आचार्य शिवपूजन सहाय, जिन्होंने भोजपुरी साहित्य को दिया नया आधार और सम्मान

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बाबा भोजपुरिया
Bhojpuri24.com की ‘भोजपुरी पुरोधा’ शृंखल में आज प्रस्तुत हैं भोजपुरी और हिंदी साहित्य के ऐसे महान आचार्य, जिन्होंने अपनी लेखनी, संपादन क्षमता और भाषा प्रेम से भोजपुरी साहित्य को नई दिशा दी। आचार्य शिवपूजन सहाय केवल हिंदी साहित्य के बड़े नाम नहीं थे, बल्कि भोजपुरी भाषा, लोकसंस्कृति और साहित्यिक चेतना के ऐसे संरक्षक थे, जिन्होंने भोजपुरी को सम्मानजनक स्थान दिलाने के लिए जीवनभर प्रयास किया।

भोजपुरी भाषा और साहित्य के विकास की चर्चा जब भी होगी, आचार्य शिवपूजन सहाय का नाम बड़े आदर के साथ लिया जाएगा। वे ऐसे साहित्यकार और पत्रकार थे, जिन्होंने भोजपुरी को केवल गांव-घर की बोलचाल की भाषा नहीं माना, बल्कि इसे लोकजीवन, संस्कृति और साहित्य की समृद्ध अभिव्यक्ति के रूप में देखा।

उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि किसी भाषा का विकास केवल किताबों से नहीं, बल्कि उसके प्रति समर्पण, शोध, संपादन और संगठनात्मक प्रयासों से होता है। भोजपुरी साहित्य को व्यवस्थित रूप देने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा।

बक्सर की माटी से निकलकर साहित्य जगत के आचार्य बने

आचार्य शिवपूजन सहाय का जन्म 9 अगस्त 1893 को बिहार के बक्सर जिले के इटाढ़ी प्रखंड के उनवास गांव में हुआ। ग्रामीण परिवेश में पले-बढ़े शिवपूजन सहाय के व्यक्तित्व में गांव की मिट्टी, लोकजीवन और भारतीय संस्कृति की गहरी छाप रही।

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प्रारंभिक शिक्षा गांव और स्थानीय स्तर पर पूरी करने के बाद वे उच्च शिक्षा के लिए आरा पहुंचे। बचपन से ही साहित्य और भाषा के प्रति उनकी रुचि दिखाई देने लगी थी। उन्होंने कठिन परिस्थितियों के बावजूद अपनी प्रतिभा और मेहनत से साहित्य जगत में अपनी अलग पहचान बनाई।

शिक्षक से पत्रकारिता तक का सफर

साल 1921 के आसपास आचार्य शिवपूजन सहाय हिंदी के अध्यापक बन चुके थे। लेकिन उनका मन केवल अध्यापन तक सीमित नहीं रहा। भाषा और समाज के प्रति उनकी चिंता उन्हें पत्रकारिता की ओर ले गई।

साल 1923 में उन्होंने पत्रकारिता क्षेत्र में कदम रखा। कलकत्ता से प्रकाशित प्रसिद्ध पत्रिका ‘मतवाला’ के संपादन से उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली। इसके बाद वे लखनऊ पहुंचे और प्रतिष्ठित पत्रिका ‘माधुरी’ के संपादक बने।

उनकी संपादकीय क्षमता, भाषा पर पकड़ और साहित्यिक दृष्टि ने हिंदी पत्रकारिता को नई ऊंचाई दी। उन्होंने अनेक पत्र-पत्रिकाओं में लेखन और संपादन के माध्यम से साहित्यिक पत्रकारिता को मजबूत आधार प्रदान किया।

मुंशी प्रेमचंद के साथ साहित्यिक संबंध

आचार्य शिवपूजन सहाय का साहित्यिक जीवन कई महान साहित्यकारों के संपर्क से समृद्ध हुआ। उनका संबंध महान कथाकार मुंशी प्रेमचंद से भी रहा। प्रेमचंद के साथ काम करने का अवसर उन्हें मिला और इससे उनके साहित्यिक अनुभवों को नई दिशा मिली।

उन्होंने साहित्य को केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं माना, बल्कि समाज की वास्तविक तस्वीर प्रस्तुत करने का माध्यम बनाया। यही कारण है कि उनकी रचनाओं में ग्रामीण जीवन, सामाजिक संवेदना और मानवीय भावनाओं का प्रभाव दिखाई देता है।

‘देहाती दुनिया’ से गांव की संस्कृति को मिली साहित्यिक पहचान

आचार्य शिवपूजन सहाय की प्रसिद्ध कृति ‘देहाती दुनिया’ हिंदी साहित्य की महत्वपूर्ण रचनाओं में शामिल है। इस पुस्तक में उन्होंने गांव के जीवन, वहां की समस्याओं, संस्कारों और लोक व्यवहार को बेहद संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया।

