कोलकाता। मॉरीशस की सांस्कृतिक विद्वान और विचारक सरिता बूधू बुधवार को कोलकाता में आयोजित ‘गीत गवाई’ कार्यक्रम में शामिल हुईं। भोजपुरी की यह पारंपरिक विवाह-पूर्व रस्म यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल है। इस अंतरराष्ट्रीय मान्यता को दिलाने में बूधू की अहम भूमिका रही है। कार्यक्रम में उन्होंने इस परंपरा के सांस्कृतिक महत्व और इसकी वैश्विक पहचान पर विस्तार से चर्चा की।
भारत से जुड़ाव और शैक्षणिक पृष्ठभूमि
सरिता बूधू का भारत से गहरा रिश्ता रहा है। उन्होंने कोलकाता के लेडी ब्रैबोर्न कॉलेज से शिक्षा प्राप्त की और बाद में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) से हिंदी में स्नातकोत्तर और पीएचडी की। वे मॉरीशस के पूर्व प्रधानमंत्री हरीश बूधू की पत्नी हैं, लेकिन अपनी स्वतंत्र पहचान एक सांस्कृतिक विचारक और भाषा संरक्षक के रूप में स्थापित कर चुकी हैं।
भोजपुरी संरक्षण के लिए संस्थागत प्रयास
भोजपुरी भाषा और संस्कृति को जीवित रखने के उद्देश्य से उन्होंने 1982 में मॉरीशस भोजपुरी संस्थान की स्थापना की। यह संस्थान कार्यशालाएं आयोजित करता है, साहित्य प्रकाशित करता है और युवाओं को भाषा से जोड़ने का काम करता है। बूधू ने कहा, “भोजपुरी लोककथाओं, कहावतों, लोकगीतों और मौखिक परंपराओं से समृद्ध एक जीवंत भाषा है, जिसे संरक्षित करना हमारी जिम्मेदारी है।”
प्रवासी देशों में मजबूत सांस्कृतिक उपस्थिति
मॉरीशस और फिजी में भोजपुरी आज भी सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण आधार है। मॉरीशस में भारतीय मूल की आबादी 65% से अधिक है, जहां भोजपुरी को सरकारी मान्यता प्राप्त है। वहीं फिजी में भोजपुरी और अवधी से विकसित ‘फिजी हिंदी’ सामाजिक जीवन में रची-बसी है। विवाह, भजन और त्योहारों में इसकी झलक स्पष्ट दिखती है।
वैश्विक स्तर पर बढ़ती पहचान
विश्वभर में लगभग 20 करोड़ लोग भोजपुरी बोलते हैं। ‘गीत गवाई’ जैसी परंपराओं को यूनेस्को द्वारा मान्यता मिलना इस भाषा की वैश्विक स्वीकार्यता को दर्शाता है। सरिता बूधू ने युवाओं से अपील की कि वे अपनी भाषाई विरासत को सहेजें और इसे नई पीढ़ी तक पहुंचाने में सक्रिय भूमिका निभाएं।

