कुछ अश्लील गीत सुनकर भोजपुरी को नहीं जान सकते, उसका साहित्य भी पढ़िए

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डॉ. गुरु चरण सिंह, पूर्व महामंत्री, अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन, संप्रति उपाध्यक्ष, विश्व भोजपुरी सम्मेलन, दिल्ली

1880 के दशक से छपती किताबों से लेकर आज के डिजिटल दौर तक-भोजपुरी ने साबित किया है कि वह केवल बोलचाल की भाषा नहीं, सृजन और विचार की भी भाषा है

भोजपुरी को लेकर जब भी चर्चा होती है, अक्सर बात लोकगीत, सिनेमा और मनोरंजन तक पहुंचकर रुक जाती है। लेकिन भोजपुरी की कहानी इससे कहीं बड़ी है। भोजपुरी के पास लोक की स्मृति है, संतों की वाणी है, किसानों और मजदूरों का जीवन है, प्रवास की पीड़ा है, रंगमंच की ताकत है, कविता की संवेदना है और सामाजिक सवालों को सामने रखने वाली साहित्यिक परंपरा है।

इसलिए भोजपुरी को केवल कुछ लोकप्रिय गीतों के आधार पर परिभाषित करना वैसा ही है जैसे किसी विशाल पुस्तकालय को उसकी एक किताब देखकर समझ लेना। भोजपुरी का वास्तविक परिचय उसके साहित्य, इतिहास, लोकसंस्कृति और करोड़ों लोगों के जीवनानुभव से होता है।

भोजपुरी की कहानी किताबों में भी दर्ज है

भोजपुरी साहित्य के इतिहास को लेकर विद्वानों के बीच अलग-अलग काल-विभाजन और आरंभ-बिंदु मिलते हैं। कुछ अध्येता इसकी साहित्यिक परंपरा को सिद्ध-साहित्य और मध्यकालीन लोकधारा तक ले जाते हैं, जबकि आधुनिक भोजपुरी साहित्य के विकास में 19वीं और 20वीं शताब्दी के प्रकाशनों को महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है।

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19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में भोजपुरी में पुस्तकों के प्रकाशन के प्रमाण मिलते हैं। उपलब्ध साहित्यिक इतिहासों में ‘सुधाबुंद’ (1884), ‘बदमाश दर्पण’ (1885) और ‘विरहा नायका भेद’ (1900) जैसी पुस्तकों का उल्लेख मिलता है। 1884 में प्रकाशित ‘देवाक्षर चरित’ को भोजपुरी के आरंभिक नाटकों में गिना जाता है। यानी भोजपुरी की साहित्यिक दुनिया कोई आज की बनाई हुई चीज नहीं है। इसकी लिखित परंपरा ने लंबे समय तक अपने पाठक और अपने रचनाकार तैयार किए हैं।

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एक भाषा, अनेक साहित्यिक विधाएं

भोजपुरी साहित्य की सबसे बड़ी विशेषता उसकी बहुविधता है। इसमें कविता है तो कहानी भी है। गीत है तो नाटक भी है। लोककथा है तो उपन्यास भी है। निबंध है तो आलोचना भी है। लोक साहित्य है तो पत्रकारिता और शोध की परंपरा भी है।

यही वजह है कि भोजपुरी साहित्य का इतिहास लिखने के लिए अलग से गंभीर ग्रंथ तैयार हुए हैं। उदयनारायण तिवारी की ‘भोजपुरी भाषा और साहित्य’ जैसी कृतियां भोजपुरी भाषा और साहित्य के अध्ययन की महत्वपूर्ण संदर्भ सामग्री रही हैं। इस पुस्तक का विस्तारित संस्करण 1984 में बिहार राष्ट्रभाषा परिषद से प्रकाशित हुआ था और इसमें भोजपुरी भाषा-साहित्य के अध्ययन का विस्तृत स्वरूप मिलता है।

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इसी तरह अर्जुन तिवारी की ‘भोजपुरी साहित्य के इतिहास’ 2014 में प्रकाशित 503 पृष्ठों की पुस्तक है, जो स्वयं इस बात का प्रमाण है कि भोजपुरी साहित्य का इतिहास इतना विस्तृत है कि उस पर स्वतंत्र, विस्तृत साहित्यिक इतिहास लिखा जा सकता है।

प्रकाशन की परंपरा ने भाषा को दिया स्थायित्व

आपके उपलब्ध सामग्री-संदर्भों में 1882 से 1982 तक के भोजपुरी प्रकाशनों की सूची तैयार किए जाने और सैकड़ों पुस्तकों के प्रकाशन का उल्लेख है। इस तरह की पुस्तक-सूचियां भोजपुरी के लिखित साहित्य की व्यापकता समझने में महत्वपूर्ण हैं।

