‘गंगा रतन बिदेसी’ भोजपुरी उपन्यास में प्रवासी जीवन की पीड़ा

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समीक्षक: प्रकाश प्रियांशु

भोजपुरी साहित्य धारा में उपन्यास विधा अपेक्षाकृत नई है, लेकिन इसमें जीवन के गहरे अनुभवों को प्रस्तुत करने की क्षमता अद्भुत रही है। भोजपुरी साहित्य जगत में उपन्यासिक दृष्टिकोण से मृत्युंजय सिंह द्वारा रचित आधुनिक ‘गंगा रतन बिदेसी’ ऐसा ही उपन्यास है, जो प्रवासी भारतीय समाज के ऐतिहासिक संदर्भ, सांस्कृतिक जड़ों और पीड़ा-भरे जीवन को अभिव्यक्त करता है। उपन्यास में प्रवास केवल रोज़गार की तलाश नहीं, बल्कि मजबूरी, बिछुड़न और बेगानेपन की मर्मस्पर्शी पीड़ा है। मृत्युंजय कुमार सिंह 1987 बैच के पश्चिम बंगाल कैडर के आईपीएस अधिकारी हैं। वह एक कवि, स्तंभकार, गीतकार और लोक संगीतकार भी हैं।

लेखक ने कथा को इस प्रकार गढ़ा है कि पाठक सीधे गिरमिटिया मजदूरों की पीड़ा से जुड़ जाता है। उपन्यास का एक संवाद है-‘गिरमिट के नाम पर लुटला गइल जिनगी।’ यह वाक्य न केवल ऐतिहासिक यथार्थ को उभारता है, बल्कि शोषण की उस प्रक्रिया को भी सामने लाता है, जिसमें मनुष्य की स्वतंत्रता पूरी तरह छीन ली गई थी।

प्रवासी भारतीय जीवन का यथार्थ दस्तावेज

‘गंगा रतन बिदेसी’ प्रवासी भारतीय जीवन की पीड़ा और यथार्थ संघर्षमय जीवन का प्रामाणिक दस्तावेज़ है। आलोच्य कृति गिरमिटिया मजदूरों के जीवन की वास्तविक परिस्थितियों को उजागर करती है, जिन्होंने उपनिवेशवाद की कठोर व्यवस्था के तहत विदेशी धरती पर अमानवीय शोषण सहा।

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यह उपन्यास केवल एक कथा नहीं है, बल्कि भारतीय प्रवासी समाज के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जीवन का जीवंत चित्रण है। इसमें गाँव-घर छोड़ने की वेदना, पहचान का संकट, स्त्रियों की विवशता, गांधी से प्रेरणा और सांस्कृतिक स्मृति के संरक्षण जैसी विविध समस्याओं को प्रमुखता से उठाया गया है।

लेखक ने ‘गंगा रतन बिदेसी’ में भोजपुरी भाषा और लोकगीतों का प्रयोग कर प्रवासी जीवन के संघर्ष को और भी जीवंत बना दिया है। पात्रों के संवादों में उनकी अंतःपीड़ा सीधे पाठकों के हृदय तक पहुँचती है। इस बात का प्रमाण उपन्यास के मूनेसर के कथन से मिलता है—“गोरन के कोड़ा पीठ पर पड़त रहे, बाकिर मन में सबसे बड़ा दर्द ई रहल कि अपना माटी से बिछुड़ गइनी।”

यह संवाद सामान्य मजदूरी से परे मातृभूमि से बिछड़ने के गहरे घाव को व्यक्त करता है। यह उपन्यास भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन और प्रवासी समाज के बीच सेतु का कार्य करता है। साथ ही, यह आधुनिक वैश्वीकरण के दौर में भी प्रवासी अस्मिता की चुनौतियों को समझने में मदद करता है। अतः ‘गंगा रतन बिदेसी’ को प्रवासी साहित्य की एक महत्वपूर्ण कड़ी मानना उचित होगा।

