सूफी परंपरा, भोजपुरी गजल और साहित्य के सजग प्रहरी हैं डॉ. जौहर शफियावादी

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Bhojpuri24.com की विशेष श्रृंखला ‘भोजपुरी धुरंधर’ में आज परिचय भोजपुरी साहित्य के ऐसे विलक्षण रचनाकार से, जिन्होंने भोजपुरी, हिन्दी और उर्दू साहित्य को अपनी बहुआयामी प्रतिभा से समृद्ध किया। डॉ. जौहर शफियावादी ने भोजपुरी गजल को नई पहचान दी, सूफी परंपरा और लोक संस्कृति के बीच साहित्यिक संवाद स्थापित किया और अपनी रचनाओं के माध्यम से भाषा, संस्कृति और इंसानी मूल्यों की आवाज को बुलंद किया।

वे कवि, कथाकार, चिंतक और सबसे बढ़कर भारतीय भाषाई एवं सांस्कृतिक परंपराओं के गंभीर अध्येता हैं। अरबी, फारसी, उर्दू, संस्कृत, हिन्दी और भोजपुरी जैसी भाषाओं पर उनकी समान पकड़ उन्हें एक विशिष्ट साहित्यकार के रूप में स्थापित करती है। भोजपुरी पुरुष, भोजपुरी रत्न और सूफी रत्न जैसी उपाधियां उनके साहित्यिक योगदान की पहचान हैं।

सूफी संत परिवार में जन्मे साहित्य साधक

डॉ. जौहर शफियावादी का पूरा नाम ख्वाजा मोहम्मद इमामुद्दीन निजामी है। उनका जन्म 20 सितंबर 1950 को बिहार के गोपालगंज जिले के शफियावाद शरीफ में एक प्रसिद्ध सूफी संत परिवार में हुआ। सूफी परंपरा, आध्यात्मिक चिंतन और लोक संस्कृति के संस्कारों ने उनके व्यक्तित्व और साहित्य को गहराई प्रदान की। यही कारण है कि उनकी रचनाओं में प्रेम, मानवता, आध्यात्मिकता और सामाजिक समरसता के स्वर प्रमुखता से दिखाई देते हैं।

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भोजपुरी के प्रयोग धर्मी कवि, भोजपुरी आंदोलन के प्रथम मुखर आंदोलन कर्मी डॉ. जौहर शफियावादी अरबी, फारसी, उर्दू, संस्कृत, हिन्दी और भोजपुरी के जानकार कवि-कथाकार के रूप में सम्मानित हैं। उनकी हिन्दी, उर्दू और भोजपुरी में दर्जन भर से अधिक पुस्तकें देश-विदेश से प्रकाशित हो चुकी हैं। आप वर्तमान में छत्तीसगढ़ के रायपुर में रहते हैं।

भोजपुरी गजल को मिला नया आयाम

डॉ. जौहर शफियावादी का सबसे महत्वपूर्ण योगदान भोजपुरी गजल के क्षेत्र में माना जाता है। उनकी कृति ‘रंगमहल’ भोजपुरी गजल का पहला दीवान मानी जाती है, जिसने भोजपुरी साहित्य में गजल विधा को नई पहचान दी।

उन्होंने भोजपुरी में केवल रचना ही नहीं की, बल्कि भोजपुरी साहित्य की विभिन्न विधाओं के विकास और दस्तावेजीकरण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

उनकी चर्चित कृतियों में ‘रंगमहल’ (प्रथम भोजपुरी गजल महाकाव्य-दीवान), ‘भोजपुरी जौहर दोहावली’ (प्रथम भोजपुरी दोहावली), ‘बरोहर’ (भोजपुरी गजल संग्रह), ‘आँख’ (भोजपुरी का प्रथम एकल ललित निबंध संग्रह), ‘पूर्वी के बाह’ (भोजपुरी का प्रथम ऐतिहासिक उपन्यास) आदि प्रमुख हैं।

भोजपुरी साहित्य और भाषा आंदोलन के योद्धा

डॉ. जौहर शफियावादी केवल साहित्यकार ही नहीं, बल्कि भोजपुरी भाषा आंदोलन के सक्रिय योद्धा भी रहे हैं।

भोजपुरी को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराने के लिए उन्होंने 1970 ई. में गोपालगंज अनुमंडलाधिकारी कार्यालय के सामने आमरण अनशन किया था। इसके बाद भी वे लगातार भोजपुरी के संवैधानिक सम्मान के लिए संघर्ष करते रहे हैं।

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वे प्रत्येक तीन महीने पर सरकार और भोजपुरिया सांसदों को अपने खर्च से ज्ञापन भेजकर भोजपुरी के अधिकार की आवाज उठाते रहे हैं। जयप्रकाश विश्वविद्यालय, छपरा में भोजपुरी स्नातकोत्तर की पढ़ाई शुरू होना भी भोजपुरी आंदोलन की उपलब्धियों में शामिल है।

