कनक किशोर, राँची, झारखंड
संत समता की अवधारणा के पोषक होते हैं। भोजपुरिया संस्कृति में संतोष और समरसता गहराई तक भरी हुई है। संभवतः इसका कारण भोजपुरी क्षेत्र का लोक संतों की धरती होना है। डॉ. जयकांत सिंह ‘जय’ कहते हैं कि- ‘भक्ति रूपी माँ से प्रेम-भावना और ज्ञान रूपी पिता से स्वबोधी दर्शन पाकर जब किसी सौभाग्यशाली मनुष्य का जीवन सहज-स्वाभाविक, शुद्ध-सात्त्विक एवं साधनारत सर्वमंगलकारी हो जाता है तो वह सरिता-सरोवर के निर्मल जल सरिस संत-हृदय वाला हो जाता है। उनके मन से मद-मोह तो मिट ही जाता है, उनके चित्त की चंचलता भी समाप्त हो जाती है और वे अपने आराध्य के प्रति पूर्णतः समर्पित होकर सबमें उन्हीं के दर्शन करने लगते हैं।’
यहाँ दो बातें आती हैं- सर्वमंगलकारी और सबमें इष्ट का दर्शन। ये दोनों बातें समष्टि के द्योतक हैं। संत जीवन स्वकल्याण के पथ पर बढ़ता है, परंतु मंजिल पर पहुँचकर लोक कल्याणकारी पथ का अनुगामी बन लोक संत का दर्जा प्राप्त करता है। भोजपुरी क्षेत्र (पूर्वांचल) की धरती लोक संतों की ही धरती रही है और उन्होंने अपनी अनुभूतियों को ही लोक मंगल के उद्देश्य से साहित्य का रूप दिया है।
संत साहित्य काव्य प्रधान रहा है, लेकिन उसका उद्देश्य अपने काव्य कौशल का प्रदर्शन करना नहीं रहा। उसका प्रधान लक्ष्य सगुण उपासक भक्तजनों की तरह अपने इष्ट देव का गुणगान करना नहीं था। संतों ने आत्मचिंतन और स्वानुभूति के आधार पर समय-समय पर काव्य और गद्य का निर्माण किया था। संत लोग पढ़े-लिखे कम थे और काव्य कला से परिचित भी नहीं थे। मठ/आश्रम के मत-प्रचार के लिए और मानव कल्याण के लिए पद रचनाओं का निर्माण कर उन्होंने अपने-अपने ढंग से उसका निर्वहन किया है। उन्होंने अपने शब्दों में अपने भाव को एक विशेष शैली में व्यक्त करने का प्रयास किया है।
मिला-जुलाकर संत साहित्य स्वतः प्रसूत हृदय का उद्गार है, जिसे सुंदर कहा जा सकता है। इसकी मिठास और सुंदरता अपने ढंग की अलग है। अब सवाल उठता है कि संत साहित्य पर बात क्यों की जाए? लोक से इसका क्या संबंध है? इसका जवाब हम आदरणीय राजेंद्र रंजन चतुर्वेदी के शब्दों में कहेंगे कि-
‘भारत की संत परंपरा और भारत की लोकचेतना अभिन्न है। लोकचेतना में बिना भेदभाव के विविध जाति, विविध वर्ग, विविध संप्रदाय, विविध स्तर सम्मिलित हो जाते हैं। लोकचेतना विभक्त चेतना नहीं होती। लोकचेतना सर्वचेतना होती है, अविभक्त चेतना होती है। लोकचेतना में अध्यात्म का सूत्र अंतर्निहित होता है। लोकचेतना में मानुष-भाव प्रतिष्ठित होता है। लोकचेतना का भाव सात्त्विक होता है। लोकचेतना में वैश्विक दृष्टिकोण होता है। अभिनव जीवन-मूल्यों की प्रतिष्ठा होती है।’
तो यह कहा जा सकता है कि लोकचेतना अध्यात्म, ईमानदारी, सामाजिकता का भाव, श्रम, समानता और लोककल्याण के जीवन-मूल्यों को अपने में समेटे हुए है। लोकचेतना में मानवीय संवेदना होती है। सच्चाई तो यह है कि लोकचेतना मूलतः मानवीय चेतना ही होती है। संत परंपरा लोकजीवन में रची-बसी हुई है। संत परंपरा लोक मन की अभिव्यक्ति है। संत परंपरा लोकजीवन का उद्वेलन है, लोकजीवन की शक्ति है। संत परंपरा का ज्ञान संत साहित्य से मिलता है। संत साहित्य संत परंपरा की धरोहर है, इसलिए उस थाती को जीवित रखने के लिए संत साहित्य पर बात होनी चाहिए और खूब होनी चाहिए।
