भोजपुरी कविता की संवेदना, सौंदर्यशीलता और आलोचना-दृष्टि का प्रामाणिक दस्तावेज है -‘भोजपुरी कविता : रुचि आ रचाव’

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समीक्षक : सूर्यदेव पाठक ‘पराग’

भोजपुरी साहित्य में सृजनात्मक विधाओं के समानान्तर आलोचना और समीक्षा- लेखन की परंपरा अपेक्षाकृत कम विकसित रही है। ऐसे समय में वरिष्ठ समीक्षक डॉ. सुनील कुमार पाठक की पुस्तक ‘भोजपुरी कविता : रुचि आ रचाव’ भोजपुरी आलोचना साहित्य को नई दिशा देने वाली महत्वपूर्ण कृति के रूप में सामने आयी है। यह पुस्तक केवल कविताओं की समीक्षा नहीं करती, बल्कि भोजपुरी कविता की विषयवस्तु, शिल्प, संवेदना और विकास-यात्रा का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करती है।

इससे पहले डॉ. सुनील कुमार पाठक की चर्चित समीक्षा कृति ‘पढ़त-लिखत’ प्रकाशित हो चुकी है। वहीं हिंदी में उनकी शोधपरक पुस्तक ‘छवि और छाप:राष्ट्रीयता के आलोक में भोजपुरी कविता का पाठ ‘ भी आलोचना के क्षेत्र में चर्चित रही है। ‘भोजपुरी कविता : रुचि आ रचाव’ उनकी आलोचना-दृष्टि की परिपक्वता का अगला महत्वपूर्ण पड़ाव है।

कविता के कथ्य और शिल्प का संतुलित विश्लेषण

डॉ. सुनील कुमार पाठक स्वयं भूमिका में स्पष्ट करते हैं कि इस पुस्तक का उद्देश्य भोजपुरी कविता के ‘रुचि’ (कथ्य) और ‘रचाव’ (शिल्प) पर गंभीर विमर्श करना है। यही दृष्टि पूरी पुस्तक में दिखाई देती है। वे किसी भी कवि या काव्य-कृति पर लिखने से पहले उसके व्यापक अध्ययन, संदर्भ और साहित्यिक पृष्ठभूमि को समझते हैं। परिणामस्वरूप उनकी समीक्षा तथ्यपूर्ण, संतुलित और विश्वसनीय बनती है।

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दो खंडों में भोजपुरी कविता का विस्तृत परिदृश्य

पुस्तक दो प्रमुख खंडों में विभाजित है। पहले खंड में भोजपुरी की किसानी कविता और भिखारी ठाकुर पर केंद्रित विस्तृत शोधपरक आलेख हैं। किसान -जीवन, श्रम, संघर्ष और लोकसंवेदना पर आधारित लगभग सौ कविताओं के उदाहरणों के माध्यम से लेखक भोजपुरी की कृषक- चेतना का समग्र मूल्यांकन करते हैं। वहीं भिखारी ठाकुर पर केन्द्रित हिंदी और भोजपुरी के कवियों द्वारा लिखी गई कविताओं का तुलनात्मक विश्लेषण पुस्तक की विशेष उपलब्धि है।

चौदह महत्वपूर्ण कवियों का आलोचनात्मक मूल्यांकन

पुस्तक का दूसरा खंड भोजपुरी के चौदह महत्वपूर्ण कवियों और साहित्यकारों के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर केंद्रित है। इनमें मास्टर अजीज, रामजियावन बावला, सिपाही सिंह ‘श्रीमंत’, डॉ. रामदरश मिश्र, शारदानंद प्रसाद, डॉ. केदारनाथ सिंह, प्रो. हरिकिशोर पांडेय, बच्चू पांडेय, राधामोहन चौबे ‘अंजन’, माहेश्वर तिवारी, डॉ. विश्वरंजन, गंगा प्रसाद ‘अरुण’, शशि प्रेमदेव और गुलरेज शहजाद जैसे रचनाकारों की काव्य-यात्रा का गंभीर विश्लेषण किया गया है।

प्रत्येक अध्याय में केवल प्रशंसा नहीं, बल्कि रचनाओं की खूबियों और सीमाओं का निष्पक्ष मूल्यांकन भी किया गया है। यही आलोचक की सबसे बड़ी पहचान है।

निष्पक्ष आलोचना पुस्तक की सबसे बड़ी शक्ति

डॉ. सुनील कुमार पाठक की समीक्षा-दृष्टि का सबसे उल्लेखनीय पक्ष उनकी निष्पक्षता है। वे किसी भी कवि के प्रति पूर्वाग्रह या मोह से मुक्त होकर रचना को उसकी साहित्यिक कसौटी पर परखते हैं। यहाँ वरिष्ठ और युवा रचनाकारों के बीच कोई भेदभाव नहीं दिखाई देता। जहाँ उत्कृष्टता है, वहाँ प्रशंसा है और जहाँ कुछ कमियाँ रह गई हैं, वहाँ स्पष्ट टिप्पणी भी मिलती है। यही कारण है कि यह पुस्तक केवल स्वस्थ आलोचना ही नहीं, बल्कि सार्थक और सकारात्मक साहित्यिक परामर्श का कार्य भी करती है।

शोध, संदर्भ और उद्धरणों से समृद्ध कृति

पुस्तक की एक बड़ी विशेषता यह भी है कि इसमें भोजपुरी कविता के अनेक उद्धरणों और संदर्भों का समावेश किया गया है। इससे पाठक केवल आलोचना नहीं पढ़ता, बल्कि विभिन्न कवियों की रचनाशैली और काव्य-संवेदना का भी प्रत्यक्ष अनुभव करता है। पुस्तक शोधार्थियों, विद्यार्थियों और भोजपुरी साहित्य के गंभीर पाठकों के लिए उपयोगी संदर्भ ग्रंथ का रूप ले लेती है।

समासत: कहा जा सकता है कि ‘भोजपुरी कविता : रुचि आ रचाव’ भोजपुरी आलोचना साहित्य की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। यह पुस्तक भोजपुरी कविता की परंपरा, विकास, संवेदना और सौंदर्य-दृष्टि को समझने का प्रामाणिक दस्तावेज प्रतीत होती है। डॉ. सुनील कुमार पाठक ने अपनी गहन अध्ययनशीलता, आलोचनात्मक दृष्टि और संतुलित भाषा के माध्यम से यह सिद्ध किया है कि भोजपुरी साहित्य में गंभीर समीक्षा लेखन की मजबूत परंपरा आज विकसित हो रही है।

भोजपुरी कविता को समझने, उसके विकास-क्रम का अध्ययन करने और समकालीन साहित्यिक विमर्श को जानने के इच्छुक प्रत्येक पाठक के लिए यह पुस्तक संग्रहणीय और अनिवार्य रूप से पठनीय है।

प्रकाशक : भोजपुरी प्रकाशन,नई दिल्ली
मूल्य- 349/-रूपये।

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