चतुर्मास विशेष आज बात बतकही में
केहू सावन में त केहू शिरात में, केहू देवघर में त केहू काशी में, केहू भांगि – गांजा में त केहू बेलि के पात में, केहू भजन – आरती में त केहू उपवास में, केहू भोला के बरात में त केहू अपने जिरात में, केहू सावन में त केहू बारहो मास सोझ भोला के खोजे में अझुराइल बा। आपन शिव मंदिर बा गांव में बाकिर बाबा के आजुले शिवाला पर जात ना देखनीं। अइसन ना कि उहां के नास्तिक रहीं।रोज नहा के अंगना में माटी के शिवजी पर एक लोटा जल देल उहां के नियम रहे। शिवजी के केतना नजदीक रहीं कि दूर एकर ज्ञान ओह घरी ना रहे हमरा।बाकिर उनकर भोरहरिया गावल भजनिया हमरा आजुवो इयाद आवेला आ अब जाके ओकर मरम बुझाइल ह। भजनिया कुछ अइसे रहे –
‘ हम ना जाइब बनारस काशी, ना करब उपवासि
ना जानीं हम धरम-करम, ना जाइब हम कैलाश
आवे के पड़ी तोहरे शिवजी हम भक्तन के पास ‘
मनई के मन में बिसवास होखी त शिव के त आवहीं के पड़ी। भोला भाव के भूखल हवें।जहाँ भाव लउकेला ओहिजा हाजिर।जइसे हमनीं का भोला के खोज में मारल फिरिला जा ओसहीं भोलो कैलाश छोड़ि भाव के खोज में घूमत रहींला।ई त हमनीं के अज्ञानता ह कि कुछ दे के भोला के मनावें के फेर में रहींला जा। अपने ना बुझाय त दोसरो से पूछ लिना जा कि ‘ का देके शिव के मनाई हो शिव मानत नाही।” अरे भाई तोहार बा का कि तू शिव के देबऽ? जे खुद अन्हार घर में राह खोजत बा ऊ का तोहरा के अन्हार घर से निकले के राह देखाई।सब शिवे के ह भाई जेकरा के तू जीव के बना देलऽ। देवे के अधिकार अपना चीज पर होला। ई हाल रही त जिनिगी भर लोले बनल रहबऽ भोला ना भेटइहें। गुरु गीता पढ़ऽ भोला से मिले के होखे त ई एह से कहत बानीं कि भोला ओह में राह देखवले बाड़ें अन्हार घर से निकले के,प्रकाशमय होखे के। संत आ शिव में अंतर ना होखे।संत शिव के रूप ह। संतो लोगिन उहे उपाय भोला से मिले के बतावले जे भोला खुद अपना मुंह से बतवले बाड़ें। सत्य शिव होला, शिव सुंदर होला।सत्य पथ के पथिक बनला पर मन सुंदर हो जाला तब जाके शिव के वास मन में हो जाला, आंतरिक शिव जागृत हो जाले, देहिया शिवाला हो जाला। शिव के अस्मसान भावेला, भभूत भावेला,जगत ना भावे।मन में शिव बस जाले त देहिया अस्मसान बनि जाला, देह आ जगत जरि भभूत हो जाला आ संसार शिवमय हो जाला।तन आ जगत के कण – कण में शिव – शिव गूंजत रहेला।
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बाबा के निर्गुनिया भाव, गुरु गीता के ज्ञान आ संत के सत्संग के असर रहे हमरो पर। लोला जरूर रही बाकिर भोला से मिले के मन में आसरा लागल रहे। भौतिक ज्ञान के पंडित भीतर से कहलस अपना बल पर शिव के पाले बबुओ।जग में भुलाइल हमहूं भोला से कह बइठनीं –
भोला खोलऽ ना केवड़िया
बहरे खाड़ि बानीं हम
बाहर पसरल घोर अन्हरिया
कदम – कदम पर चोर