उनकी रचनाओं में गांव केवल पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि एक जीवंत पात्र के रूप में दिखाई देता है। यही विशेषता उन्हें अन्य साहित्यकारों से अलग बनाती है।

भोजपुरी भाषा और साहित्य के बड़े संरक्षक

हालांकि आचार्य शिवपूजन सहाय ने भोजपुरी में स्वतंत्र रूप से बहुत अधिक साहित्य नहीं लिखा, लेकिन भोजपुरी भाषा और साहित्य के विकास में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा।

बिहार राष्ट्रभाषा परिषद के माध्यम से उन्होंने भोजपुरी साहित्य के कई महत्वपूर्ण ग्रंथों के प्रकाशन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ‘भोजपुरी भाषा और साहित्य’ तथा ‘भोजपुरी के कवि और काव्य’ जैसी महत्वपूर्ण कृतियां भोजपुरी साहित्य के इतिहास में मील का पत्थर मानी जाती हैं। इन पुस्तकों के प्रकाशन ने भोजपुरी साहित्य को व्यवस्थित अध्ययन और शोध का आधार प्रदान किया।

भोजपुरी लेखन में दिखाई देती थी लोकभाषा की मिठास

आचार्य शिवपूजन सहाय की लेखनी में भोजपुरी संस्कृति की आत्मीयता और लोकजीवन की मिठास दिखाई देती है। उनकी प्रसिद्ध कहानी ‘कुंदन सिंह–केसर बाई’ भोजपुरी कथा साहित्य की चर्चित कहानियों में शामिल है।

उनकी भोजपुरी शैली में लोकजीवन की सहजता, भावनाओं की गहराई और भाषा की मिठास देखने को मिलती है।

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उनकी भाषा में भोजपुरी के मौसम, रिश्तों और प्रेम की अनुभूति जीवंत हो उठती है। यही कारण है कि उनकी रचनाएं आज भी पाठकों के बीच लोकप्रिय हैं।

‘भोजपुरी परिवार’ की स्थापना में निभाई महत्वपूर्ण भूमिका

भोजपुरी भाषा को संगठित मंच देने के उद्देश्य से साल 1959 में पटना में ‘भोजपुरी परिवार’ संस्था की स्थापना हुई।

इस संस्था के निर्माण में आचार्य शिवपूजन सहाय की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उनके साथ नर्मदेश्वर जी, अशांत जी, अविनाशचंद्र विद्यार्थी जी, सीतारामशरण जी और विष्णुदत्त मिश्र जैसे साहित्यकार जुड़े।

संस्था की पत्रिका ‘अंजोर’ के संपादन का दायित्व भी उन्होंने संभाला। इसके माध्यम से भोजपुरी साहित्य, भाषा और संस्कृति को नई पहचान मिली।

माटी से जुड़े रहे सरल और सहज व्यक्तित्व

आचार्य शिवपूजन सहाय जितने बड़े साहित्यकार थे, उतने ही सरल और सहज इंसान भी थे। उन्हें अपनी गांव की संस्कृति और मिट्टी से गहरा लगाव था।

एक बार बक्सर में ‘सरस्वती पुस्तकालय’ के उद्घाटन के लिए वे पहुंचे। लोग स्टेशन पर माला लेकर उनके स्वागत के लिए इंतजार कर रहे थे। लेकिन वे स्टेशन से उतरकर पहले गंगा स्नान करने गए और फिर सीधे कार्यक्रम स्थल पहुंचे।

जब लोगों ने स्वागत किया तो उन्होंने सहज भाव से कहा- “महाराज! घर के आदमी के भी पूजा होला?” यह वाक्य उनके विनम्र स्वभाव और अपनी जड़ों से जुड़े व्यक्तित्व को दर्शाता है।

पद्म भूषण से सम्मानित साहित्य साधक

साहित्य और भाषा के क्षेत्र में उनके अतुलनीय योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें वर्ष 1960 में पद्म भूषण सम्मान से सम्मानित किया। 21 जनवरी 1963 को पटना में उनका निधन हुआ, लेकिन भाषा और साहित्य के क्षेत्र में उनका योगदान आज भी जीवित है।

भोजपुरी अस्मिता के साहित्यिक प्रहरी

आचार्य शिवपूजन सहाय ने साबित किया कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि समाज की पहचान और संस्कृति की आत्मा होती है। उन्होंने भोजपुरी को सम्मान देने, उसके साहित्य को संरक्षित करने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आज जब भोजपुरी भाषा वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बना रही है, तब आचार्य शिवपूजन सहाय जैसे पुरोधाओं का योगदान और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। भोजपुरी साहित्य के इस महान आचार्य को Bhojpuri24.com परिवार की ओर से शत-शत नमन। 

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