कनक किशोर, रांची
Bhojpuri24.com की विशेष शृंखला ‘भोजपुरी धुरंधर’ में आज परिचय ऐसे बहुभाषी साहित्यकार और संस्कृति-साधक से, जिन्होंने नेपाल में भोजपुरी भाषा एवं लोकसंस्कृति के संरक्षण और संवर्द्धन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। रामप्रसाद साह साहित्यकार होने के साथ-साथ संपादक, चित्रकार और सांस्कृतिक कार्यकर्ता भी हैं। अपनी लेखनी, संपादन और संगठनात्मक सक्रियता के माध्यम से उन्होंने भोजपुरी भाषा को नेपाल में मजबूत साहित्यिक आधार देने का महत्वपूर्ण कार्य किया है। वे नेपाली और हिंदी में भी लेखन करते है।
वर्तमान में वे नेपाल भोजपुरी प्रतिष्ठान, बारा के अध्यक्ष हैं और ‘भोजपुरिया माटी’ त्रैमासिक भाषा-साहित्य पत्रिका के संपादक के रूप में भोजपुरी साहित्य की सेवा कर रहे हैं। उनकी रचनाओं में लोकजीवन, आस्था, संस्कृति, मानवीय संवेदना और भोजपुरी समाज की जीवन-दृष्टि के विविध रंग दिखाई देते हैं।
भौंरा टोला से साहित्य की दुनिया तक
रामप्रसाद साह का जन्म 23 जनवरी 1949 को नेपाल के बारा जिले के कलैया उपमहानगरपालिका-14 स्थित भौंरा टोला में हुआ। उनके पिता स्वर्गीय सरयुग साह और माता स्वर्गीय बिसुनमतिया देवी थीं। उनकी धर्मपत्नी स्वर्गीय राम दुलारी देवी थीं। उनकी संतानों में प्रतिमा देवी, प्रदीप कुमार साह और प्रकाश कुमार साह शामिल हैं। उन्होंने स्नातक स्तर तक शिक्षा प्राप्त की। पेशे से वे नक्सानवीश (ओसी) रहे और सेवानिवृत्ति के बाद साहित्य तथा भाषा-संस्कृति के कार्यों में और अधिक सक्रिय रहे।
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रामप्रसाद साह जी के साथ कनक किशोर
भोजपुरी भाषा और संस्कृति के सजग प्रहरी
रामप्रसाद साह का साहित्यिक व्यक्तित्व केवल रचनाकार तक सीमित नहीं है। उन्होंने भोजपुरी भाषा और संस्कृति के संरक्षण, संवर्द्धन और प्रचार-प्रसार को अपने जीवन का महत्वपूर्ण उद्देश्य बनाया। नेपाल भोजपुरी प्रतिष्ठान, बारा के अध्यक्ष के रूप में वे भोजपुरी भाषा-साहित्य की गतिविधियों को आगे बढ़ाने में सक्रिय हैं। वहीं ‘भोजपुरिया माटी’ के संपादक के रूप में उन्होंने साहित्यकारों और रचनाकारों को एक मंच उपलब्ध कराया है।
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उनके संपादन से जुड़ी प्रमुख पत्रिकाओं और पुस्तकों में ‘भोजपुरी सम्मेलन पत्रिका’, ‘पपीहा पुकारे आधी रात’, ‘बिन्दिया सितारा गीत संग्रह’, ‘बारा जिलाको ऐतिहासिक तथा पर्यटकीय स्थलहरू’, ‘भोजपुरिया माटी’, ‘संघतिया’, ‘रामकृष्ण भजनमाला’ और ‘भोजपुरी संजीवनी कविता संग्रह’ आदि उल्लेखनीय हैं।
तीन भाषाओं में साहित्य साधना
रामप्रसाद साह ने भोजपुरी, नेपाली और हिन्दी, तीनों भाषाओं में रचनात्मक योगदान दिया है। उनकी प्रकाशित कृतियां उनकी बहुआयामी साहित्यिक प्रतिभा का परिचय देती हैं। भोजपुरी की ‘खेत ओरिया’ (ग़ज़ल संग्रह), ‘आस्था के देवी गढीमाई’ (एकांकी), ‘रसगर बसंत जवान’ (बिरहा शतक) और ‘ए हीरामन सुगा’ (छन्दबद्ध गीत संग्रह) शामिल हैं। उनकी कृति ‘रसगर बसंत जवान’ को नेपाल का प्रथम बिरहा शतक माना जाता है। इसका अंग्रेजी अनुवाद ‘Piquant Spring’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ है, जो रामप्रसाद साह की साहित्यिक पहचान को नेपाल की सीमाओं से आगे अंतरराष्ट्रीय पाठकों तक पहुंचाता है।
साहित्य के साथ चित्रकला में भी रुचि
