भोजपुरी भाषा और साहित्य के आधार स्तंभ, पुरखा-पुरनिया आचार्य महेन्द्र शास्त्री जी की जयंती पर विनम्र श्रद्धांजलि
सारण: भोजपुरी की पहचान, सम्मान और विकास के लिए जिन महान व्यक्तित्वों ने अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया, उनमें आचार्य महेन्द्र शास्त्री का नाम अत्यंत आदर और गर्व के साथ लिया जाता है। वे केवल एक साहित्यकार नहीं थे, बल्कि एक जागरूक समाज सुधारक, शिक्षाविद और सच्चे देशभक्त भी थे। उनका मानना था कि भाषा का विकास ही समाज में चेतना, आत्मसम्मान और परिवर्तन का आधार बनता है।
16 अप्रैल 1901 को बिहार के सारण जिले के रतनपुरा गाँव में जन्मे आचार्य शास्त्री बचपन से ही मेधावी थे। उन्होंने संस्कृत, हिंदी और भोजपुरी तीनों भाषाओं पर समान अधिकार हासिल किया। उनके लिए भाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने का एक सशक्त उपकरण थी।
स्वतंत्रता आंदोलन में भी उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई। उनके लेखन और विचारों में देशभक्ति स्पष्ट झलकती है। वे मानते थे कि जब तक समाज अपनी भाषा को सम्मान नहीं देगा, तब तक सच्ची स्वतंत्रता अधूरी ही रहेगी। आचार्य महेन्द्र शास्त्री ने भोजपुरी को एक संगठित और साहित्यिक भाषा के रूप में स्थापित करने का महत्वपूर्ण कार्य किया। 1920 के दशक में जब भोजपुरी को केवल ‘घर-आंगन की भाषा’ समझा जाता था, तब उन्होंने इसे साहित्य, विचार और अभिव्यक्ति की सशक्त भाषा बनाने का अभियान शुरू किया।
उन्होंने पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से भोजपुरी को मंच दिया। ‘भोजपुरी’ नामक पत्रिका का संपादन कर उन्होंने इस भाषा को जन-जन तक पहुँचाया। उनके प्रयासों से भोजपुरी साहित्य को एक नई दिशा मिली और अनेक रचनाकारों को अपनी अभिव्यक्ति का मंच मिला। उनकी रचनाओं में समाज की वास्तविकता, लोकजीवन की सहजता, किसान-मजदूर के संघर्ष और आम आदमी की पीड़ा गहराई से दिखाई देती है। भकोलवा, हिलोर, चोखा, धोखा और आज की आवाज जैसी कृतियाँ भोजपुरी समाज का सजीव चित्र प्रस्तुत करती हैं। वे सरल भाषा में गूढ़ विचार प्रस्तुत करने की अद्भुत क्षमता रखते थे, जिससे हर वर्ग का व्यक्ति उनसे जुड़ पाता था।
उनका व्यक्तित्व भी उतना ही प्रभावशाली था जितनी उनकी लेखनी। अनुशासनप्रिय, स्पष्टवादी और कर्मठ जो भी उनके संपर्क में आता, प्रेरित हुए बिना नहीं रहता। उनका जीवन स्वयं एक संदेश था भाषा का सम्मान ही समाज का सम्मान है।
भोजपुरी आंदोलन के इतिहास में आचार्य शास्त्री का योगदान एक पूरे युग के रूप में देखा जाता है। आज भोजपुरी जिस पहचान के साथ साहित्य, सिनेमा और वैश्विक मंच पर उभर रही है, उसकी मजबूत नींव कहीं न कहीं उनके प्रयासों में ही निहित है। 31 दिसंबर 1974 को वे भले ही इस दुनिया से विदा हो गए, लेकिन उनके विचार, लेखन और संघर्ष आज भी भोजपुरी समाज को दिशा दे रहे हैं। आज आवश्यकता है कि हम उनके सपनों को आगे बढ़ाएँ भोजपुरी को केवल एक बोली नहीं, बल्कि गौरव, अस्मिता और पहचान की भाषा बनाएं।

