समीक्षक : राजेश भोजपुरिया
भोजपुरी भाषा की संवैधानिक मान्यता, उसके अस्तित्व, संघर्ष और इस दिशा में चल रहे वैचारिक मंथन पर आधारित महत्वपूर्ण पुस्तक ‘संविधान से दूर काहे भोजपुरी’ हाल ही में मेरे हाथों में आई। इस विचारोत्तेजक पुस्तक का संपादन श्री अजीत सिंह ‘कठौली’ और डॉ. राणा अवधूत कुमार ने किया है। सर्व भाषा ट्रस्ट, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक का प्रथम संस्करण वर्ष 2024 में आया था। यह पुस्तक भोजपुरी भाषा और संस्कृति की सेवा में दिन-रात जुटे तमाम संघर्षशील भोजपुरी प्रेमियों को समर्पित है।
भोजपुरी की संवैधानिक मान्यता पर गंभीर विमर्श
पुस्तक की विषय-सूची पर नजर डालने से स्पष्ट होता है कि इसमें भोजपुरी की संवैधानिक मान्यता से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण आलेखों, निबंधों, कविताओं और पत्राचारों को बेहद सुंदर ढंग से संकलित किया गया है। पुस्तक की शुरुआत संपादकीय ‘आखिर कब पूरी होगी भोजपुरी की आस!’ (डॉ. राणा अवधूत कुमार) और संपादक अजीत सिंह ‘कठौली’ की भूमिका ‘वजूद के लिए संघर्ष कर रही है भोजपुरी’ से होती है। ये दोनों रचनाएं पुस्तक के मूल उद्देश्य और वैचारिक पृष्ठभूमि को स्पष्ट करती हैं।
पुस्तक में भोजपुरी के कई प्रतिष्ठित विद्वानों और भाषा-साहित्य के जानकारों के आलेख शामिल हैं। इनमें चौधरी कन्हैया प्रसाद सिंह का ‘भोजपुरी की ताकत को समझने की जरूरत है’, डॉ. जौहर शफियावादी का ‘देश की अष्टम अनुसूची और भोजपुरी’, डॉ. ब्रजभूषण मिश्र का ‘भोजपुरी में बाधक तत्व और निदान’, डॉ. जयकांत सिंह ‘जय’ का ‘भोजपुरी आगे बढ़ेगी तो हिंदी होगी और सबल’, केशव मोहन पांडेय का ‘काहे संविधान से दूर रह गई भोजपुरी’, डॉ. संतोष पटेल का ‘भोजपुरी की मान्यता में बाधा, समस्या और समाधान’, डॉ. राजेश कुमार मांझी का ‘संविधान की आठवीं अनुसूची और भोजपुरी का दर्द’ तथा डॉ. सुनील कुमार पाठक का ‘भोजपुरी और हिंदी का मनमुटाव : कुछ हकीकत, कुछ फसाना’ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
इसके अलावा अभिषेक भोजपुरिया का ‘भाषाई आंदोलन और भोजपुरी जन जागरण अभियान’ भी इस विमर्श को व्यापक सामाजिक संदर्भ प्रदान करता है।
कनक किशोर, डॉ. अशोक द्विवेदी, सूर्यदेव पाठक ‘पराग’, डॉ. प्रेमशीला शुक्ल, अंकुश्री, चंद्रेश्वर, नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’, अजीत दुबे, अशोक अकेला, श्रीप्रकाश शुक्ल, प्रो. पृथ्वीराज सिंह, डॉ. प्रकाश उदय, मनोज भावुक, दीपक राय, एस. विजया शर्मा, विकास कुमार, उदय नारायण सिंह, डॉ. अजय ओझा, शिवानुग्रह नारायण सिंह, आकृति विज्ञा ‘अर्पण’ और स्यांदन सुमन सहित अनेक विद्वानों की रचनाएं पुस्तक को समृद्ध बनाती हैं।
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इन सभी आलेखों में भोजपुरी के अधिकार, संवैधानिक मान्यता, भाषाई अस्मिता और आंदोलन की चुनौतियों पर गंभीर विचार प्रस्तुत किए गए हैं। कहीं भोजपुरी की ताकत और व्यापकता को रेखांकित किया गया है, तो कहीं मान्यता की राह में आने वाली बाधाओं और उनके समाधान पर विचार किया गया है। हिंदी और भोजपुरी के आपसी संबंधों पर भी तार्किक विमर्श मिलता है, जो इस मुद्दे को केवल भाषाई विवाद के रूप में देखने के बजाय व्यापक सांस्कृतिक और संवैधानिक संदर्भ में समझने का अवसर देता है।
