क्यों आज भी जीवंत है भिखारी ठाकुर की बिदेसिया शैली

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पटना/गोरखपुर: सावन की रात। गांव के खुले मैदान में हजारों लोग जमा हैं। ढोलक की थाप, मंजीरा की छनकार और भिखारी ठाकुर की आवाज गूंज रही है ‘बिदेसिया बाबा, हमार देश छोड़ के कहां चले…?’। प्यारी सुंदरी (नायिका) रो-रोकर अपने पति की प्रतीक्षा कर रही है, जो कलकत्ता कमाने गया है। एक ओर विरह की आग, दूसरी ओर शहर की चकाचौंध में फंसता पति। यह दृश्य सिर्फ नाटक नहीं, बल्कि भोजपुरी समाज की सदी पुरानी सामूहिक त्रासदी का जीवंत चित्रण है।
यह बिदेसिया शैली है भिखारी ठाकुर (1887-1971) द्वारा विकसित और लोकप्रिय बनाई गई भोजपुरी लोकनाट्य की अनोखी विधा, जो आज भी पूर्वांचल, बिहार और दुनिया भर के भोजपुरी डायस्पोरा में जीवित है। भिखारी ठाकुर को ‘भोजपुरी का शेक्सपियर’ कहने वाले महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने उनकी रचनाओं में लोकजीवन की गहरी समझ देखी। बिदेसिया शैली ने भोजपुरी लोकनाट्य को मात्र मनोरंजन से ऊपर उठाकर सामाजिक दस्तावेज बना दिया।

नाई से लोकनाट्य के सम्राट तक
भिखारी ठाकुर का जन्म 18 दिसंबर 1887 को बिहार के सारण जिले के कुतुबपुर (दियरा) गांव में एक गरीब नाई परिवार में हुआ। पिता दलसिंगार ठाकुर और माता शिवकली देवी। बचपन में उस्तरे के साथ गुजरा, लेकिन रामलीला देखकर उनका मन रंगमंच की ओर झुक गया। उन्होंने औपचारिक शिक्षा कम पाई, पर प्रकृति ने उन्हें स्वाभाविक प्रतिभा दी कविता, गायन, अभिनय, निर्देशन और नृत्य।
1917 के आसपास उन्होंने अपनी नाच मंडली बनाई। शुरू में रामलीला, रासलीला और बिरहा यात्रा से प्रभावित, उन्होंने लोक तत्वों को नया रूप दिया। ब्रिटिश काल में बिहार-पूर्वांचल में भारी माइग्रेशन (कलकत्ता, आसाम, बंगाल की फैक्टरियों में) चल रहा था। लाखों युवक घर छोड़कर कमाने जाते, पीछे स्त्रियां अकेली रह जातीं। भिखारी ठाकुर ने इसी यथार्थ को अपनी रचनाओं का केंद्र बनाया।

30 से अधिक रचनाएं कीं
उन्होंने कुल 30 से अधिक रचनाएं कीं, नाटक, गीत, भजन और खंडकाव्य। लेकिन बिदेसिया (लगभग 1917-1920 के आसपास रचित) उनकी सबसे प्रसिद्ध कृति बनी। मूलतः गुद्दर राय को बिदेसिया शैली का प्रवर्तक माना जाता है, लेकिन इसे अखिल भारतीय स्तर पर प्रतिष्ठा और पूर्ण रूप देने का श्रेय भिखारी ठाकुर को ही जाता है।

बिदेसिया शैली क्या है?
बिदेसिया शैली भोजपुरी लोकनाट्य की एक स्वतंत्र विधा है, जिसमें नाटक, संगीत, नृत्य, गीत और सामाजिक आलोचना का अद्भुत संगम है। यह पूरी तरह गीतात्मक (गीत-प्रधान) है। संवाद कम, गीत ज्यादा। हर भावना गीत के माध्यम से व्यक्त होती है।
मुख्य विशेषताएं:
गीतात्मकता:
नाटक के अधिकांश भाग गीतों में हैं। लोकछंद (सोहर, कजरी, बिरहा, बारहमासा, फाग, चैता) का प्रयोग। लोकसंगीत के सुर, ताल और लय का सहज मिश्रण है। वाद्ययंत्र में ढोलक, मंजीरा, हारमोनियम, सारंगी का उपयोग होता है।
लोकनृत्य: नृत्य बिदेसिया की प्राण शक्ति है। लौंडा नाच (पुरुष कलाकार स्त्री वेश में) की परंपरा भिखारी ठाकुर ने मजबूत की। तत्कालीन समाज में महिलाओं को मंच पर आने की अनुमति नहीं थी, इसलिए पुरुष ही नारी भूमिका निभाते थे।
मंच व्यवस्था: खुले मैदान या तीन तरफ से खुला मंच। दर्शक चारों ओर बैठते। सूत्रधार (कीर्तनिया शैली में) मंगलाचरण से शुरू करता — देवी-देवताओं की स्तुति, फिर समाज को संबोधित।
व्यंग्य और यथार्थवाद: हास्य, व्यंग्य और मार्मिकता का मिश्रण। सामाजिक कुरीतियों (दहेज, बाल विवाह, जातिवाद, माइग्रेशन) पर प्रहार।
लौंडा नाच: पुरुषों द्वारा स्त्री वेश में नृत्य, यह शैली बाद में विवादास्पद भी बनी, लेकिन भिखारी ठाकुर ने इसे आर्द्धनारीश्वर (शिव-पार्वती) के रूपक से न्यायोचित ठहराया।

