एक प्रवासी पति के लिए तरसती पत्नी का विरह, सावन की उमंग, और स्त्रियों के सामूहिक गान की आत्मीयता झलकती है। ढोलक, मंजीरा और हारमोनियम के साथ गाई जाने वाली यह शैली श्रोताओं को अपनेपन का एहसास कराती है। यही वजह है कि लोक कजरी आज भी जन-जन के दिल में बसी हुई है।
फ्यूजन और नए प्रयोग है आधुनिक कजरी
समय के साथ कजरी ने खुद को बदला है और आधुनिक रूप भी धारण किया है। आज कजरी में गिटार, कीबोर्ड, और डिजिटल बीट्स का प्रयोग हो रहा है. यह रूप युवाओं को आकर्षित करता है, जहां पारंपरिक बोल और धुनों को नए संगीत के साथ जोड़ा जाता है। हालांकि, इसमें मूल भावनाओं को बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती है। विद्या निवास पांडेय की प्रस्तुति यह बताती है कि आधुनिक कजरी तभी सफल है, जब वह अपनी जड़ों से जुड़ी रहे और नवाचार के साथ संतुलन बनाए।
सिर्फ गीत नहीं, एक सांस्कृतिक धरोहर
कजरी केवल एक गीत नहीं, बल्कि यह भोजपुरी समाज की भावनात्मक अभिव्यक्ति है। इसमें स्त्री मन की पीड़ा, प्रेम की मिठास और प्रकृति के साथ गहरा रिश्ता झलकता है। आज जब लोकसंगीत पर बाजारवाद का असर बढ़ रहा है, तब कजरी जैसी विधाओं को बचाए रखना बेहद जरूरी हो जाता है। इसके लिए कलाकारों, शोधकर्ताओं और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को मिलकर काम करना होगा। विद्या निवास पांडेय द्वारा प्रस्तुत कजरी के तीनों रूप यह साबित करते हैं कि यह परंपरा समय के साथ बदलते हुए भी अपनी मूल आत्मा को संजोए हुए है। कजरी दरअसल सावन की आवाज है जो हर बूंद के साथ दिल में उतरती है और हमें हमारी जड़ों से जोड़ती है।

