‘डोली’ को देवी स्वरूप माना जाता था और उसे उठाने वाले कहारों को भी शुभ कार्य का सहभागी समझा जाता था।
यह कहानी सिर्फ कहारों की नहीं, बल्कि उस भारत की है जो बदल रहा है और बदलते हुए कहीं अपनी जड़ों को पीछे छोड़ रहा है।
गोरखपुर/पटना– पूर्वांचल और बिहार के अधिकांश गांवों में कभी जीवन की धडक़न कंधों पर चलती थी। यह धडक़न थे कहार। आज जब आधुनिकता ने हर परंपरा को नई दिशा दी है, तब कहारों का यह पेशा धीरे-धीरे समाप्ति की ओर बढ़ रहा है। यह सिर्फ एक समुदाय का बदलाव नहीं, बल्कि भारतीय लोक-संस्कृति के एक महत्वपूर्ण अध्याय का धुंधलाना है।
श्रम से सम्मान तक की यात्रा
कहार समुदाय का उल्लेख प्राचीन भारतीय समाज में ‘सेवक वर्ग’ के रूप में मिलता है। मध्यकालीन भारत में, खासकर मुगल और राजपूत काल में, कहारों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण थी। राजा-महाराजाओं की पालकी (पलकी) उठाने का कार्य कहार ही करते थे। इतिहासकारों के अनुसार, 16वीं से 19वीं शताब्दी तक उत्तर भारत में पालकी परिवहन का प्रमुख साधन था। बनारस, गोरखपुर, आजमगढ़ और बलिया के साथ समस्त बिहार में कहारों की बड़ी आबादी थी।
ब्रिटिश काल (18वीं-19वीं सदी) में भी कहारों का व्यापक उपयोग हुआ। ब्रिटिश अफसरों की यात्रा भी इन्हीं के कंधों पर निर्भर थी। 1820 के दशक के दस्तावेजों में बंगाल और उत्तर प्रदेश क्षेत्र में हजारों कहारों के होने का उल्लेख मिलता है।
पौराणिक संदर्भ और परंपरा की जड़ें
भारतीय पौराणिक कथाओं में भी ‘वाहन’ और ‘वहन करने वालों’ का उल्लेख मिलता है। भगवान राम के वनवास के समय, विभिन्न समुदायों ने सेवा कार्य किए-इसे सामाजिक सहयोग का प्रतीक माना जाता है। कई लोककथाओं में विवाह के समय दुल्हन को ‘डोली’ में ले जाने की परंपरा को पवित्र संस्कार बताया गया है, जिसमें कहारों को विशेष सम्मान दिया जाता था। ‘डोली’ को देवी स्वरूप माना जाता था और उसे उठाने वाले कहारों को भी शुभ कार्य का सहभागी समझा जाता था।
सामाजिक संरचना में भूमिका
पहले गांवों में कहार सिर्फ मजदूर नहीं, बल्कि सामाजिक जीवन का अभिन्न हिस्सा थे। शादी-ब्याह, जन्म, मृत्यु हर संस्कार में उनकी भागीदारी होती थी।
दुल्हन की विदाई में कहारों का विशेष महत्व था, बिना कहार डोली अधूरी मानी जाती थी। वे जल-सेवा (घरों में पानी पहुंचाना) और सामुदायिक कार्यों में भी सक्रिय रहते थे।
लोकगीतों में भी कहारों की झलक मिलती है जैसे- कहारवा धीरे चलह्य, साजन के अंगना जाए के बाज्, ये गीत सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि उस दौर की सामाजिक संवेदनाओं का दस्तावेज हैं।
बदलती हकीकत
समय के साथ तकनीकी विकास ने इस पेशे को लगभग खत्म कर दिया है। 1950 के बाद सडक़ों और वाहनों के विस्तार ने पालकी प्रथा को तेजी से समाप्त किया। 2011 की जनगणना के अनुसार, कहार (या संबंधित उपजातियां) अब मुख्यत: अन्य कार्यों में लग चुकी हैं जैसे कृषि, मजदूरी, छोटे व्यवसाय। आज पूर्वांचल के साथ बिहार के अधिकांश जिलों में डोली प्रथा केवल प्रतीकात्मक रह गई है, वह भी कुछ ग्रामीण या पारंपरिक आयोजनों तक सीमित है।
डोली गीत
डोली ले चलS कहारवा धीरे-धीरे हो,
नैना से बहे ला नीर, ससुरे के ओर हो…
माय के अंचरा छोड़े के पड़ल आज हो,
बाबुल के आंगन हो गइल सून आज हो…
धीरे-धीरे कदम बढ़ावS हो कहारवा,
टूटत बा मन के हर एक तारवा…
चारो कहारवा कंधा सम्हारS के,
लइके चलS बिटिया ससुरारS के…
रोवत बाड़ी बहिनी, रोवे लागल माई,
बाबुल खड़ा सोचत, बिटिया पराई हो गई…
चिरई के जइसे उड़े लागी आज हो,
नया घर-आंगन में सजाई साज हो…
डोली के संग-संग जाए असीसवा,
सुखी रहे साजन संग हर एक दीसवा…
परंपरा से दूरी, अवसर की तलाश
कहार समाज की नई पीढ़ी अब शिक्षा और आधुनिक रोजगार की ओर बढ़ रही है। युवा अब सरकारी नौकरियों, निजी क्षेत्र और व्यापार में अपनी पहचान बना रहे हैं। पारंपरिक पेशा अब आर्थिक रूप से व्यवहारिक नहीं रहा, इसलिए इसे छोडऩा समय की जरूरत बन गया। यह बदलाव सकारात्मक भी है, लेकिन इसके साथ एक सांस्कृतिक क्षति भी जुड़ी है।

सिर्फ पेशा नहीं, पहचान का सवाल
कहारों के साथ-साथ उनसे जुड़ी लोक-संस्कृति भी खत्म हो रही है। डोली गीत, पारंपरिक रस्में और सामूहिकता का भाव अब कम होता जा रहा है।
गांवों में पहले जो भावनात्मक जुड़ाव था, वह आधुनिक जीवनशैली में कमजोर पड़ा है। इस परंपरा को पूरी तरह समाप्त होने से बचाने के लिए कुछ प्रयास जरूरी हैं जैसे लोक-संस्कृति पर आधारित शोध और दस्तावेजीकरण, स्कूल-कॉलेजों में स्थानीय इतिहास का समावेश, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और फिल्मों में कहार परंपरा को स्थान देना आदि।
अंत में यही कहा जा सकता है कहार सिर्फ एक जाति या पेशा नहीं थे, बल्कि भारतीय समाज के उस दौर का प्रतीक थे, जब श्रम, सम्मान और परंपरा एक साथ चलते थे। आज भले ही उनके कंधों से डोली उतर गई हो, लेकिन उनकी विरासत अब भी हमारी संस्कृति के कंधों पर टिकी हुई है।