इतिहास और साहित्य का सेतु

भोजपुरी आधुनिक गद्य साहित्य या यूँ कहें कि भोजपुरी उपन्यासिक परंपरा में ‘गंगा रतन बिदेसी’ का महत्त्व केवल साहित्यिक स्तर पर ही नहीं, बल्कि ऐतिहासिक दृष्टि से भी है। यह उपन्यास अठारहवीं-उन्नीसवीं शताब्दी के उस दौर को पुनर्जीवित करता है, जब भारत से लाखों गरीब किसान और मजदूर गिरमिटिया मज़दूर बनाकर अफ्रीका, फिजी, मॉरीशस, सूरीनाम और त्रिनिदाद ले जाए गए।

ये लोग वहाँ बागानों, रेल लाइनों और कारखानों में काम करने के लिए विवश थे। लेखक ने गहन ऐतिहासिक शोध के आधार पर कथा बुनी है, जिससे उपन्यास का दस्तावेज़ी महत्व बढ़ जाता है। उपन्यास की भूमिका में लेखक लिखते हैं-“गिरमिट के नाम पर लुटला गइल पूरा जिनगी, बाकिर गाँव-घर छोड़के निकले के पीड़ा अबले हमनीके रग-रग में समाइल बा।” यह उद्धरण दिखाता है कि इतिहास केवल बाहरी घटनाओं का क्रम नहीं होता, बल्कि उसमें जीवन की करुण संवेदनाएँ भी गुँथी रहती हैं। इस दृष्टि से यह उपन्यास इतिहास और साहित्य का सेतु है।

गिरमिटिया मजदूरों की पीड़ा

विवेचित उपन्यास में गिरमिटिया मजदूरों का यथार्थ कुछ यूँ जान पड़ता है, मानो लेखक के समक्ष घटना घटित हुई हो। यह उपन्यास की सबसे बड़ी उपलब्धि है। लेखक यह दिखाने में सफल होते दिखते हैं कि गिरमिटिया मजदूरों का जीवन सबसे कठिन परिस्थितियों में बीता। उन्हें अनुबंध यानी गिरमिट के नाम पर धोखे से ले जाया गया था। न जहाज पर सम्मान था, न परदेश में स्वतंत्रता। ‘गंगा रतन बिदेसी’ में मूनेसर जैसे पात्र गिरमिटिया जीवन की कठोरता का सजीव चित्रण करते हैं। मुनेशर कहता है—“गोरन के कोड़ा पीठ पर पड़त रहे, बाकिर मन में सबसे बड़ा दर्द ई रहल कि अपना माटी से बिछुड़ गइनी।” यहाँ कोड़ा केवल शारीरिक शोषण का प्रतीक नहीं है, बल्कि मानसिक और सांस्कृतिक शोषण की ओर भी संकेत करता है। इस उपन्यास ने गिरमिटिया मजदूरों के जीवन की सच्चाई को पहली बार भोजपुरी साहित्य में इतनी गहराई से प्रस्तुत किया है।

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प्रवासी जीवन और अपनापन खोने की पीड़ा

प्रवासी जीवन का सबसे बड़ा संकट अपनापन खो देना था। परदेश में मजदूरी करते हुए लोग अपने परिवार, गाँव और समाज से दूर हो गए। उपन्यास का पात्र कहता है—“हमरा लागेला जइसे परदेश के धूप-छाँव में हमनी के आत्मा सूख गइल बा।” यह वाक्य प्रवासी जीवन के भीतर से उठती उस पीड़ा को उजागर करता है, जो शारीरिक कष्ट से कहीं अधिक गहरी थी। लेकिन इसी पीड़ा से संघर्ष की चेतना भी जन्म लेती है। उपन्यास में दिखाया गया है कि कैसे मजदूरों ने संगठित होकर अपने अधिकारों की मांग की और धीरे-धीरे प्रतिरोध का स्वर बुलंद किया। इस प्रकार यह उपन्यास पीड़ा के साथ-साथ संघर्ष का भी दस्तावेज़ है।