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कबीर दास जैसे संतों की परंपरा की शुरुआत 15वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में हुई। स्वामी रामानंद, रैदास आदि संतों के काव्य के भाव लगभग एक जैसे मिलते हैं और संत मत के प्रचार में इन लोगों का सहयोग भी लगभग एक जैसा है। कबीर सभी धर्मों के मूल सिद्धांतों का आदर करते थे, लेकिन दिखावा, ढोंग और बाहरी आडंबर के प्रबल विरोधी थे। भगवान के नाम पर ढोंग रचने और स्वार्थ साधने वालों को खरी-खोटी सुनाने में वे कभी पीछे नहीं रहते थे। कबीर के सभी कार्यकलाप लोकहित में रहे।
दरिया दास (सं. 1731-1837) का दरियादासी संप्रदाय, संत शिवनारायण का शिवनारायणी संप्रदाय, बाबा धरनीदास का धरनीश्वरी संप्रदाय, सखी संप्रदाय, सरभंग संप्रदाय आदि अनेक पंथ सामने आए और अपने-अपने क्षेत्र में उनका प्रचार होने लगा। बुल्लेशाह, बाबा कीनाराम जैसे संत हुए, जिन्होंने संत मत का प्रचार किया।
कहने का मतलब यह है कि संत मत किसी पंथ या संप्रदाय विशेष के प्रचलित सिद्धांत या उपदेश का संग्रह मात्र नहीं है। वह वास्तव में संतों के अनुभव का सार है। साम्प्रदायिक और सामाजिक भेदभाव की आलोचना तथा ‘संत’ के सत् के प्रतीक स्वरूप संत साहित्य में देखने को मिलते हैं। सामाजिक और साम्प्रदायिक भेदभाव की आलोचना तथा लोक में व्याप्त विद्रूपताओं का प्रतिरोध भी दिखाई देता है। संतों की साखियों में उनके अनुभव स्पष्ट दिखाई पड़ते हैं, जो हमें कठिनाई की घड़ी में मन के उलझनों को सुलझाने में काम आते हैं।
कबीर पंथ के ग्रंथ ‘बीजक’ में कहा गया है –
‘साखी आँखी ज्ञान की, समुझि देखु मनमाहिं।
बिनु साखी संसार का, भगरा छूटत नाहिं।।’
अब हम बात उदाहरण के साथ कबीर एवं कुछ अन्य भोजपुरिया संत साहित्य को लेकर लेकर करेंगे।एक पद में साहेब ने कहा है-
जड़ बिनु बेल, बेल बिनु तुम्बा,
बिना फूले फल होई।
कहे कबीर सुनो हे संतो,
गुरु बिन ज्ञान न होई।।
ज्ञान पाने का तरीका साहेब ने बताया है जिसे सभी संत ने स्वीकारा है। ज्ञान का तात्पर्य है आत्म ज्ञान, जो जीवन पथ को आलोकित कर वासुदेव कुटुम्बकम, समिष्ट भाव, मानवतावाद और आत्म कल्याण का पाठ पढ़ाता है।
एक पद में हिन्दू मुस्लिम दोंनों को लताड़ते हुए कबीर कहते हैं –
हिन्दू कहै मोहि राम पियारा,तुर्क कहै रहमाना।
आपस में दोउ लड़ी मुए, मरम न कोउ जाना।।
साथ सलाह देते कबीर कहते हैं कि-
राम रहीमा एक है, नाम धराया दोय।
कहै कबीरा दो नाम सुना,भरम परौ मति कोय।।
पंडित वेद पुराण पढ़े औ मौला पढ़े कुराना।
कह कबीर वे नरक गए, जिन हरदम राम न जाना।।
समाज में मजबूती से खड़े धरम – मजहब, जाति – पाति, ऊँच – नीच के विरोध में कबीर की मुखरता देखते बनता है-
जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान।
मोल करो तलवार का,पड़ा रहने दो म्यान।।