इस परंपरा में साहित्यकार केवल लिखते नहीं थे, वे अपनी रचनाओं को प्रकाशित कराने के लिए भी संघर्ष करते थे। यही वह दौर था जब कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास, निबंध, आलोचना और अन्य विधाओं में लगातार पुस्तकें सामने आती रहीं। भाषा का साहित्य तभी मजबूत होता है जब उसकी रचनाएं स्मृति से निकलकर पुस्तकालय तक पहुंचती हैं। भोजपुरी ने यह यात्रा की है।

हीरा डोम से भिखारी ठाकुर तक: लोक की आवाज बनी साहित्य

भोजपुरी साहित्य का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि इसने समाज के उन हिस्सों को भी आवाज दी, जिनकी आवाज मुख्यधारा के साहित्य में लंबे समय तक कम सुनाई देती थी। हीरा डोम की रचना ‘अछूत की शिकायत’ का 1914 में सरस्वती पत्रिका में प्रकाशित होना हिंदी-भाषी साहित्यिक संसार में दलित अनुभव की शुरुआती मुद्रित अभिव्यक्तियों में गिना जाता है।

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इसके बाद भिखारी ठाकुर ने भोजपुरी लोकजीवन को रंगमंच की ऐसी भाषा दी, जिसने समाज के भीतर के सवालों को गांव-गांव तक पहुंचाया। उनकी ‘बिदेसिया’, ‘बेटी बेचवा’ और ‘गबरघिचोर’ जैसी रचनाओं में प्रवास, स्त्री जीवन, परिवार, सामाजिक विसंगतियां और मानवीय संबंध जैसे विषय सामने आते हैं। भिखारी ठाकुर की ताकत यही थी कि उन्होंने साहित्य को किताब से निकालकर मंच और जनता के बीच पहुंचाया।

‘बिदेसिया’ सिर्फ नाटक नहीं, प्रवासी समाज की कहानी है

भोजपुरी साहित्य में प्रवास कोई नया विषय नहीं है। रोजगार की तलाश में गांव से शहर और देश से विदेश जाने वाले लोगों की पीड़ा भोजपुरी लोकगीतों और साहित्य में लंबे समय से दर्ज होती रही है। ‘बिदेसिया’ इसी अनुभव का एक बड़ा सांस्कृतिक प्रतीक बन गया। आज जब दुनिया में migration, diaspora और identity पर विश्वविद्यालयों में शोध हो रहा है, भोजपुरी साहित्य हमें बताता है कि प्रवास की पीड़ा भारतीय लोकजीवन में बहुत पहले से साहित्य का विषय रही है। यही भोजपुरी साहित्य की ताकत है, वह बड़े सिद्धांतों को गांव के आदमी की जिंदगी से जोड़ देता है।

‘लोहा सिंह’ ने भोजपुरी रंगमंच और रेडियो को दी नई पहचान

भोजपुरी रंगमंच की चर्चा रामेश्वर सिंह काश्यप के बिना अधूरी है। उनका प्रसिद्ध नाटक ‘लोहा सिंह’ भोजपुरी रंगमंच और रेडियो की लोकप्रिय परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा बना। काश्यप ने यह साबित किया कि भोजपुरी में संवाद, हास्य, सामाजिक टिप्पणी और जनभाषा का इस्तेमाल करके ऐसा रंगमंच बनाया जा सकता है जिसकी पहुंच बहुत व्यापक हो।

भोजपुरी साहित्य की यही खूबी है कि उसने साहित्य को केवल पन्नों पर नहीं रखा—कविता मंच पर गई, नाटक रेडियो तक गया और लोकभाषा लाखों लोगों के कानों तक पहुंची।

भोजपुरी और हिंदी: विरोध नहीं, परस्पर समृद्धि का रिश्ता

भोजपुरी को हिंदी के विरोध में खड़ा करना भी इतिहास को अधूरा पढ़ना होगा। भोजपुरी भाषी क्षेत्र के अनेक साहित्यकारों ने हिंदी के विकास में योगदान दिया। दूसरी तरफ हिंदी ने भी भोजपुरी के साहित्य और रचनाकारों को व्यापक पाठक वर्ग तक पहुंचाने में भूमिका निभाई है। भाषाएं एक-दूसरे की दुश्मन नहीं होतीं। भोजपुरी मजबूत होगी तो भारतीय भाषाई विविधता मजबूत होगी। हिंदी मजबूत होगी तो उसकी लोकभाषाई जड़ें भी मजबूत होनी चाहिए। भाषाई विविधता को शून्य-योग की लड़ाई बनाना भारतीय भाषाओं के साझा इतिहास के साथ न्याय नहीं होगा।