बिदेसिया शैली में रंग-बिरंगे वेशभूषा, सरल मेकअप और लोक संसाधनों का उपयोग होता था। नाटक घंटों चलता, कभी रात भर भी। 1930-1970 के बीच भिखारी ठाकुर की मंडली आसाम, बंगाल और अन्य जगहों में टिकट पर प्रदर्शन करती थी।

बिदेसिया नाटक की कहानी एक सामूहिक त्रासदी
नाटक की कथा सरल लेकिन गहरी है: गांव का एक युवक (बिदेसिया), मझोला कद, गेहुआ रंग, खेतिहर मजदूर। साल में कुछ महीने ही काम मिलता है। उसकी शादी एक सांवली-सुंदर युवती (प्यारी सुंदरी) से होती है। गवना (द्विरागमन) के बाद दोनों में गहरा प्रेम। लेकिन गरीबी और बेरोजगारी के कारण पति कलकत्ता (कलकत्तावा) कमाने चला जाता है। घर में पत्नी विरह में तड़पती है ‘का से कहूं मैं दरदिया हो रामा, पिया परदेस गए…’। वह रोती-बिलखती, पड़ोसियों से पूछती है कि उसका पिया कैसा रहेगा। कलकत्ता में बिदेसिया की मुलाकात एक युवती (रखेलिन/दूसरी औरत) से होती है। वह उसकी चकाचौंध में फंस जाता है। उधर गांव में पत्नी अकेली, समाज की नजरों से डरती, पति की प्रतीक्षा करती रहती है। नाटक में बटोही (यात्री) का किरदार भी महत्वपूर्ण है, जो दोनों पक्षों की कहानी जोड़ता है। अंत में (कुछ संस्करणों में) पति लौटता है और परिवार मिलन होता है, लेकिन मुख्य संदेश पीड़ा और सामाजिक यथार्थ का है। यह कहानी भोजपुरी क्षेत्र के हर घर की कहानी थी जहां पति बिदेस जाता, पत्नी गांव में अकेली रह जाती। भिखारी ठाकुर ने इसे ‘सामूहिक त्रासदी’ का कलात्मक रूप दिया।

बिदेसिया शैली का सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव
बिदेसिया ने स्त्री-विमर्श, माइग्रेशन, गरीबी और परिवार विघटन जैसे मुद्दों को जन-जन तक पहुंचाया। भिखारी ठाकुर ने दहेज, बाल विवाह, विधवा जीवन (अन्य नाटकों में) पर भी प्रहार किया। यह शैली गिरमिटिया देशों (मॉरीशस, फिजी, ट्रिनिडाड, सूरिनाम) तक पहुंची। चटनी म्यूजिक और अन्य लोक रूपों को प्रभावित किया। आज भी यूट्यूब पर बिदेसिया के गीत करोड़ों व्यूज पाते हैं। 25वें भारत रंग महोत्सव में पटना के निर्माण कला मंच ने इसे प्रस्तुत किया। कुल 800 से अधिक प्रस्तुतियां हो चुकी हैं। आज माइग्रेशन (गल्फ, दिल्ली, मुंबई) और परिवार विघटन की समस्या उतनी ही प्रासंगिक है। बिदेसिया युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ सकता है।

विरासत और चुनौतियां
भिखारी ठाकुर की मृत्यु 10 जुलाई 1971 को हुई। उनकी रचनावली (1979 और 1986 में प्रकाशित) आज भी पढ़ी और मंचित होती है। चंदन तिवारी, कल्पना पटवारी जैसी आवाजें उनके गीतों को जीवित रखे हुए हैं।फिर भी शुद्ध बिदेसिया शैली अब दुर्लभ हो रही है। वाणिज्यिक भोजपुरी सिनेमा और बदलते मनोरंजन ने इसे प्रभावित किया। स्कूलों, विश्वविद्यालयों और सांस्कृतिक उत्सवों में इसे शामिल करने की जरूरत है।

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