परंपरा और पर्व का अनोखा संगम चिक्का, परंपरा अब यादों में सिमटती हुई

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गोरखपुर: पूर्वांचल के गांवों में नाग पंचमी केवल धार्मिक आस्था का पर्व नहीं, बल्कि लोकजीवन के उत्सव का प्रतीक हुआ करता था। इस दिन मंदिरों में दूध और लावा चढ़ाने के बाद गांव के युवा एक स्थान पर एकत्रित होते और चिक्का खेल के साथ दिनभर का उत्सव शुरू हो जाता। यह खेल केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि गांव की सामाजिक एकता, सामूहिक ऊर्जा और परंपरा का जीवंत प्रदर्शन था, जिसमें हर वर्ग के लोग सहभागी बनते थे।

इतिहास और लोकजीवन से गहरा रिश्ता
चिक्का खेल का कोई औपचारिक लिखित इतिहास भले उपलब्ध न हो, लेकिन यह पीढ़ियों से लोक परंपरा के रूप में जीवित रहा है। पूर्वांचल और बिहार के आसपास के क्षेत्रों में लगभग 30-40 वर्ष पहले तक यह खेल नाग पंचमी का प्रमुख आकर्षण हुआ करता था। फसल कटाई के बाद या विशेष पर्वों पर ऐसे खेल ग्रामीण जीवन में उत्साह भरते थे। बुजुर्गों से सीखकर युवा और फिर बच्चे इसे अपनाते थे, जिससे यह परंपरा बिना किसी किताब या नियमावली के पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रही।

खेल के नियम और रोमांच
चिक्का खेल टीम भावना और शारीरिक कौशल का अनूठा संगम है। इसमें आमतौर पर 14 खिलाड़ी होते हैं, 7 एक बड़े गोल घेरे के अंदर और 7 बाहर। बाहर के खिलाड़ी अंदर वालों को खींचकर बाहर निकालने की कोशिश करते हैं, जबकि अंदर के खिलाड़ी खुद को बचाते हुए मौका मिलने पर पैर से टच करके विरोधी को आउट करते हैं। यह खेल देखने में जितना सरल लगता है, उतना ही चुनौतीपूर्ण होता है। इसमें ताकत, संतुलन, रणनीति और फुर्ती का बेहतरीन तालमेल देखने को मिलता है, जो इसे बेहद रोमांचक बनाता है।

सांस्कृतिक रंग और रोचक परंपराएं
चिक्का खेल केवल एक खेल नहीं, बल्कि एक पूर्ण सांस्कृतिक आयोजन हुआ करता था। खेल शुरू होने से पहले धार्मिक अनुष्ठान होते थे और इसके बाद पूरे गांव में उत्सव जैसा माहौल बन जाता था। सैकड़ों दर्शक इसे देखने जुटते थे, जिससे वातावरण मेले जैसा हो जाता था। खेल समाप्त होने के बाद खिलाड़ी पास के तालाब या नदी में सामूहिक स्नान करते और फिर घरों में बने पारंपरिक पकवानों जैसे पूड़ी, खीर और दही का आनंद लेते थे। यह पूरा क्रम सामाजिक जुड़ाव और आनंद का अद्भुत उदाहरण था।

क्यों विलुप्त हो रहा है यह खेल?
समय के साथ चिक्का खेल धीरे-धीरे विलुप्त होता जा रहा है। आज के युवाओं के पास समय की कमी है और उनका झुकाव मोबाइल और डिजिटल गेम्स की ओर अधिक हो गया है। जिन स्थानों पर पहले यह खेल खेला जाता था, वहां अब पक्के मकान बन गए हैं, जिससे खुले मैदानों की कमी हो गई है। साथ ही, यह खेल कुछ हद तक जोखिम भरा भी माना जाता है, जिससे अभिभावक बच्चों को इससे दूर रखने लगे हैं। इन सभी कारणों ने मिलकर इस परंपरा को लगभग समाप्ति के कगार पर पहुंचा दिया है।

पुनर्जीवन की जरूरत और भविष्य की राह
आज आवश्यकता है कि ऐसे पारंपरिक खेलों को पुनर्जीवित किया जाए। स्कूलों में पारंपरिक खेल दिवस आयोजित कर बच्चों को इससे परिचित कराया जा सकता है। पंचायत और स्थानीय प्रशासन मिलकर गांवों में खेल प्रतियोगिताएं आयोजित कर सकते हैं। मीडिया भी इन खेलों को नई पहचान देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। यदि समय रहते प्रयास किए जाएं, तो चिक्का जैसे खेल न केवल फिर से जीवंत हो सकते हैं, बल्कि नई पीढ़ी को शारीरिक रूप से मजबूत और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध बनाने में भी मददगार साबित होंगे।

कुल मिलकार चिक्का खेल केवल एक खेल नहीं, बल्कि हमारी ग्रामीण संस्कृति की अमूल्य धरोहर है। यह हमें सिखाता है कि असली आनंद सामूहिकता, सादगी और परंपरा में छिपा होता है। आज जरूरत है इसे बचाने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने की, ताकि आने वाले समय में यह केवल यादों तक सीमित न रह जाए, बल्कि फिर से गांवों की मिट्टी में जीवंत हो उठे।

बाबा भोजपुरिया
बाबा भोजपुरियाhttp://bhojpuri24.com
पत्रकारिता में करीब 20 वर्षों का अनुभव है। भोजपुरी भाषा और संस्कृति को लेकर बेहद संवेदनशील हैं। भोजपुरी संस्कृति, भाषा, खानपान, पहनावे और लोकगीतों के संरक्षण व संवर्धन के लिए लगातार प्रयासरत रहते हैं।

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