विस्थापन और पहचान का संकट

विस्थापन का सबसे गहरा असर पहचान पर पड़ा। लोग यह नहीं समझ पा रहे थे कि वे भारतीय हैं या उस नए देश के नागरिक, जहाँ उन्हें लाकर बसाया गया था। ‘गंगा रतन बिदेसी’ में गंगा का संवाद है-“हमरा लागेला कि हमनी ना पूरी तरह हिंदुस्तानी बानी, ना पूरा अफ्रीकन।” यह उद्धरण प्रवासी समाज की दुविधा और पहचान संकट को स्पष्ट करता है। विस्थापन केवल भौगोलिक दूरी नहीं, बल्कि मानसिक दरार भी बन जाता है। उपन्यास इस संकट को गहराई से रेखांकित करता है और बताता है कि कैसे तीसरी पीढ़ी में जाकर यह संकट धीरे-धीरे हल होने लगता है।

स्त्री जीवन की पीड़ा और संघर्ष

प्रवासी समाज में स्त्रियों की स्थिति और भी दयनीय रही। उन्हें दोहरी मार सहनी पड़ी। एक ओर शोषणकारी व्यवस्था और दूसरी ओर सामाजिक बंधन। उपन्यास में रतन दुलारी का चरित्र इस पीड़ा का सशक्त उदाहरण है। वह कहती है—“हमरा भाग में बस रोवनहीं लिखल गइल बा, ना माई-बाप के मुँह देख पइनी, ना आपन सुख-दुख कहे के जगह मिलल।” इस संवाद में स्त्री के भीतर की गहरी वेदना झलकती है। किंतु यही स्त्री चरित्र प्रवासी समाज में साहस और संघर्ष की मिसाल भी बनते हैं। लेखक ने स्त्री पात्रों को केवल पीड़िता के रूप में नहीं, बल्कि संघर्षशील नारी के रूप में प्रस्तुत किया है।

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गांधी और संघर्ष की चेतना

उपन्यास में महात्मा गांधी का प्रवेश केवल एक ऐतिहासिक प्रसंग नहीं है, बल्कि यह प्रवासी समाज के जीवन में आशा और नई दिशा का प्रतीक है। जब गंगा गांधी से मिलती है तो कहती है—“गांधी बाबा से मिलल के बाद लागल कि अब हमनी के दर्द सुने वाला कोई बा।” यह उद्धरण दिखाता है कि स्वतंत्रता संग्राम ने प्रवासी समाज को भी गहरे प्रभावित किया। गांधी ने उन्हें अन्याय के विरुद्ध खड़ा होने की प्रेरणा दी। इस तरह उपन्यास प्रवासी समाज और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के बीच गहरे संबंध को रेखांकित करता है।

सांस्कृतिक स्मृति और भोजपुरी लोकजीवन

भले ही प्रवासी मजदूर परदेश में थे, लेकिन उनकी स्मृतियों में भारतीय संस्कृति हमेशा जीवित रही। वे भोजपुरिया गीत गाते, तीज-त्योहार मनाते और अपनी परंपरा को जीवित रखने की कोशिश करते। उपन्यास में एक प्रसंग है—“परदेश के बगान में काम करत-करत लोग फगुआ गावे लागल, तनी देर खातिर सबके लागल कि हमनी गाँव लौट अइनी।” यह उद्धरण प्रवासी समाज की सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहने की ललक को दर्शाता है। लेखक ने प्रवासी संस्कृति और लोक-स्मृति को अत्यंत संवेदनशीलता से उकेरा है।

भाषा और कथाशिल्प

आलोच्य उपन्यास की भाषा भोजपुरी है, जिसमें सहजता, सरलता एवं लोकजीवन की मिठास है। लेखक ने कथा को आगे बढ़ाने के लिए संवाद, गीत और लोककथाओं का उपयोग किया है। इससे उपन्यास अधिक जीवंत और प्रभावी बन गया है। पात्र का संवाद—“भोजपुरी बोलल से लागेला कि माई के गोदी में बइठ गइनी”—भाषा की आत्मीयता और सांस्कृतिक पहचान दोनों को उजागर करता है। कथन-शिल्प में लेखक ने स्मृति और वर्तमान के बीच अद्भुत संतुलन बनाया है, जिससे कथा एक महागाथा का रूप ले लेती है।