भोजपुरी का सबसे बड़ा प्रमाण: उसका जीवित लोक

भोजपुरी की ताकत सिर्फ पुस्तकों में नहीं है। यह शादी के सोहर में है। यह खेतों की मेहनत में है। यह चैता और कजरी में है। यह बिरहा और फगुआ में है। यह प्रवासी के विरह में है। यह मां की लोरी में है। यह गांव की बतकही में है। यही कारण है कि भोजपुरी साहित्य को समझने के लिए केवल लिखित किताबें पढ़ना पर्याप्त नहीं है। भोजपुरी का लोक साहित्य स्वयं एक विशाल जीवित अभिलेखागार है।

मॉरीशस में भोजपुरी लोकसंस्कृति को UNESCO की मान्यता

भोजपुरी की वैश्विक सांस्कृतिक उपस्थिति का एक ठोस उदाहरण मॉरीशस का ‘गीत गवई’ है। UNESCO ने 2016 में ‘Bhojpuri folk songs in Mauritius, Geet-Gawai’ को Representative List of the Intangible Cultural Heritage of Humanity में शामिल किया। गीत गवई मॉरीशस के भोजपुरी भाषी समुदायों की विवाह-पूर्व परंपरा है, जिसमें अनुष्ठान, प्रार्थना, गीत, संगीत और नृत्य शामिल होते हैं। UNESCO इसे सामुदायिक पहचान और सामूहिक सांस्कृतिक स्मृति की अभिव्यक्ति मानता है। यह तथ्य भोजपुरी के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। जिस भाषा से जुड़ी लोकपरंपरा मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में दर्ज हो, उसकी सांस्कृतिक ताकत को केवल लोकप्रिय गीतों की संख्या से नहीं मापा जा सकता।

गिरमिटिया इतिहास ने भोजपुरी को समुद्र पार पहुंचाया

19वीं और 20वीं शताब्दी में भारतीय श्रमिकों के प्रवास के साथ भोजपुरी कैरेबियन और हिंद महासागर के देशों तक पहुंची। मॉरीशस में आज भी भोजपुरी लोक परंपराएं जीवित हैं। UNESCO के दस्तावेजों में भोजपुरी लोकगीतों को वहां के भारतीय मूल के समुदायों की सामूहिक स्मृति और पहचान से जोड़ा गया है। यानी भोजपुरी का इतिहास सिर्फ भारत की भौगोलिक सीमा के भीतर का इतिहास नहीं है। यह migration, memory और identity की भी कहानी है।

भोजपुरी की किताबें जितनी जरूरी हैं, उतना ही जरूरी है उनका डिजिटलीकरण

आज भोजपुरी के सामने एक नई चुनौती है। पहले चुनौती थी-किताब छपे कैसे? आज चुनौती है-पुरानी किताबें बचें कैसे और नई पीढ़ी तक पहुंचें कैसे? 19वीं और 20वीं शताब्दी में प्रकाशित भोजपुरी की अनेक पुस्तकें अब दुर्लभ हैं। यदि उनका डिजिटलीकरण, cataloguing और searchable digital archive तैयार किया जाए तो शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों और नई पीढ़ी के लिए भोजपुरी साहित्य का विशाल संसार आसानी से उपलब्ध हो सकता है। यह काम केवल सरकार या अकादमियों का नहीं होना चाहिए। विश्वविद्यालय, पुस्तकालय, साहित्यिक संस्थाएं, प्रकाशक और डिजिटल प्लेटफॉर्म मिलकर भोजपुरी का डिजिटल ज्ञानकोश तैयार कर सकते हैं।

भोजपुरी को सिर्फ बचाने की नहीं, आगे बढ़ाने की जरूरत है

भोजपुरी के सामने सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि “भोजपुरी बचेगी या नहीं?” सवाल यह है कि- भोजपुरी अगले 25 वर्षों में क्या नया रचेगी? क्या इसमें विज्ञान पर किताबें लिखी जाएंगी? क्या बच्चों के लिए आधुनिक साहित्य आएगा? क्या भोजपुरी में उच्च शिक्षा की सामग्री तैयार होगी? क्या डिजिटल पत्रकारिता मजबूत होगी? क्या शोधार्थियों के लिए विश्वसनीय डिजिटल अभिलेख बनेंगे? क्या AI और नई तकनीक के दौर में भोजपुरी के लिए पर्याप्त डिजिटल भाषा संसाधन तैयार होंगे? भोजपुरी का भविष्य केवल अतीत की उपलब्धियों से सुरक्षित नहीं होगा। उसे नई किताबें, नए लेखक, नए पाठक और नए माध्यम चाहिए।