जग में फैलल माया मोह बा
उठत बा सगरी शोर
शिवजी सुनीं ना विनितिया
बहरे खाड़ि बानीं हम।
सावन – भादो हम ना जानीं
सुनलऽ औघड़ दानी
मन मंदिर ह मोर शिवाला
अतना हमहूं जानीं
हम ना जाइब कैलाशे खोजे
छोड़ीं अब मनमानी
शंकर फेरीं जनि नजरिया
बहरे खाड़ि बानीं हम।
दीन हीन हम धन से बानीं
मन के दौलतमंद
भाव भरल संग लोटा पानी
दुअरा खाड़ि अकलमंद
बाहर घूमनीं आजु ले झूठे
गुरु कहस मतिमंद
शम्भू राखीं ना शरनिया
बहरे खाड़ि बानीं हम।
ना मानब त प्राण तेयागब
आजु राउर दुअरिआ
ना घूमब हम जगह जगह
बसब राउर नगरिया
रउरे संग दिन रात गुजारब
गाइब रउरे गीतिया
भोला खोलऽ ना केवड़िया
बहरे खाड़ि बानीं हम।
भोला का केवाड़ी खोलिहें बसहो मुड़ी ना डोलवलस।थाकि हारके मंदिर के घंटी डोला के लौट गइनीं। भोला शब्द के ना भाव के भूखा हवें।सपना देखल आ सपना पूरा होखे में बहुत अंतर होला। सपना पूरा होला कवनो सही मार्गदर्शक के देखरेख में करम कइला आ मेहनत कइला से। हमनीं के मनई त मुंगेरीलाल के भाई हईं जा दिनों में के कहे हर घरी सपने देखत रहनीं जा। सपना देखे में कवनो पइसा लागेला? सोना बने के शौक रखींना जा, सोना जस चमके के मन करेला बाकिर पारस के संसर्ग से दूर रहके, बिना आंवा में तपले। ओकरे नतीजा ह बबुओ की भोला दूर रह जालन आ लोला बन जिनिगी भर झोला ढोवत फिरेला आदमी तबहूं झोला ना भरे।हँ ओह झोला में कर्म के गठरिया के रखी चउरासी के चक्कर के यात्रा में आगे बढ़ि जाला मनई।
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जमशेदपुर में सत्संग रहे। व्यासपीठ पर संत विराजमान आ सत्संग चलत रहे।जीव के शिव बनावे,सोहम् भाव जगावे, गुरु गीता के पाठ पढ़े – समझे के बात चलत रहे। सत्य के पावे खातिर सत्संग आ गुरु के महीमा के बखान होत रहे। सब कथा सुनावत महाराज जी कहनी तुलसी बाबा के कहलका इयाद नइखे पड़त ‘ गुरु बिनु भवनिधि तरइ न कोई, जौ बिरंची शंकर सम होई।’ सुनि के हमरा दिमाग में भिनक बाबा के बतिया कौंध गइल –
आगि लागे बनवा, जरे परबतवा, मोरे लेखे हो साजन जरे नइहरवा।
आवऽ आवऽ बभना, बइठु मोरा अँगना, साचि देहु ना मोरे गुरु के आवनवा।
जिन्हि सोचिहें मोरा गुरु के अवनवा, तिन्हें देबों ना साजन ग्यान के जतनवा।
नैना भरि कजरा, लिलार भरि सेनुरा, मोरा लेखे सतगुरु भइले निरमोहिया।
सिरी भिनक राम स्वामी गावले निरगुनवा, धाई धरबों हो साधु लोग के सरनवा।
सत्य, शिव, सद्गुरु में भुलाइल मन जगत बिसारे के तइयारे ना होत रहे। सत्संग में बगले में तिवारी बाबा बइठल रहले हमरा के दुविधा में पड़ल देखि के कहले जगत बैवहार जनि छोड़ब बाकिर सद्गुरु के शरण जाईं बड़ी भाग से एह दरबार में आइल बानीं।संत आ सरकार के दर्शन भाग से होला। तिवारी जी पुरान सत्संगी हईं सत्य आ जगत के मरम बूझींला एगो भिनक बाबा के भजन सुना देले सांझी खा जगत के सार समझावे खातिर-