आधुनिक प्रवासी साहित्य के संदर्भ में

यदि इस उपन्यास की तुलना आधुनिक प्रवासी साहित्य से की जाए तो स्पष्ट होता है कि इसमें करुणा तथा संघर्ष दोनों समान रूप से विद्यमान हैं। आधुनिक प्रवासी लेखन जैसे झुम्पा लाहिड़ी या भीष्म साहनी के प्रवासी कथानक में भी यही द्वंद्व दिखाई देता है। उपन्यास में पात्र कहता है-“परदेश चाहे कतना भी सुख दे, बाकिर मन हमेशा गाँव-घर के खोजत रहेला।” यह उद्धरण दर्शाता है कि आधुनिक प्रवासी भारतीय भी अपनी जड़ों से कटकर पूर्णतः सुखी नहीं हो पाते। इस दृष्टि से यह उपन्यास आधुनिक प्रवासी साहित्य की पूर्वपीठिका है।

सामाजिक प्रभाव

उपरोक्त उपन्यास का सामाजिक प्रभाव यह है कि यह प्रवासी समाज के संघर्षों को मुख्यधारा साहित्य में स्थान दिलाता है। यह कृति भारतीय समाज को यह स्मरण कराती है कि प्रवासी केवल परदेशी मजदूर नहीं थे, बल्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा हैं। उपन्यास का एक वाक्य है—“हमनी के कहानी सुनके लोग रोवे लागल, जइसे आपन खोयल माटी के गंध मिल गइल हो।” यह उद्धरण बताता है कि प्रवासी कथा भारतीय जनमानस को गहराई से छूती है।

आज के समय में प्रासंगिकता

आज जब वैश्वीकरण और प्रवासन की नई लहरें चल रही हैं, तब ‘गंगा रतन बिदेसी’ और भी प्रासंगिक हो उठता है। उपन्यास को पढ़कर ज्ञात होता है कि प्रवासी जीवन केवल अवसरों की तलाश नहीं, बल्कि गहरी पीड़ा और सांस्कृतिक संकट से भी भरा होता है। पात्र का संवाद—“हमरा लागेला कि परदेश के धन-दौलत सब बेमानी बा, अगर माई के आशीष ना मिलल।” यह उद्धरण स्पष्ट करता है कि जड़ों से कटे जीवन की असली कीमत क्या होती है। इस प्रकार यह कृति केवल अतीत का दस्तावेज़ नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए भी चेतावनी है।

उपरोक्त विवेचन और विश्लेषण के आधार पर कहा जा सकता है कि ‘गंगा रतन बिदेसी’ आधुनिक भोजपुरी उपन्यास साहित्य में ऐतिहासिक और सामाजिक दृष्टिकोण से महनीय है। इसमें प्रवासी भारतीयों की त्रासदी, उनकी जिजीविषा और सांस्कृतिक अस्मिता की खोज को अत्यंत मार्मिकता से प्रस्तुत किया गया है। उपन्यास का प्रत्येक पात्र प्रवासी जीवन की किसी न किसी पीड़ा का प्रतिनिधि है—मूनेसर में विवशता, रतन में संघर्ष, गंगा में अस्मिता और रतन दुलारी में स्त्री चेतना। अतः इसके माध्यम से लेखक ने प्रवासी भारतीय समाज की सामूहिक पीड़ा को आवाज़ दी है।

उपन्यास का महत्व केवल ऐतिहासिक-सामाजिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि साहित्यिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी है। लेखक ने भोजपुरी भाषा की सहजता और लोकगीतों की मिठास से इसे जीवन्त बना दिया है। यही कारण है कि यह रचना पाठकों के हृदय को गहराई से छू लेती है। उपन्यास का उद्धरण—“गिरमिट के बेड़ी तोड़ला के बादो मन में माटी खातिर तड़प बाकिये रह गइल।” वस्तुतः आज भी जब भारतीय प्रवासी विश्वभर में फैले हुए हैं, तब यह उपन्यास उनके अनुभवों और समस्याओं को समझने में मार्गदर्शक है। इसीलिए ‘गंगा रतन बिदेसी’ को प्रवासी भारतीय साहित्य की परंपरा में मील का पत्थर माना जा सकता है।

समीक्षक परिचय: युवा शिक्षाविद्, लोकसाहित्य के शोधवेत्ता एवं मूलतः देवरिया के

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