संवैधानिक मान्यता की बहस में साहित्य को केंद्र में रखिए

भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग लंबे समय से चल रही है। इस बहस को केवल राजनीति या संख्या के सवाल तक सीमित करने के बजाय भाषा की साहित्यिक और सांस्कृतिक क्षमता के आधार पर भी देखा जाना चाहिए। भोजपुरी के पक्ष में सबसे मजबूत तर्क यही है कि यह केवल बोलचाल की भाषा नहीं है। इसकी अपनी साहित्यिक परंपरा है, लोक साहित्य है, रंगमंच है, पत्रकारिता है, प्रकाशन परंपरा है, प्रवासी सांस्कृतिक संसार है और आधुनिक डिजिटल उपस्थिति भी है। संवैधानिक मान्यता की मांग का मूल्यांकन अंततः संवैधानिक और नीतिगत प्रक्रिया के अनुसार होना चाहिए, लेकिन इस बहस में भोजपुरी की वास्तविक साहित्यिक संपदा को नजरअंदाज करना उचित नहीं होगा।

भाषा का सम्मान दूसरे को छोटा करके नहीं बढ़ता

भोजपुरी के समर्थन में सबसे जरूरी बात यह भी है कि यह लड़ाई किसी दूसरी भारतीय भाषा के खिलाफ नहीं होनी चाहिए। हिंदी का अपना गौरव है। भोजपुरी की अपनी पहचान है। मैथिली, मगही, बज्जिका, अवधी, ब्रज, राजस्थानी और दूसरी भारतीय भाषाओं की अपनी समृद्ध परंपराएं हैं। भारत की भाषाई शक्ति इसी बहुलता में है। इसलिए भोजपुरी के लिए आवाज उठाने का सबसे सुंदर तरीका यही होगा कि कहा जाए- ‘हमारी भाषा को सम्मान दीजिए, किसी दूसरी भाषा का सम्मान कम मत कीजिए।’

अब भोजपुरी के पास सिर्फ गौरव की कहानी नहीं, भविष्य की जिम्मेदारी भी है

भोजपुरी ने बहुत कुछ हासिल किया है। लेकिन केवल अतीत के गौरव का स्मरण पर्याप्त नहीं। अब जरूरत है—एक मजबूत भोजपुरी डिजिटल लाइब्रेरी की, पुरानी पुस्तकों के डिजिटल आर्काइव की, विश्वविद्यालयों में भोजपुरी शोध को बढ़ावा देने की, बच्चों और युवाओं के लिए आधुनिक भोजपुरी साहित्य की, भोजपुरी पत्रकारिता के प्रशिक्षण की और भोजपुरी में विज्ञान, तकनीक और समसामयिक विषयों की सामग्री की। और सबसे बढ़कर-भोजपुरी पढ़ने की आदत विकसित करने की। क्योंकि कोई भी भाषा केवल बोलने से महान नहीं बनती। भाषा तब महान बनती है, जब उसमें समाज अपने समय को लिखता है।

भोजपुरी का असली परिचय क्या है?

भोजपुरी का परिचय केवल उसके लोकप्रिय गीतों से नहीं है। उसका परिचय है—कबीर की लोकचेतना, हीरा डोम की आवाज, भिखारी ठाकुर का रंगमंच, रामेश्वर सिंह काश्यप का ‘लोहा सिंह’, रघुवीर नारायण की काव्यधारा, महेंद्र मिसिर की लोकस्मृति, हजारों साहित्यकारों की रचनाएं, प्रवासी समाज की सांस्कृतिक स्मृति और आज की डिजिटल पीढ़ी की नई रचनात्मकता।

यही भोजपुरी है।

एक जीवित भाषा। एक साहित्यिक परंपरा। एक सांस्कृतिक स्मृति। और करोड़ों लोगों के जीवन से जुड़ी पहचान। भोजपुरी को सम्मान देने का सबसे अच्छा तरीका सिर्फ यह कहना नहीं कि ‘भोजपुरी हमारी शान है।’ बल्कि—भोजपुरी पढ़िए। भोजपुरी में लिखिए। भोजपुरी की किताबें खरीदिए। पुरानी रचनाओं को बचाइए। नई पीढ़ी को पढ़ाइए। और इस भाषा को भविष्य की भाषा बनाइए। क्योंकि भोजपुरी का सबसे बड़ा प्रमाण उसका अतीत नहीं, उसका आने वाला कल होगा।

1 COMMENT

  1. प्रो गुरुचरण का यह लेख भोजपुरी के इतिहास , वर्तमान और भविष्य की कई महत्वपूर्ण तथ्यों को प्रकाश में लाता है ।
    इनमें से प्रत्येक चिन्हित बिंदु पर कई कई लंबे पृष्ठ लिखे जा सकते है । यह तो पत्रिका और डिजिटल प्रकाशन की सीमा में महत्वपूर्ण बातों को रखता है ।

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