Bhojpuri24.com की विशेष श्रृंखला ‘भोजपुरी धुरंधर’ में आज परिचय भोजपुरी साहित्य के ऐसे सजग प्रहरी से, जिन्होंने भोजपुरी कविता के एक पुरानी विधा को नए रूप में आगे बढ़ा रहे हैं, समालोचना को नई दृष्टि दी और हिन्दी तथा भोजपुरी के बीच एक सशक्त साहित्यिक सेतु का निर्माण किया। डॉ. सुनील कुमार पाठक उन विरले साहित्यकारों में हैं, जिन्होंने साहित्य को लोकप्रियता या संख्या के पैमाने पर नहीं, बल्कि गुणवत्ता और वैचारिक प्रतिबद्धता के आधार पर साधना का विषय माना है।
वे कवि, समीक्षक, चिंतक, अनुवादक और सबसे बढ़कर भोजपुरी साहित्य के गंभीर अध्येता हैं। भोजपुरी में हाइकु विधा को वर्तमान में आगे बढ़ाने वाले साहित्यकार के रूप में उनका नाम सम्मानपूर्वक लिया जाता है। समकालीन भोजपुरी कविता और समालोचना में उनका योगदान इतना महत्वपूर्ण है कि उनके बिना भोजपुरी साहित्य के पिछले चार दशकों की चर्चा ठीक नहीं मानी जाएगी।
सीवान की माटी से निकला एक साहित्य साधक
8 फरवरी 1964 को बिहार के सीवान जिले के बगौरा गांव में जन्मे डॉ. सुनील कुमार पाठक का साहित्य से जुड़ाव छात्र जीवन से ही हो गया था। वर्ष 1979 में जब वे डी.ए.वी. कॉलेज, सीवान में इंटरमीडिएट के छात्र थे, तब उनकी पहली कविता हिन्दी साप्ताहिक ‘सारण संदेश’ में प्रकाशित हुई। यही वह क्षण था, जिसने उनके साहित्यिक जीवन की नींव रखी।
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उन्होंने राजेन्द्र महाविद्यालय, छपरा से हिन्दी (प्रतिष्ठा) में स्नातक की उपाधि प्राप्त की। इसके बाद बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर से हिन्दी में प्रथम श्रेणी के साथ एम.ए. और जयप्रकाश विश्वविद्यालय, छपरा से पीएच.डी. की उपाधि हासिल की। सरकारी सेवा में उन्होंने बिहार सरकार के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग में उपनिदेशक के पद पर कार्य किया और वर्ष 2024 में सेवानिवृत्त हुए।
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भोजपुरी साहित्य सम्मेलन से मिली नई दिशा
डॉ. पाठक का भोजपुरी साहित्य की ओर गंभीर झुकाव वर्ष 1985 में अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन, पटना के रांची अधिवेशन के दौरान हुआ। यहां उनके निबंध ‘भोजपुरी कविता में सामाजिक चेतना’ को ‘पांडेय योगेन्द्र नारायण छात्र निबंध पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया। यह पुरस्कार भोजपुरी के विद्वान पं. गणेश चौबे के हाथों मिला।
इसी अधिवेशन में उन्हें आचार्य देवेन्द्रनाथ शर्मा, डॉ. विश्वनाथ सिंह, पांडेय कपिल, प्रो. ब्रजकिशोर, डॉ. ऋता शुक्ला, डॉ. विश्वरंजन और प्रो. हरिकिशोर जैसे वरिष्ठ साहित्यकारों का सान्निध्य प्राप्त हुआ। यही मार्गदर्शन आगे चलकर उन्हें भोजपुरी साहित्य के गंभीर सृजन की ओर ले गया।
भोजपुरी में हाइकु की पहली दस्तक
भोजपुरी में हाइकु पर अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, लेकिन इसके पीछे जिस साहित्यकार का सबसे बड़ा योगदान है, वह नाम डॉ. सुनील कुमार पाठक का है। वरिष्ठ साहित्यकार पांडेय कपिल ने अपनी पुस्तक ‘भोजपुरी के चुनिन्दा हाइकु’ की भूमिका में स्पष्ट लिखा है कि भोजपुरी में सबसे पहले हाइकु लेखन का श्रेय डॉ. पाठक को जाता है।