केऊ ना जाई संग साथी बन्दे ! केऊ।।
जइसे सती हँसकर बन्दे, ऊ काया जल जाती
दिन चार राम केऊ भजिले, बान्ह का ले जइबऽ गाँठी
भाई-भतीजा हिलमिल के बइठे, ओही बेटा ओही नाती
अंतकाल के काम ना अइहें, समुझि समुझि फाटी छाती
जम्हु राजा के पेआदा जब अइले आइ रोके घँट छाती
प्राण निकल बाहर हो गइले, तन मिल गइले माँटी,
खाइल पीअल भोग-बिलासल, ई न जात संग साथी,
सिरी भिनक राम दया सतगुरु के, सतगुरु कइले साँची।।
दिमाग के घड़ी उल्टा घूमे लागल। बाबा के बतिया इयाद आवे लागल कहत रहन देह मिलल बा त जगत कर्म करे के बा ओहि में फंसे के नइखे।जगत एहिजे रह जाला, सत्य शिव ह साथ ना छोड़े, उहे साथे जाला,ओकरे बनि के रहे के बा।शिवे सत्य ह ओकरे बनिके रहिहऽ। मेहरारू शिव समर्पित व्यक्तित्व हई।हम जगत आ शिव के बीच फंसल मनई रहीं। पारिवारिक संस्कार आ सत्संग भीतर से शिव से जुड़े खातिर जोर मारत रहे। कल्याण खातिर कवनो दोसर राह ना मिलत दिखाई पड़ल सबरे नाम दान महाराज जी से ले लेनीं। शिव के बन गइनीं।सोहम् के गूंज भीतर गूंजत रहत रहे। बिना प्रयास समाधी के सुख महसूस होखे लागत।जगत शिवमय बुझाये लागल। बुझा गइल कि –
गुरु समान दाता नहीं, याचक शीष समान।
तीन लोक की सम्पदा, सो गुरु दीन्ही दान।।
सांच से जुड़ कांच पकठा हो जाला। सदगुरु से जुड़ शिष्य शिव से जुड़ जाला।सब भरम मिट जाला।दरिया साहब के अनुभव आपन अनुभव बन जाला।मन मलीन होखे के डर भाग जाला –
पहिले सांच तब होय उजियारा।
सांचे शब्द जरे जग सारा।।
सांच समुद्र सदा भरिपूरा।
ऐसो सांच संत होय शूरा।।
कहे ‘ दरिया ‘ होय सांच सफाई।
कवन मलीन करे तोहे भाई।।
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जगत जरते शिव बांच जाला आ संसार शिवमय हो जाला। लोला भोला हो जाला। कवनो केवाड़ी खोलवावे के जरूरत ना रह जाला। आजुले एह जगत में त सतभतरी बनल एने – ओने मारल फिरत जिनिगी कटत रहे,अब जब गुरु जी मन के पगहा एगो के हाथे धरा देलन तब ओहि शिव के अलावा सपनो में दोसरा के देखल पाप ह।दरियो साहब कहले बाड़ें-
ई जग वेश्या बहुत भतारी।
एक भक्ति करूं तन मन वारी।।
जब तन मन शिव में रम जाला। प्रेम के दीपक से ज्ञान प्रकाशित हो जाला।कहल बा ‘ ज्ञानाग्नि दग्ध कर्माणो ‘। सब कर्म फल ज्ञान के आगि में जरि के नष्ट हो जाता। आत्म प्रकाश पसरि जाला।दरियो साहब कहले बाड़ें –
एके ब्रम्ह सकल घट वासी।
वेद कितेव आ ज्ञान प्रकाशी।।
धेनु अनेक रंग जग जानी।
क्षीर सेतु एक रंग बखानी।।
जो कोई सुने अचम्भो करई।
बून्द एक सभ में वा फरई।।
सदगुरु के सानिध्ये में शिव भेंटइहें,मन एक रंगा हो जाई,जगत शिवमय हो जाई। जगत में भुलाइल रहला पर त जिनिगी भर दरिया साहब के गीत गावत रहे के पड़ी रे भाई –
सोना लावन हे सखी, पिया गए परदेश।
सोना मिला न पिउ मिले, रूपा हो गए केश।

