पटना/गोरखपुर: सावन की पहली बारिश में खेतों के किनारे महिलाएं ढोलक थामे कजरी गा रही हैं कि ‘सावन मास बहार आयल रे, मोरा कजरी गावे के मन करे…’। दूर कहीं बिरहा गायक दो टोलियों में बारी-बारी सवाल-जवाब कर रहे हैं, विरह की आग में जलते प्रेमी की पीड़ा बयां करते हुए। भोजपुरी भाषी क्षेत्र यानी पूर्वी उत्तर प्रदेश, पश्चिमी बिहार और झारखंड के गांवों में लोकगीत सिर्फ गीत नहीं, बल्कि जीवन का दर्पण हैं। ये गीत लिखे नहीं जाते, बल्कि जिए जाते हैं। सदियों पुरानी मौखिक परंपरा आज भी मिट्टी की खुशबू, मजदूरों की पसीने की महक और महिलाओं की चुप्पी टूटती भावनाओं को जीवंत रखे हुए है।
प्राचीन मगध काल से जुड़ीं भोजपुरी लोकगीत की जड़ें
भोजपुरी लोकगीत की जड़ें प्राचीन मगध काल तक जाती हैं। ये गीत मौखिक परंपरा में पनपे, इसलिए लिखित इतिहास कम है। लेकिन 19वीं सदी के अंत में महेंद्र मिश्र (1886) और भोजपुरी लोकनाटक के शेक्सपियर कहे जाने वाले भिखारी ठाकुर (1887) ने इन्हें दर्ज किया। भिखारी ठाकुर का ‘बिदेसिया’ आज भी माइग्रेशन की पीड़ा का सबसे मार्मिक दस्तावेज है -‘बिदेसिया बाबा, हमार देश छोड़ के कहां चले…?”। स्वतंत्रता संग्राम 1857 में भी इन गीतों ने राष्ट्रवादी भावना जगाई। कृष्ण देव उपाध्याय जैसे विद्वानों ने इन्हें वैज्ञानिक ढंग से वर्गीकृत किया।
भोजपुरी लोकगीतों के प्रमुख प्रकार
विद्वान कृष्ण देव उपाध्याय ने भोजपुरी लोकगीतों को पांच श्रेणियों में बांटा है जैसे कि संस्कार-रिवाज, तिहुआर-व्रत, समुदाय, मौसमी और कामकाज संबंधी। इनके अलावा अन्य विविध रूप भी हैं।
- संस्कार गीत (जीवन-चक्र से जुड़े)
सोहर- पुत्र जन्म पर महिलाएं गाती हैं। ‘सोहरिया गावत बाड़ी सासु मां, ननदिया गावत बाड़ी…’। यह गीत आशा, आशीर्वाद और परिवार की खुशी का प्रतीक है।
विवाह गीत –विदाई, कंगना, बरात स्वागत। विदाई गीत में बेटी की ममता और मां की आंखों में आंसू स्पष्ट दिखते हैं -‘अब हमार बेटी पराया घर चली…’। - त्योहार-व्रत गीत
छठ गीत- सूर्य भगवान को अर्घ्य देते समय। ठेकुआ बनाते हुए महिलाएं गाती हैं।
होली गीत- फागुन में फाग और फगुआ। करवा चौथ, जितिया, सतुवानी -इनमें व्रत रखने वाली महिलाओं की भक्ति और संकल्प गूंजता है। - मौसमी गीत-कजरी- सावन-भादों में। मेघों की बरसात और प्रेम की उमंग। ‘कजरिया नाचे रे, मोरा अंगना में…’। चैता-गर्मी में। फाग -बसंत में। बारहमासा -पूरे साल के मौसम और विरह को 12 महीनों में बांटकर गाया जाता है।
- समुदाय और जातीय गीत
बिरहा-अहीर समुदाय का प्रमुख गीत। दो दल बारी-बारी गाते हैं, सवाल-जवाब और व्यंग्य के साथ। ‘बिरहा गावत बाड़े बल्लू यादव, पारस यादव…’। यह प्रेम-विरह का गीत है, लेकिन सामाजिक मुद्दों पर भी कटाक्ष करता है। झूमर/झूमर-नृत्य गीत। डोमकच, जाट-जाटनी, थारी- विभिन्न जातियों के नृत्य गीत। - कामकाज गीत
खेतिहर मजदूरों के गीत -जुताई, रोपाई, कटाई के समय।