वर्ष 1990 में उनके हाइकु ‘बिगुल’ और ‘भोजपुरी सम्मेलन पत्रिका’ में प्रकाशित हुए। हालांकि इस उपलब्धि के पीछे संघर्ष की एक रोचक कहानी भी है। वर्ष 1990 से दो साल पहले उन्होंने हिन्दी के प्रसिद्ध हाइकुकार डॉ. सत्यपाल चुघ से प्रेरित होकर कुछ हाइकु लिखे और प्रकाशन के लिए भेजे थे, लेकिन उन्हें यह कहकर लौटा दिया गया कि ‘भोजपुरी में अभी इनकी गति नहीं है।’
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यह टिप्पणी किसी भी नए लेखक को निराश कर सकती थी, लेकिन डॉ. पाठक ने हाइकु लेखन जारी रखा। परिणामस्वरूप वर्ष 1993 में उनका हाइकु संग्रह ‘नेवान’ प्रकाशित हुआ, जिसे भोजपुरी का पहला हाइकु संग्रह होने का गौरव प्राप्त है। आज भोजपुरी में हाइकु साहित्य की जो समृद्ध परंपरा दिखाई देती है, उसकी नींव ‘नेवान’ ने ही रखी।
‘नेवान’ ने बदल दी भोजपुरी कविता की दिशा
डॉ. सुनील कुमार पाठक ने अपने हाइकुओं के माध्यम से भोजपुरी कविता को नई संवेदना और नया तेवर दिया। उनके हाइकु ग्राम्य जीवन, सामाजिक परिवर्तन और आधुनिक चेतना के अद्भुत उदाहरण हैं।
उनका यह हाइकु भोजपुरी साहित्य में अत्यंत चर्चित है-
‘हमार गाँव
केवट-कठौता में
राम के पाँव।’
वहीं सामाजिक परिवर्तन को रेखांकित करता उनका यह हाइकु भी उल्लेखनीय है-
‘माटी चढ़ल
आसमान के माथे
आन्ही आइल।’
उनकी कविताओं में लोकजीवन की संवेदनाएं हैं, लेकिन वे केवल लोकचित्रण तक सीमित नहीं हैं। उनमें सामाजिक और राजनीतिक यथार्थ का तीखा बोध भी दिखाई देता है।
प्रखर आधुनिकता बोध और जनपक्षधर कविता
डॉ. पाठक समकालीन भोजपुरी कविता में अपने प्रखर आधुनिकता बोध और प्रगतिशील विचारों के लिए जाने जाते हैं। उनकी कविताएं धार्मिक बाह्याडंबर, जातिगत वैमनस्य, सामाजिक विसंगतियों और लोकतांत्रिक मूल्यों के क्षरण के विरुद्ध मुखर स्वर प्रस्तुत करती हैं।
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वे उन कवियों में शामिल हैं, जो साहित्य को समाज और राजनीति से अलग करके नहीं देखते। उनकी रचनाएं सामाजिक विघटन, सांप्रदायिक सोच और लोकतांत्रिक संकटों के प्रति गहरी चिंता व्यक्त करती हैं। ‘मसान राग’, ‘मोनालिसा आ महाकुंभ’, ‘राजा जी के मुहूरत’, ‘बोल बोल बोल जमूरा’ और ‘शाही साँड़’ जैसी कविताएं इसका प्रमाण हैं।
कम लिखा, लेकिन उत्कृष्ट लिखा
आज के समय में जब साहित्य में पुस्तकों की संख्या को उपलब्धि माना जाने लगा है, डॉ. पाठक की सोच बिल्कुल अलग है। उनका मानना है कि ‘गणना नहीं, गुणवत्ता महत्वपूर्ण होती है।’
चार दशक से अधिक की साहित्यिक यात्रा के बावजूद उनकी कुल सात पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं, जिनमें शामिल हैं-

नेवान (भोजपुरी का पहला हाइकु संग्रह, 1993)
कविता का सर्वनाम (हिन्दी कविता संग्रह)
उमड़े निबंध मेघ (हिन्दी निबंध संग्रह)
छवि और छाप : राष्ट्रीयता के आलोक में भोजपुरी कविता का पाठ
