पटना। बिहार के विश्वविद्यालयों में भोजपुरी से स्नातक करने वाले विद्यार्थियों के लिए नए सत्र से पाठ्यक्रम में महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं। अब विद्यार्थी कबीर की उलटबांसियों और भोजपुरी कविताओं को भोजपुरी में पढ़ेंगे। स्नातक के आठवें सेमेस्टर में कबीर साहित्य के विभिन्न आयामों को शामिल किया गया है।
बिहार के राजभवन की वेबसाइट पर भी भोजपुरी के लिए स्नातक कार्यक्रम के तीसरे से आठवें सेमेस्टर के Curriculum and Credit Framework को सूचीबद्ध किया गया है।
भोजपुरी साहित्य में कबीर के योगदान पर विशेष अध्ययन
नए पाठ्यक्रम में हिंदी साहित्य की निर्गुण धारा के साथ कबीर के साहित्य को जोड़ा गया है। विद्यार्थियों को कबीरदास के साहित्यिक योगदान, भक्ति आंदोलन में उनकी भूमिका और भोजपुरी साहित्य में उनके प्रभाव के बारे में पढ़ाया जाएगा। खास बात यह है कि पहली बार कबीर की भोजपुरी कविताओं को भी पाठ्यक्रम के माध्यम से विद्यार्थियों के सामने लाया जाएगा।
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इससे भोजपुरी के विद्यार्थियों को कबीर की वाणी और उनके विचारों को अपनी लोकभाषाई अभिव्यक्ति के संदर्भ में समझने का अवसर मिलेगा।
बिहार के दो वरिष्ठ शिक्षकों की किताबें भी पाठ्यक्रम में
नए सिलेबस में बीआरएबीयू के दो वरिष्ठ शिक्षकों की पुस्तकों को संदर्भ पुस्तक के तौर पर शामिल किया गया है। इनमें प्रो. जयकांत सिंह की ‘भोजपुरी लोक संस्कृति और लोक साहित्य’ तथा पूर्व कुलपति प्रो. रिपुसूदन श्रीवास्तव की ‘बिहार विवि भोजपुरी पद्य संग्रह’ शामिल हैं। इन पुस्तकों को बिहार के विभिन्न विश्वविद्यालयों में भोजपुरी पढ़ने वाले विद्यार्थी संदर्भ सामग्री के रूप में इस्तेमाल करेंगे।
भोजपुरी में पत्रकारिता भी पढ़ेंगे विद्यार्थी
नए पाठ्यक्रम की एक और खासियत भोजपुरी पत्रकारिता को जगह दिया जाना है। विद्यार्थियों को पत्रकार के काम, पत्रकारिता की भाषा, पत्रकारिता के इतिहास और भोजपुरी पत्रकारिता के विकास के बारे में पढ़ाया जाएगा।
इसके साथ ही उन्हें खबर लिखने और शीर्षक बनाने का व्यावहारिक प्रशिक्षण भी पाठ्यक्रम का हिस्सा होगा।
यह पहल भोजपुरी को साहित्य और संस्कृति की भाषा के साथ-साथ आधुनिक पेशेवर संचार और पत्रकारिता की भाषा के रूप में स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है।
सिर्फ साहित्य नहीं, रोजगार से जोड़ने की कोशिश
भोजपुरी पाठ्यक्रम में पत्रकारिता को शामिल किया जाना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे भाषा की पढ़ाई को रोजगार और व्यावहारिक कौशल से जोड़ने की संभावना बढ़ती है। डिजिटल मीडिया, समाचार वेबसाइट, सोशल मीडिया और स्थानीय पत्रकारिता के विस्तार के दौर में भोजपुरी में प्रशिक्षित कंटेंट और पत्रकारिता पेशेवरों की भूमिका बढ़ सकती है।
बिहार के विश्वविद्यालयों में भोजपुरी के लिए पहले से ही अलग स्नातक और स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम उपलब्ध हैं। बीआरए बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर में भी एमए भोजपुरी कार्यक्रम संचालित होने की जानकारी विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर उपलब्ध है।
भोजपुरी के अकादमिक विस्तार की दिशा में कदम
भोजपुरी को विश्वविद्यालयी पाठ्यक्रम में लगातार अधिक स्थान मिलना भाषा के अकादमिक विकास के लिए महत्वपूर्ण है। पूर्णिया कॉलेज द्वारा उपलब्ध पाठ्यक्रम दस्तावेज में भी भोजपुरी के इतिहास, प्राचीन एवं मध्यकालीन काव्य, कथा साहित्य, भाषा विज्ञान, आधुनिक काव्य, लोक साहित्य, आलोचना, पत्रकारिता और नाटक जैसी विधाओं को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया गया है।
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इस लिहाज से कबीर की भोजपुरी कविताओं को पढ़ाना सिर्फ एक साहित्यिक बदलाव नहीं, बल्कि भोजपुरी के ज्ञान, विचार, इतिहास और आधुनिक संचार की भाषा के रूप में विस्तार का संकेत भी है।
भोजपुरी विद्यार्थियों के लिए क्यों खास है यह बदलाव?
कबीर की भोजपुरी कविताएं → लोकभाषा में कबीर की वैचारिक परंपरा को समझने का अवसर।
भोजपुरी लोक संस्कृति और लोक साहित्य → भाषा की सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव।
भोजपुरी पत्रकारिता → भाषा के साथ व्यावहारिक और पेशेवर कौशल।
खबर लेखन और शीर्षक लेखन → विद्यार्थियों को मीडिया के लिए तैयार करने की दिशा में कदम।
भोजपुरी के लिए विश्वविद्यालयी स्तर पर इस तरह का विस्तार आने वाली पीढ़ी को अपनी भाषा में साहित्य पढ़ने के साथ-साथ रोजगार और आधुनिक संचार के नए अवसरों से जोड़ सकता है।
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