भोजपुरी सिनेमा के जनक नजीर हुसैन की जयंती पर विशेष
आज हम भोजपुरी सिनेमा के जनक कहे जाने वाले अभिनेता, लेखक और पटकथा लेखक नजीर हुसैन की जयंती मना रहे हैं। नजीर हुसैन ने अपने जीवन में भोजपुरी भाषा, लोकसंस्कृति और ग्रामीण जीवन को बड़े पर्दे पर लाने का काम किया। उस समय, जब क्षेत्रीय भाषाओं के सिनेमा को गंभीरता से नहीं लिया जाता था, नजीर हुसैन ने भोजपुरी फिल्म बनाने का सपना देखा और उसे हकीकत में बदल दिया। उनका सबसे बड़ा योगदान यह था कि उन्होंने 1963 में रिलीज हुई पहली भोजपुरी फिल्म ‘गंगा मैया तोहे पियरी चढ़ईबो’ के जरिए इस भाषा को राष्ट्रीय पहचान दिलाई।
यह फिल्म न केवल एक सिनेमाई उपलब्धि थी, बल्कि भोजपुरी समाज और उसकी संस्कृति का सम्मान भी थी। इसे दर्शकों और आलोचकों ने सराहा, और इसने भोजपुरी सिनेमा की नींव रखी।
भोजपुरी सिनेमा के ‘जनक’ नजीर हुसैन का जन्मदिन 15 मई को होता है। भोजपुरी सिनेमा की शुरुआत 1963 में बनी फिल्म ‘गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो’ (Ganga Maiya Tohe Piyari Chadhaibo) से मानी जाती है। इस फिल्म की परिकल्पना और निर्माण के पीछे नजीर हुसैन का ही दिमाग था। देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने उन्हें अपनी मातृभाषा भोजपुरी में फिल्म बनाने की प्रेरणा दी थी।
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लता मंगेशकर ने गाया पहला भोजपुरी गीत
बहुत कम लोग जानते हैं कि इस फिल्म का पहला गीत गाने के लिए स्वर कोकिला लता मंगेशकर शुरू में तैयार नहीं थीं। उस समय तक लता जी हिंदी सिनेमा की सबसे प्रतिष्ठित गायिका बन चुकी थीं और उनके पास अनेक ऑफर थे। नजीर हुसैन चाहते थे कि भोजपुरी की पहली फिल्म की आवाज भी उतनी ही प्रतिष्ठित और मधुर हो।
जब लता जी सीधे तौर पर गाने के लिए तैयार नहीं हुईं, तब नजीर हुसैन ने देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद से मदद मांगी। बिहार और भोजपुरी संस्कृति से गहरा लगाव रखने वाले राष्ट्रपति ने स्वयं लता मंगेशकर से अनुरोध किया। उनके आग्रह को ठुकराना लता जी के लिए संभव नहीं था और उन्होंने फिल्म के प्रसिद्ध गीत ‘हे गंगा मैया तोहे पियरी चढ़ईबो’ की आवाज दी।
इस गीत ने सिर्फ फिल्म का मोड़ नहीं बदला, बल्कि भोजपुरी सिनेमा के इतिहास का एक ऐतिहासिक क्षण भी रच दिया। बाद में फिल्म के अन्य गीतों में मोहम्मद रफी ने भी अपनी आवाज दी, जिससे संगीत का समग्र अनुभव और भी यादगार बन गया।
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नजीर हुसैन, भोजपुरी सिनेमा के सांस्कृतिक शिल्पकार
नजीर हुसैन सिर्फ अभिनेता या लेखक नहीं थे, बल्कि एक दूरदर्शी सिनेमा प्रेमी और सांस्कृतिक योद्धा भी थे। उन्होंने साबित किया कि गांव, लोकभाषा और लोकजीवन भी सिनेमा के लिए मजबूत विषय हो सकते हैं। उस दौर में जब भोजपुरी को सीमित क्षेत्रीय भाषा माना जाता था, नजीर हुसैन ने उसे बड़े पर्दे पर राष्ट्रीय पहचान दिलाने का काम किया।

उनकी लिखी और अभिनीत फिल्मों में न केवल मनोरंजन था, बल्कि समाज की झलक, लोकसंस्कृति और ग्रामीण संवेदनाओं का सजीव चित्रण भी था। उनके प्रयासों ने यह साबित किया कि भोजपुरी सिनेमा सिर्फ क्षेत्रीय मनोरंजन नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक आंदोलन भी है।
भोजपुरी सिनेमा का स्वर्णिम सफर
‘गंगा मैया तोहे पियरी चढ़ईबो’ की सफलता ने भोजपुरी सिनेमा का स्वर्णिम सफर शुरू किया। इसके बाद कई प्रसिद्ध फिल्में बनीं जैसे ‘भतीजवा’, ‘हमार भूत’, ‘सजनवा बिदेश चल’, जिन्होंने दर्शकों का दिल जीता।
आज भोजपुरी सिनेमा केवल भारत के पूर्वी क्षेत्रों तक सीमित नहीं है। इसके गीत और फिल्में कनाडा, अमेरिका, ब्रिटेन, मॉरीशस और फिजी सहित दुनिया के कई देशों में देखी और सुनी जाती हैं। यह सब नजीर हुसैन की दूरदृष्टि और उनके जुनून का परिणाम है।
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लता मंगेशकर का अमिट योगदान
28 सितंबर 1929 को इंदौर में जन्मीं लता मंगेशकर ने भारतीय संगीत जगत को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। उन्होंने हिंदी, भोजपुरी, मराठी, बंगाली, तमिल, तेलुगू सहित कई भाषाओं में हजारों गीत गाए। उनकी आवाज भारतीय सिनेमा की पहचान बन गई।

भोजपुरी सिनेमा के इतिहास में यह किस्सा हमेशा याद रखा जाएगा कि देश के प्रथम राष्ट्रपति के आग्रह पर भारत की महान गायिका ने भोजपुरी की पहली फिल्म को आवाज दी। 6 फरवरी 2022 को 92 वर्ष की उम्र में उनका निधन हुआ, लेकिन उनकी मधुर आवाज आज भी करोड़ों दिलों में जीवित है।
नजीर हुसैन की विरासत
नजीर हुसैन ने साबित किया कि सिनेमा केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक संदेश का उपकरण भी हो सकता है। उन्होंने भोजपुरी समाज की भाषा, परंपरा और संवेदनाओं को बड़े पर्दे पर जीवित किया।
आज, जब भोजपुरी फिल्में और उनके गीत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान पा रहे हैं, तब नजीर हुसैन की याद दिलाती है कि किस तरह एक व्यक्ति के साहस और जुनून ने पूरी भाषा और संस्कृति को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रस्तुत किया।
उनकी जयंती पर हमें न केवल उनके योगदान को याद करना चाहिए, बल्कि यह भी समझना चाहिए कि भोजपुरी सिनेमा की सफलता का आधार उनके सांस्कृतिक दृष्टिकोण और समर्पण में निहित है।