सभकर साथी सभकर मीत (भोजपुरी अनुवाद)
पढ़त-लिखत (भोजपुरी समालोचना)
भोजपुरी कविता : रुचि आ रचाव (भोजपुरी समालोचना)
वे साहित्य सृजन को व्यवसाय नहीं, बल्कि एक व्रत मानते हैं। यही कारण है कि उनकी प्रत्येक कृति अपने आप में एक गंभीर साहित्यिक हस्तक्षेप मानी जाती है।
भोजपुरी समालोचना के विश्वसनीय
यदि समकालीन भोजपुरी समालोचना की बात की जाए तो डॉ. सुनील कुमार पाठक का नाम सबसे प्रमुख साहित्यकारों में लिया जाएगा। उनकी पुस्तकें ‘पढ़त-लिखत’ और ‘भोजपुरी कविता : रुचि आ रचाव’ भोजपुरी आलोचना साहित्य की महत्वपूर्ण उपलब्धियां मानी जाती हैं।

इन पुस्तकों में उन्होंने भोजपुरी के 29 कवियों की रचनाओं की गंभीर और तथ्यपरक समीक्षा प्रस्तुत की है। उनकी आलोचना का सबसे बड़ा गुण उसकी निष्पक्षता है। वे साहित्यिक पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर रचनाओं का मूल्यांकन करते हैं।
वे लिखते हैं कि-
‘भोजपुरी रचना में आज विचार के दरिद्रता नइखे रह गइल, बाकिर आलोचना के लोकतंत्र तबे कायम हो पाई जब रचने के आलोक में कवनों विचार गठित-निरूपित होई।’
यह कथन उनकी आलोचना दृष्टि को स्पष्ट रूप से सामने रखता है।
पांच हजार किताबों के बीच साहित्य साधना
डॉ. पाठक मंचों पर भले कम दिखाई देते हों, लेकिन भोजपुरी साहित्य की हर गतिविधि पर उनकी पैनी नजर रहती है। हिन्दी, भोजपुरी, अंग्रेजी और संस्कृत की पांच हजार से अधिक पुस्तकों की उनकी निजी लाइब्रेरी उनकी गंभीर पाठकीयता का प्रमाण है।
वे हर वर्ष भोजपुरी प्रकाशनों पर एक महत्वपूर्ण सूचनात्मक आलेख भी प्रस्तुत करते हैं, जो शोध और दस्तावेजीकरण की दृष्टि से अत्यंत उपयोगी माना जाता है।

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भोजपुरी और हिन्दी के बीच सेतु
डॉ. सुनील कुमार पाठक का मानना है कि भोजपुरी और हिन्दी एक-दूसरे की प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि पूरक भाषाएं हैं। वे मानते हैं कि भोजपुरी का विकास हिन्दी को भी मजबूत करेगा।
अपनी एक भोजपुरी कविता में वे लिखते हैं-
‘हम हिन्दी में भोजपुरी वाला बानीं,
आ भोजपुरी में हिन्दी वाला।’
यह पंक्ति उनके संपूर्ण साहित्यिक व्यक्तित्व और भाषाई दृष्टि को व्यक्त करती है।
क्यों हैं भोजपुरी धुरंधर?
डॉ. सुनील कुमार पाठक को भोजपुरी धुरंधर इसलिए कहा जाना चाहिए क्योंकि उन्होंने भोजपुरी में हाइकु जैसी विश्वप्रसिद्ध काव्य विधा को आगे बढ़ा रहे हैं, समकालीन भोजपुरी कविता को वैचारिक गहराई प्रदान की और भोजपुरी समालोचना को गंभीर एवं निष्पक्ष विमर्श का आधार दिया। उन्होंने यह सिद्ध किया कि साहित्य की असली शक्ति उसकी गुणवत्ता, प्रतिबद्धता और वैचारिक ईमानदारी में निहित होती है।
भोजपुरी धुरंधर श्रृंखला में डॉ. सुनील कुमार पाठक उस साहित्य साधक के रूप में दर्ज हैं, जिन्होंने कविता, समालोचना और विचार के माध्यम से भोजपुरी साहित्य को नई दृष्टि और नई प्रतिष्ठा प्रदान की है। उनकी साहित्यिक साधना आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी रहेगी।