उन्होंने भोजपुरी का पहला समग्र राष्ट्रीय यशोगान ‘मितवा’ फरवरी 2009 में लिखा, जो 22 मार्च 2010 को प्रकाशित हुआ।

साहित्य की कई विधाओं में सक्रिय योगदान

डॉ. जौहर शफियावादी ने कविता, कहानी, गजल, अनुवाद, आलोचना और शोध जैसे क्षेत्रों में अपनी रचनात्मक उपस्थिति दर्ज कराई है।

उनकी प्रमुख भोजपुरी कृतियां हैं-

धरोहर- भोजपुरी गजल संग्रह (1992)
आँख -भोजपुरी का प्रथम एकल ललित निबंध संग्रह (1992)
नातिया कलाम भाग-1 और भाग-2
रंगमहल — प्रथम भोजपुरी गजल महाकाव्य-दीवान (2007)
भोजपुरी जौहर दोहावली — प्रथम भोजपुरी दोहावली (2017)
गीत-गगन (2016)


कबिरा खड़ा बाजार में (2010)
भोजपुरी साहित्य के विकास यात्रा
वेद आ कुरआन : एक अवलोकन (2001)


हम कहां जाई — कथा संग्रह (1984)
भोजपुरी गजल एक अवलोकन (2008)
पूर्वी के धाह- भोजपुरी का प्रथम ऐतिहासिक उपन्यास (नेशनल बुक ट्रस्ट इंडिया द्वारा प्रकाशित)

इसके अलावा भोजपुरी व्याकरण, भोजपुरी संत काव्य धारा और भोजपुरी में कुरआन शरीफ के अनुवाद जैसी महत्वपूर्ण कृतियां भी उनके साहित्यिक योगदान का हिस्सा हैं।

हिन्दी-उर्दू और भोजपुरी के बीच साहित्यिक सेतु

डॉ. जौहर शफियावादी ने हिन्दी, उर्दू और भोजपुरी तीनों भाषाओं में समान अधिकार से लेखन किया। उर्दू में भी उनकी एक दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।

वे विभिन्न साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं के संपादन से भी जुड़े रहे हैं। उन्होंने ‘खुशबू’ (त्रैमासिक उर्दू पत्रिका, मुजफ्फरपुर), ‘लालमाटी’ साप्ताहिक पत्र, ‘भोजपुरी साहित्य सम्मेलन पत्रिका’, ‘प्रकाश भारती’ हिन्दी दैनिक, ‘शेरे छत्तीसगढ़’ और ‘भोजपुरी संवाद’ जैसी पत्रिकाओं में संपादकीय जिम्मेदारियां निभाईं।

राष्ट्रपति द्वारा जामिया मिल्लिया इस्लामिया सीनेट के सदस्य नामित

डॉ. जौहर शफियावादी की साहित्यिक और शैक्षणिक उपलब्धियों को देखते हुए महामहिम राष्ट्रपति द्वारा उन्हें केन्द्रीय विश्वविद्यालय जामिया मिल्लिया इस्लामिया के सीनेट (अंजुमन) के सदस्य के रूप में नामित किया गया।

यह सम्मान उनके बहुभाषी साहित्यिक योगदान और शिक्षा क्षेत्र में उनकी भूमिका की राष्ट्रीय स्वीकृति है।

क्यों हैं भोजपुरी धुरंधर?

डॉ. जौहर शफियावादी को भोजपुरी धुरंधर इसलिए कहा जाना चाहिए क्योंकि उन्होंने भोजपुरी गजल को नई पहचान दी, भोजपुरी साहित्य की कई विधाओं को समृद्ध किया और भाषा आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई।

वे उस परंपरा के साहित्यकार हैं, जहां साहित्य केवल रचना नहीं बल्कि समाज, संस्कृति और भाषा की अस्मिता की रक्षा का माध्यम बन जाता है।

सूफी संस्कारों, लोक चेतना और साहित्यिक साधना से निर्मित डॉ. जौहर शफियावादी का व्यक्तित्व भोजपुरी साहित्य की अमूल्य धरोहर है। उनकी रचनात्मक यात्रा आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी रहेगी।

भोजपुरी धुरंधर श्रृंखला में डॉ. जौहर शफियावादी उस साहित्य साधक के रूप में दर्ज हैं, जिन्होंने भोजपुरी, हिन्दी और उर्दू के बीच एक मजबूत साहित्यिक पुल तैयार किया और भोजपुरी भाषा की प्रतिष्ठा के लिए जीवनभर संघर्ष किया।

 

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