कविता और गीतों में भोजपुरी अस्मिता की आवाज
पुस्तक की विशेषता यह है कि इसमें गद्य के साथ-साथ काव्य खंड को भी पर्याप्त महत्व दिया गया है। डॉ. गोरख प्रसाद मस्ताना के भोजपुरी की संवैधानिक मान्यता से जुड़े तीनों गीत बेहद प्रभावशाली हैं। ये गीत भोजपुरी के अधिकारों के लिए चल रहे आंदोलन की आवाज बनकर उभरे हैं।
इसी तरह विपिन बिहारी चौधरी, राम बहादुर राय, कनक किशोर, कौशल मुहब्बतपुरी और लक्ष्मीकांत मुकुल की कविताएं और गीत भोजपुरी की अस्मिता, भाषा के प्रति प्रेम तथा संवैधानिक अधिकारों के संघर्ष को धारदार अभिव्यक्ति देते हैं।
इन रचनाओं की खासियत यह है कि वे पाठक को केवल भावनात्मक स्तर पर प्रभावित नहीं करतीं, बल्कि भाषा के अधिकारों के प्रति जागरूकता और सामूहिक चेतना विकसित करने का संदेश भी देती हैं। इस तरह पुस्तक का काव्य खंड आंदोलन की वैचारिक ऊर्जा को साहित्यिक अभिव्यक्ति प्रदान करता है।
तथ्यात्मक परिशिष्ट से बढ़ती है पुस्तक की उपयोगिता
पुस्तक के अंत में दिए गए तीन परिशिष्ट इसकी उपयोगिता को और बढ़ाते हैं।
- परिशिष्ट-1: भोजपुरी को संवैधानिक मान्यता मिलने से होने वाले लाभ।
- परिशिष्ट-2: भोजपुरी और मान्यता प्राप्त अन्य भाषाओं के तुलनात्मक आंकड़े।
- परिशिष्ट-3: वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार भोजपुरी बोलने वालों के राज्यवार आंकड़े।
ये परिशिष्ट भोजपुरी की स्थिति को आंकड़ों और तथ्यों के आधार पर समझने में मदद करते हैं। भाषा की मान्यता से जुड़े विमर्श में भावनाओं और सांस्कृतिक आग्रहों के साथ तथ्यात्मक आधार भी आवश्यक है। इस दृष्टि से पुस्तक का यह हिस्सा शोधार्थियों, भाषाविदों, पत्रकारों और भाषा आंदोलन से जुड़े लोगों के लिए विशेष रूप से उपयोगी साबित हो सकता है।
भोजपुरी आंदोलन के लिए एक महत्वपूर्ण वैचारिक दस्तावेज
पुस्तक में संकलित आलेखों, कविताओं, गीतों और तथ्यात्मक परिशिष्टों को समग्रता में देखने पर कहा जा सकता है कि ‘संविधान से दूर काहे भोजपुरी’ महज एक पुस्तक नहीं, बल्कि भोजपुरी भाषा की संवैधानिक मान्यता के लिए चल रहे वैचारिक संघर्ष का महत्वपूर्ण दस्तावेज है।
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भोजपुरी केवल संवाद का माध्यम नहीं है। यह करोड़ों लोगों की सांस्कृतिक स्मृति, लोकपरंपराओं, लोकगीतों, सामाजिक संबंधों और जीवन-दृष्टि की संवाहक भाषा है। इसकी समृद्ध साहित्यिक परंपरा और व्यापक भाषाई क्षेत्र इसे विशिष्ट पहचान प्रदान करते हैं। ऐसे में संवैधानिक मान्यता का प्रश्न भाषा के संरक्षण, संवर्धन और भावी पीढ़ियों तक उसके हस्तांतरण से भी जुड़ता है।
यह पुस्तक भोजपुरी की मान्यता के पक्ष में उठने वाले तर्कों को एक स्थान पर समेटती है और पाठकों को इस विषय पर गंभीरता से सोचने के लिए प्रेरित करती है। साथ ही, यह भाषाई अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे लोगों को वैचारिक आधार भी उपलब्ध कराती है।
निस्संदेह, ‘संविधान से दूर काहे भोजपुरी’ हर भोजपुरी प्रेमी, साहित्यकार, शोधार्थी, पत्रकार और जागरूक नागरिक के लिए पढ़ने, समझने और सहेजकर रखने योग्य पुस्तक है। भोजपुरी की संवैधानिक मान्यता के सवाल को समझने और इस दिशा में चल रहे प्रयासों से जुड़ने के इच्छुक लोगों के लिए यह पुस्तक एक महत्वपूर्ण संदर्भ सामग्री है।