फरुवाही (फरी नाच) -नृत्य के साथ।
कहरुआ गीत -डोली ढोने वाले कहारों का। ये गीत थकान भुलाते और एकजुटता बढ़ाते थे। इन गीतों में सरल भाषा, दोहा-चौपाई छंद और कहरवा ताल प्रमुख है।
वाद्ययंत्र- ढोलक, हारमोनियम, सारंगी, मंजीरा, बांसुरी और कभी-कभी अल्गोजा।
सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व
भोजपुरी लोकगीत समाज का आईना हैं। ये महिलाओं की दुनिया बयां करते हैं, सास-बहू के रिश्ते, पति के बिदेस (माइग्रेशन) की पीड़ा, दहेज प्रथा, शिक्षा की कमी। अशोक सिंह यादव जैसे शोधकर्ता बताते हैं कि स्त्री-लोकगीतों में औरत की दुनिया का विमर्श साफ झलकता है। बिदेसिया गीत माइग्रेशन की वेदना को अमर कर देते हैं कि लाखों भोजपुरी पुरुष दिल्ली, मुंबई या खाड़ी देश जाते हैं, तो घर में औरतें इन गीतों से दर्द साझा करती हैं।
ये गीत पर्यावरण चेतना भी जगाते हैं -नदियों, कुओं और प्रकृति को ईश्वर से जोड़कर। सामाजिक व्यंग्य, जाति-धर्म की एकता और मजदूरों की मेहनत इनकी आत्मा हैं। 1857 की क्रांति से लेकर आज के चुनावी गीतों तक, ये राजनीतिक चेतना भी जगाते रहे।
प्रसिद्ध गायक और वर्तमान स्वरूप
स्वर्गीय शारदा सिन्हा-भोजपुरी लोकगीत की रानी, पद्म श्री सम्मानित। कजरी, सोहर और छठ गीतों की अमर आवाज।
स्वर्गीय भिखारी ठाकुर- बिदेसिया के जनक। मदन राय, गोपाल राय, भारत शर्मा -पारंपरिक गायक। आधुनिक पीढ़ी में कल्पना पटवारी, चंदन तिवारी, मालिनी अवस्थी ने इन्हें नया रूप दिया।
आज डिजिटल युग में लोकगीत नई चुनौती और अवसर दोनों का सामना कर रहे हैं। यूट्यूब, इंस्टाग्राम और टिकटॉक पर पुराने गीत करोड़ों व्यूज पा रहे हैं। युवा गायक पारंपरिक ताल में आधुनिक बीट मिला रहे हैं। लेकिन वाणिज्यिक भोजपुरी फिल्मी गीतों ने शुद्ध लोकगीत को पीछे धकेल दिया है। फिर भी सरकारी प्रयास हैं कि सांस्कृतिक विभाग के लोक उत्सव, झारखंड-बिहार-यूपी में लोकगीत महोत्सव और स्वयं सहायता समूहों के जरिए महिलाओं को प्रशिक्षण-विरासत को बचाने में लगे हैं।
संरक्षण की चुनौती और संभावना
शहरीकरण, माइग्रेशन और मोबाइल संस्कृति ने गांवों में गीत गाने की परंपरा कम कर दी। युवा पीढ़ी ‘ओल्ड इज गोल्ड’ समझ रही है, लेकिन रोजमर्रा में भूल रही है। फिर भी उम्मीद है। स्कूलों में लोकगीत शिक्षा, ऑडियो-वीडियो संग्रहालय और डिजिटल आर्काइव (जैसे विकिपीडिया और यूट्यूब चैनल) इसे जीवित रख सकते हैं। भोजपुरी लोकगीत सिर्फ संगीत नहीं, बल्कि हमारी पहचान, संघर्ष और आशा का दस्तावेज हैं। जब कोई किसान खेत में गुनगुनाता है या कोई मां सोहर गाकर बच्चे को सुलाती है, तब सदियों पुरानी मिट्टी बोल उठती है। आज के तेज भागते समय में इन गीतों को अपनाना हमारी जड़ों से जुड़ने का सबसे सुंदर तरीका है।
अगली बार सावन आए तो कजरी सुनिए, या बिदेसिया की पीड़ा महसूस कीजिए। ये गीत हमें याद दिलाते हैं कि हम कितने भी आगे बढ़ जाएं, हमारी कहानी हमेशा इन स्वरों में बसी रहेगी।