रामप्रसाद साह की रचनात्मकता केवल लेखन और संपादन तक सीमित नहीं रही। उन्होंने अनेक पुस्तकों के आवरण चित्र भी निर्मित किए हैं। उनके बनाए प्रमुख आवरण चित्रों में ‘नव प्रज्ञापन’, ‘अश्रु पूरित आँखाहरू’, ‘पपीहा पुकारे आधी रात’, ‘म पनि जान्न’, ‘प्रतिभा र प्रसंग’, ‘भोजपुरिया माटी’, ‘बिन्दिया सितारा’, ‘आस्था के देवी गढीमाई’, ‘भोजपुरी भाषा के उत्पत्ति आ विकास’ और ‘कहाँ गइल ऊ दिन’ आदि शामिल हैं। यह पक्ष उनके व्यक्तित्व को एक ऐसे रचनाकार के रूप में सामने लाता है, जिसमें साहित्य और दृश्य कला का सुंदर मेल दिखाई देता है।

सम्मान और पुरस्कार में भी बहुत आगे
साहित्य, पत्रकारिता तथा भोजपुरी भाषा-संस्कृति के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान को विभिन्न संस्थाओं और सरकारों ने समय-समय पर सम्मानित किया है। उन्हें नारायणी वाङ्मय पुरस्कार, राष्ट्रीय स्तर का ग़ज़ल साधना सम्मान, मधेश रत्न सम्मान–२०७४, मधेश सांस्कृतिक प्रतिष्ठान, गौर द्वारा सम्मान, महामहिम उपराष्ट्रपति परमानन्द झा द्वारा सम्मान, नेपाल हिन्दी प्रतिष्ठान द्वारा सम्मान, मुख्यमंत्री लाल बाबू गद्दी द्वारा सम्मान, अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के 26वें अधिवेशन द्वारा सम्मान, संघीय सरकार द्वारा प्रादेशिक प्रतिभा पुरस्कार, वीरगंज द्वारा सम्मान, उमाशंकर द्विवेदी ‘दधीचि’ राष्ट्रीय पुरस्कार–2026 तथा भोजपुरी प्रज्ञा प्रतिष्ठान, काठमाडौं द्वारा साहित्यिक पत्रकारिता पुरस्कार–2083 प्राप्त हो चुके हैं। इसके अलावा भोजपुरी साहित्य विकास मंच, भारत तथा नेपाल भोजपुरी फाउंडेशन द्वारा उन्हें संयुक्त रूप से अभिनंदित किया गया। बारा महोत्सव–2063 में भोजपुरी लोक संस्कृति पर उनके चित्रों का प्रदर्शन भी हुआ और उन्हें सम्मानित किया गया।
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नेपाल में भोजपुरी साहित्य की मजबूत आवाज
रामप्रसाद साह का साहित्यिक योगदान नेपाल में भोजपुरी भाषा और संस्कृति की जीवंत परंपरा को आगे बढ़ाने से जुड़ा है। उन्होंने रचना के साथ-साथ संपादन, साहित्यिक पत्रकारिता, चित्रकला और सांस्कृतिक गतिविधियों के माध्यम से भोजपुरी के लिए लगातार काम किया है।
उनकी सक्रियता इस बात का उदाहरण है कि किसी भाषा का संरक्षण केवल साहित्य लिखने से नहीं होता, बल्कि उसके लिए साहित्यिक मंच, पत्रिकाएं, संस्थाएं, सांस्कृतिक गतिविधियां और नई पीढ़ी से संवाद भी जरूरी है।
क्यों हैं भोजपुरी धुरंधर?
रामप्रसाद साह को ‘भोजपुरी धुरंधर’ इसलिए कहा जाना चाहिए क्योंकि उन्होंने भोजपुरी भाषा-साहित्य की सेवा कई स्तरों पर की है। वे रचनाकार हैं, संपादक हैं, साहित्यिक पत्रकार हैं, चित्रकार हैं और भोजपुरी भाषा-संस्कृति के सक्रिय संरक्षक भी।
उनकी रचनाओं में भोजपुरी लोकजीवन और मानवीय संवेदना दिखाई देती है तो उनके संपादकीय कार्यों में भाषा और साहित्य को मंच देने की प्रतिबद्धता नजर आती है। नेपाल की धरती पर भोजपुरी साहित्य की निरंतरता और विकास में उनका योगदान विशेष महत्व रखता है।
रामप्रसाद साह का व्यक्तित्व उस साहित्यिक परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें भाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि समाज की स्मृति, संस्कृति की पहचान और लोकजीवन की आत्मा होती है।
नेपाल में भोजपुरी भाषा और साहित्य के संरक्षण एवं संवर्द्धन के लिए समर्पित रामप्रसाद साह की साहित्य साधना आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। ‘भोजपुरी धुरंधर’ शृंखला में उनका नाम एक ऐसे बहुआयामी साहित्यकार के रूप में दर्ज होता है, जिन्होंने लेखनी, संपादन और सांस्कृतिक सक्रियता के जरिए भोजपुरी की समृद्ध परंपरा को आगे बढ़ाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया।

