चंदौली के लाल डॉ. केशरी नारायण त्रिपाठी का निधन, भोजपुरी अंचल ने खोया हिंदी के सबसे बड़े प्रहरी में एक

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डॉ0 सुधाकर तिवारी

वाराणसी/चंदौली। भोजपुरी अंचल के लिए शुक्रवार का दिन बेहद दुखद रहा। चंदौली जिले की माटी में जन्मे प्रख्यात हिंदीसेवी, विद्वान लेखक और हिंदी संस्थाओं के मजबूत स्तंभ डॉ. केशरी नारायण त्रिपाठी का शुक्रवार, 31 जुलाई 2026 को वाराणसी के एपेक्स हॉस्पिटल में निधन हो गया। कुछ दिन पहले उन्हें ब्रेन स्ट्रोक आने के बाद अस्पताल में भर्ती कराया गया था, लेकिन चिकित्सकों के तमाम प्रयासों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका।

डॉ. त्रिपाठी के निधन से चंदौली, वाराणसी, मिर्जापुर, सोनभद्र समेत पूरे भोजपुरी अंचल में शोक की लहर है। हिंदी साहित्य जगत ने अपना एक ऐसा कर्मयोगी खो दिया, जिसने पूरी जिंदगी हिंदी भाषा, साहित्य और साहित्यिक संस्थाओं को मजबूत बनाने में लगा दी।

भोजपुरी माटी का वह सपूत जिसने हिंदी को समर्पित कर दिया जीवन

1 जून 1937 को वर्तमान चंदौली जिले के रामपुर गांव में जन्मे डॉ. केशरी नारायण त्रिपाठी ने साधारण ग्रामीण परिवेश से निकलकर हिंदी साहित्य में असाधारण पहचान बनाई। सैयदराजा से इंटरमीडिएट करने के बाद उन्होंने डीएवी डिग्री कॉलेज, वाराणसी से स्नातक, काशी विद्यापीठ से हिंदी में एम.ए. तथा काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) से पीएचडी की उपाधि प्राप्त की।

उन्होंने शिक्षा को केवल डिग्रियों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे भारतीय भाषाओं और संस्कृति की सेवा का माध्यम बनाया।

हिंदी संस्थाओं को नई ताकत देने वाले साहित्यकार

वर्ष 1964 से 1975 तक उन्होंने काशी नागरीप्रचारिणी सभा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके बाद हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयागराज से जुड़कर उन्होंने अपना पूरा जीवन हिंदी भाषा और साहित्यिक संस्थाओं के सशक्तीकरण के लिए समर्पित कर दिया।

डॉ. त्रिपाठी उन विरले साहित्यकारों में थे, जिन्होंने व्यक्तिगत प्रसिद्धि से अधिक संस्थाओं को मजबूत बनाने और हिंदी के भविष्य को सुरक्षित करने को अपना लक्ष्य बनाया।

‘हिंदी गद्य का इतिहास’ बनी शोधार्थियों की पहली पसंद

उनकी चर्चित पुस्तक ‘हिंदी गद्य का इतिहास’ आज भी हिंदी के विद्यार्थियों और शोधार्थियों के लिए महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ मानी जाती है। हिंदी भाषा, साहित्यिक इतिहास और भाषा आंदोलन में उनके योगदान को लंबे समय तक याद किया जाएगा।

कई प्रतिष्ठित सम्मानों से हुए सम्मानित

डॉ. केशरी नारायण त्रिपाठी को हिंदी भाषा और साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए अनेक सम्मान मिले। वर्ष 2016 में उन्हें ‘भारती शिखर सम्मान’ से सम्मानित किया गया। वर्ष 2021 में उत्तर प्रदेश सरकार ने उनकी पुस्तक ‘हिंदी गद्य का इतिहास’ के लिए प्रतिष्ठित ‘किशोरीदास वाजपेई पुरस्कार’ प्रदान किया।

वर्ष 2023 में काशी नागरीप्रचारिणी सभा में हुए प्रशासनिक सुधारों और संस्था को नई दिशा देने में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।

भोजपुरी अंचल के लिए अपूरणीय क्षति

डॉ. केशरी नारायण त्रिपाठी का जाना केवल हिंदी साहित्य की क्षति नहीं है, बल्कि भोजपुरी अंचल ने भी अपना एक गौरवशाली सपूत खो दिया है। चंदौली की धरती आज उस विद्वान को नम आंखों से विदाई दे रही है, जिसने जीवनभर भारतीय भाषाओं, हिंदी साहित्य और सांस्कृतिक विरासत की सेवा को अपना धर्म माना।

उनका सादा व्यक्तित्व, गहन विद्वता और भाषा के प्रति समर्पण आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा।

उनके निधन का समाचार मिलते ही काशी नागरीप्रचारिणी सभा में शोकसभा आयोजित की गई। संस्था के सभी विभाग बंद कर दिए गए। सभा के प्रधानमंत्री व्योमेश शुक्ल ने कहा कि डॉ. केशरी नारायण त्रिपाठी के निधन से हिंदी साहित्य सम्मेलन, काशी नागरीप्रचारिणी सभा सहित उत्तर भारत की हिंदीसेवी संस्थाओं ने अपना एक भरोसेमंद मार्गदर्शक और अभिभावक खो दिया है।

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