कबीर के काव्य में विद्रोह और प्रतिरोध के जो स्वर मिलते हैं उससे उनके दर्शन को प्राण वायु मिलता रहे चुकी उनका प्रतिरोध लोक हित में है। जाति से कोई श्रेष्ठ नहीं होता इसे बड़ी सुंदर ढंग से तर्क, विचार आ उदाहरण से स्थापित करते हुए कहा है कि –
‘जो तू बाभन बभनी जाया। तो ज्ञान बाट है क्यों नहीं आया।।’
कबीर बड़ी ऊंचे स्वर में जाति के आधार पर ऊँच – नीच के बंटवारा का विरोध करते हुए अपने अनेक पदों में अपनी बात रखी है।
आध्यात्मिकता वास्तव में तप है जो हमे सिखाती है प्रतिकूलता में रहना , दुख को सहन करना। आप में यदि नैतिकता हैं तो अहिंसा,अक्रमता, अक्रोधता, निर्लोभता की सिद्धि आयेगी ही नहीं। संत दरिया दास जी के जीवन पथ पर चलने की सीख देने वाली दो पद नीचे दी जा रही हैं, उन दोनों पदों में दी गई सीख हमें अध्यात्मिक तप में तपा जीना सिखलाता है, लोक चेतना जागृत कर एक सफल जीवन का मंत्र देता है।
सुरति निरति नेता हुआ, मटुकी हुआ शरीर।
दया दधि विचारिये, निकलत घृत तब थीर॥
रे नर तोहीं केतिक धीरकारों।
धीक-धीक जीवन जीये जग माहीं, मैं-मैं करत हमारो॥
विषय भाव रस रहि-रहि माँगत, करत गर्व हँकारो।
उलटि लगे नहिं चरण कमल पर, लिपटत फिरे बिकारो॥
गर्भबास जिन्हि जल जावन दिन्हाँ, रचि-रचि पिंड सँवारो।
मरकट मुट्ठी ज्यों गहि के लागेव, ब्याधा बान सर मारो॥
चारो पन गवायो गर्वी, भर्मि भर्मि भै हारो।
कहे ‘दरिया’ सर्वस परबस, हाथ जुवाड़ी झारो॥
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रैदास के लोक चेतना जागरण के कुछ दोहे –
मस्जिद सों कुछ घिन नहीं, मंदिर सों नहीं पिआर।
दोए मंह अल्लाह राम नहीं, कहै रैदास चमार॥
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माथे तिलक हाथ जपमाला, जग ठगने कूं स्वांग बनाया।
मारग छाड़ि कुमारग उहकै, सांची प्रीत बिनु राम न पाया॥
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जनम जात मत पूछिए, का जात अरू पात।
रैदास पूत सब प्रभु के, कोए नहिं जात कुजात॥
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ऊँचे कुल के कारणै, ब्राह्मन कोय न होय।
जउ जानहि ब्रह्म आत्मा, रैदास कहि ब्राह्मन सोय॥
संत रूपकला महाराज की एक गीत –
संत वेद मारग बतावें ताही बीच चलु,
जहँ सुख मोद सब तोर रे बटोहिया।।
दर्शक सुपथ औ सहायक श्री सदगुरु,
पद गहु छल आदि छोर रे बटोहिया।।
लेइ संग संबल अमिय सम राम नाम,
प्रभु पास चलु देइ ढ़िंढ़ोर रे बटोहिया।।
माया बस आनंद सुबास तजि भटकत,
साँसति लहत तू अथोर रे बटोहिया।।
मान मोर सिखवन परम सुहित जानि,
बार बार करिं हम निहोर रे बटोहिया।।
संतों की सीखों पर चलने से जीव का कल्याण होगा। उनके कथनों के भाव को आत्मसात कर ही हम मानव अपने को बुद्ध बनाने में सफल होंगे। भोजपुरिया संत परंपरा की रेखा बहुत लंबी है और अभी भी बढ़ रही है। उसमें व्याप्त हीरा-मोती को संरक्षित करना ही होगा।
संतों की दृष्टि निरंजन और लोककल्याणकारी थी। इसकी पुष्टि उनके सद्ग्रंथ करते हैं, जिनमें खोजने पर भी व्यष्टि भाव दिखाई नहीं देता है। हमें सत्य की समझ संत साहित्य देता है। प्रेम का पाठ संत साहित्य पढ़ाता है। यही जीवन मंत्र हमारे दूसरे लोक संतों के काव्य में मिलता है और वे मंत्र हमारे भीतर लोक चेतना के मूल मंत्र हैं।
