डॉ. संतोष पटेल
‘जोहार भोजपुरिया’ के संपादक आ कवि कनक किशोर के पर्यावरणीय कविता-संग्रह ‘धधकत सुरुज पियासल धरती’ आजु के समय में एगो बहुत जरूरी साहित्यिक दस्तक बा। अइसन समय में, जब पूरा दुनिया जलवायु परिवर्तन आ ग्लोबल वार्मिंग के खतरा से जूझ रहल बा, ई किताब भोजपुरी साहित्य में ‘ईको पोएट्री’ (Eco-poetry) के परिभाषा के नया विस्तार दे रहल बा। दरअसल, ई समीक्षा एह बाति पर केंद्रित बा कि ई किताब ईको क्रिटिसिज्म (Eco-criticism) के वैश्विक कसौटी पर कइसन उतरत बा आ कइसे लोक-संवेदना के संगे पर्यावरण के सवाल के जोड़त बा।
ईको पोएट्री के परिभाषा आ कनक किशोर के दृष्टि
ईको पोएट्री खाली प्रकृति के सुंदरता के बखान ना ह, बलुक ई मनुष्य आ प्रकृति के बीच के बिगड़त संतुलन के जाँच-परख ह। कनक किशोर अपना किताब के भूमिका में साफ कहले बाड़न कि आजु के ‘इको लिटरेचर’ असल में ‘ईको पोएट्री’ के ही फलाफल ह। ऊ प्रकृति के खाली एगो वस्तु ना, बलुक एगो जीवंत सत्ता मानत बाड़न, जेकरा से मनुष्य के प्राण जुड़ल बा। किताब में ईको पोएट्री के तीन गो मुख्य आयाम लउकेला-
- पारिस्थितिकी संकट के पहचान: जइसे ‘धधकत सुरुज’ आ ‘पियासल धरती’ के बिंब।
- मानवीय लालच पर प्रहार: ‘आ बैल मार’ वाला स्टाइल में नेवतल संकट।
- विकल्प के तलाश: ‘हरित उलगुलान’ के माध्यम से प्रकृति के बचावे के संकल्प।
ईको क्रिटिसिज्म के कसौटी पर किताब
ईको क्रिटिसिज्म साहित्य आ भौतिक पर्यावरण के बीच के संबंधन के अध्ययन ह। ई किताब एह कसौटी पर तीन प्रमुख बिंदुवन के आधार पर खरी उतरत बा।
विकास बनाम विनाश (Development vs Destruction)
ईको क्रिटिसिज्म के एगो बड़ पक्ष बा आधुनिक विकास के आलोचना। कविता ‘विकास’ में कवि कहत बाड़न कि ‘विकास’ शब्द सुनतहीं अब डर लागेला, काहे कि ई ‘विनाश के जननी’ बन गइल बा। ‘बौना पहाड़’ कविता में हाईवे के निर्माण खातिर पहाड़न के काटे आ जंगल के उजड़े के जे दरद बा, ऊ ईको क्रिटिसिज्म के मूल स्वर ह।
“विकास बाबू तोहार-हमार जिनिगी खा गइलन, नंगा बौना पहाड़ आजु आगि उगलत बा।”
जोंक संस्कृति आ व्यवस्था के पोल (The Critique of Systems)
ईको क्रिटिसिज्म व्यवस्था से सवाल पूछेला। कविता ‘कठघरा में पेसी’ में कवि सीधे तौर पर तीन गो ‘जोंक’ के पहचान कइले बाड़न—सरकार, व्यापार आ ठेकेदार। ई प्रतीकात्मक प्रहार बतावत बा कि पर्यावरण के असली दुश्मन कवन बा। ‘मुआवजा’ कविता में ऊ सवाल उठावत बाड़न कि का कवनो सरकार एगो पेड़ के असली मोल चुका सकेले?
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लोक-संस्कृति आ प्रकृति के अगाध प्रेम (Cultural Ecology)
भारतीय परंपरा में पेड़-पौधा के परिवार के हिस्सा मानल गइल बा। ‘बड़ दादा’ कविता में बरगद के पेड़ के गाँव के ‘दादा’ मानल ‘कल्चरल ईकोलॉजी’ के बेहतरीन उदाहरण ह। ओसही, ‘नदी मर गइल’ में नदी के सिर्फ पानी के स्रोत ना, बलुक ‘सभ्यता के इतिहास’ के रूप में देखल गइल बा।
प्रमुख कवितन के संदर्भ में पर्यावरणीय चेतना
‘धरती माई सुनीं ना अरजिया हमार’: ई कविता मनुष्य के अपराधबोध (guilt) के स्वर ह। कवि स्वीकार करत बाड़न कि ‘अपना स्वार्थ में लुटनी छुट के, जंगल अउरी पानी’।
‘गंगा माई’: ई कविता ‘नमामि गंगे’ जइसन सरकारी योजनान के ढोंग आ गंगा में गिरत कचरा पर तीखा प्रहार बा। ‘माता कुमाता न भवति’ के हवाला देत कवि गंगा के सूखल धार पर चिंता जतावत बाड़न।
‘प्रवासी चिरई’: ई कविता पलायन के दरद के संगे-संगे ईको-सिस्टम के टूटला के कहानी बा। शहर के चकाचौंध के ‘अफीम’ कहल गइल बा, जे गाँव के माटी से मनई के दूर कर देत बा।
‘निरबंसिया’: हाइब्रिड बीजन आ खाद-रसायन के कारण बंजर होत धरती के ई कविता एगो डरावना, बाकिर साँच चित्र पेश करतिया।
‘हरित उलगुलान’ के जरूरत
कनक किशोर के ई किताब खाली रुदन (lament) ना ह, ई एगो आह्वान ह। संग्रह के आखिरी कविता ‘हरित उलगुलान’ बिरसा मुंडा के क्रांतिकारी चेतना के पर्यावरण से जोड़तिया। ईको क्रिटिसिज्म के अंतिम लक्ष्य साहित्यिक सक्रियता (activism) ह, आ ई किताब ‘जल, जंगल, जमीन’ बचावे खातिर ‘हरित उलगुलान’ के बात क के अपना साहित्यिक धर्म के बखूबी निभावतिया। कुल मिला के, ‘धधकत सुरुज पियासल धरती’ भोजपुरी साहित्य के अमूल्य निधि ह। ई किताब हमनी के चेतावतिया कि जदि ‘पियासल धरती’ के पियास ना बुझाइल आ ‘धधकत सुरुज’ के तपिस ना कम भइल, त ‘कुछ ना बांची’। एह उम्दा संग्रह खातिर कनक किशोर भैया के हार्दिक बधाई।