देखा जाए तो अकेले-अकेले रहने वाले को धर्म की क्या जरूरत है? पर जब समाज का विकास होता है, तब कुछ वर्जनाओं और मर्यादाओं की जरूरत होती ही है। जब समाज में रहना पड़ता है, तब कोई न कोई मर्यादा और मूल्य बनाने ही पड़ते हैं और दूसरों का ख्याल रखना ही पड़ता है। दूसरों का ख्याल रखना ही धर्म है, बाकी सब जग विधान है। धर्म सामाजिक नियम, सामाजिक विचार और सामाजिक मर्यादा है, जिसे समाज लोकहित में रचता है। कुछ लोग धर्म का अर्थ अपने अनुसार समझते हैं और कुछ लोग अपने मत के अनुसार। इससे संसार में अराजकता पैदा हो जाती है। वास्तव में किसी भी शब्द का अर्थ लोक के द्वारा ही प्रमाणित होता है।
हम अपने अंत:करण में यदि झाँककर देखें तो विराजमान शत्रुओं में काम प्रमुख शत्रु है। हमारा संत समाज हमें कठोर कर्म सिद्धांत के विषय में जागरूक करने का कार्य करता है। ईश्वर ने मनुष्य को संसार में सर्वश्रेष्ठ जीव बनाकर भेजा है। उसे विवेक शक्ति का उपहार दिया है, ताकि वह सोच-समझकर जीवन में आगे बढ़े। मनुष्य यदि अपना जीवन नियमानुसार और संयमपूर्वक व्यतीत करे तो इस काम रूपी शत्रु पर विजय प्राप्त करके इससे किनारा कर सकता है। हमारा संत साहित्य हमें जो जीवन-मूल्य अपनाने का विमर्श देता है, वे शायद ही अन्यत्र कहीं उपलब्ध हों। इन जीवन-मूल्यों को अपनाने से मनुष्य में दैवी गुण आ जाते हैं। उन्हें धारण कर मनुष्य समाज में अपना अनुकरणीय स्थान बनाने में सफल हो जाता है। मुझसे कोई पूछे कि मानवतावाद का पाठ किस साहित्य ने लोक में प्रतिष्ठित किया है, तो मैं कहूंगा— संत साहित्य। ऐसे साहित्य हमारे लिए थाती हैं। इसके अनेक कारण हैं, जिन्हें लोकवार्ताकार राजेंद्र रंजन चतुर्वेदी ने बताया है-
- लोकभाषा: संत साहित्य अक्सर लोकभाषा में लिखा जाता है, जो आम लोगों की भाषा होती है। इससे यह साहित्य अधिक लोगों तक पहुँचता है और उनकी भावनाओं को व्यक्त करता है।
- आध्यात्मिकता: संत साहित्य में आध्यात्मिकता और भक्ति की भावना को प्रमुखता से दर्शाया जाता है। यह साहित्य लोगों को आध्यात्मिक मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता है।
- नैतिकता और मूल्य: संत साहित्य में नैतिकता और मूल्यों को बढ़ावा दिया जाता है। यह साहित्य लोगों को अच्छे आचरण और नैतिक मूल्यों के महत्व को समझने में मदद करता है।
- सामाजिक संदेश: संत साहित्य में अक्सर सामाजिक संदेश होते हैं, जो लोगों को सामाजिक मुद्दों के प्रति जागरूक करते हैं और उन्हें समाज के लिए कुछ करने के लिए प्रेरित करते हैं।
संत साहित्य एक सांस्कृतिक धरोहर है, जो हमारी संस्कृति और परंपराओं को दर्शाता है। यह लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत है, जो उन्हें अपने जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए प्रेरित करता है। इस प्रकार संत साहित्य लोक की थाती होने के साथ-साथ एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और आध्यात्मिक धरोहर भी है। तो अंत में यही कहूंगा- चलो उस कबीर के देश, जहाँ मोती भरी पड़ी है –
समन्दरा वा मोती रे
चल हंसा वा देश। (End)

